Wednesday, 5 June 2013

जाणू कख छै, बतौ त लोला?

जाणू कख छै, बतौ त लोला?
किलै कान्धम, धर्युं स्यु झोला?
उंदार कब तैं लग्युं रैलि?
क्वी त बोला, अब ड्यार हि रौंला।।

जब तलक तू छै लचार,
ऐ नि कबि जाणों विचार,
अब पैढी-ल्येखि ऐ कुच कनों बगत,
त छोड़ी जाणि छै यु घौर-मुलुक,
सबि उन्द हि चलि जैल्या,
त यिख कु रालु? बोला?
जाणू कख छै .........................

गूणी-बान्दरोन भरीं छन सार,
कूड़ी उजिडिक छन हुयीं उड्यार,
घ्यू-दूध अब मोल हि मुल्याणन,
छन्नि, गोर-बखरों खुज्याँणन,
रीत-रिवाज पाणी सि बिसगणा,
जख गै होला वु सब म्येला-खौला,
जाणू कख छै .........................

पहाड्यों म हि नि अब पहाडै अन्वार,
पछ्याँण मिटोणे कि य कनि मारामार?
जू जख जाणू, उखा कि हवे जाणू,
पहाडै, पहाड़ी अब क्वी नि बच्याणु,
भासा-संस्कृति कि नि छै खैरि,
पण पैनुणु नि क्वि पहाड़ी चोला,
जाणू कख छै .........................

रचना : विजय गौड़ (०५।०६।२०१३)     
कविता संग्रह"रैबार" से।
http://vijaygarhwali.blogspot.in/    

Copyright @ Vijay Gaur  05/06/2013 

Saturday, 1 June 2013

बरखा!!!

झुण मुण, झुण मुण बरखा,
रूम-झुम, रुम-झुम बरखा,
याद लेकि औन्दि कैकि,
आज मैमा बरखा .....
झुण-मुण ........

य बरखा ज्वा मै तैं,
यन रिझाणि च, 
जिकुड़ी मा बुझीं आग,
तैं सुल्गाणि च,
कैकि खुद मा द्वी घड़ी कु, 
मै खुदयाणी बरखा ......
झुण-मुण ........

बुन्न क्या च कै से,
मन कि क्य गाणी च,
य बरखा ये मन तैं,
झणी कख-२ लिजाणि च,
आज मै से दये तु बोलि,
छै क्य चाणि बरखा ....... 
झुण-मुण ........

यनि बरखणी छै,
ज्वी-क्वी तरस्येणु च,
पुरणा दिनों कि याद,
मा पौंचणु च,
गात-मन थैं भिजै जांदि,
जब बि आन्दि बरखा,
झुण-मुण ........  

विजय गौड़ 
०१।०६।२०१३

Copyright @ Vijay Gaur  01/06/2013

Friday, 31 May 2013

जरा आखरों रैबार बि बिंगणा रयाँ !!!

मि लिखणु रौंदु, तुम पढ़णा रयाँ,
जरा आखरों रैबार बि बिंगणा रयाँ।

गीत छौं मिसांदु मी,
तुमरी हि छवीं लगांदु मी।
भलु-बुरु तुम छाँ जु कना,
वी त रौंदु, गान्दु मी। 
म्येरा मनै उमाल मा,
तुम बि उम्लेणा रयाँ,
जरा आखरों रैबार .......................

रसीला फूल छौं खुज्यांदु मी,
मुल्कै म्वारि सि रूणान्दु मी।
स्ये मनै जल्वठी खोला त जरा,
हर्च्युं सैद छौं खुज्यांदु मी।
मी लग्युं तुम्थैं फैलांण मा,
तुम बि फैलेणा रयाँ,
जरा आखरों रैबार .......................

तुम से आज कुच छौं चांदु मी,
पहाडै 'धै' छौं सुणान्दु मी,
कंदुड्यों नि बूजा, बौग नि सारा,
प़ाड्यों, 'पाड़ी' छौं बणान्दु मी।
मी मिस्युं तुमथैं भटयांण मा,
तुम बि बौडेणा रयाँ।
जरा आखरों रैबार .......................   

विजय गौड़ 
३१।०५।२०१३        

Friday, 24 May 2013

दारु-दारू ......

दादा भि दारु, भुला बि दारु,
दारु-२ हुईं च,
गफ्फा बि दारु, झुल्ला बि दारु,
फेर मारो-२ हुईं च।।

गुरुजी नैनीडांड जयां,
क्य ठेका आज खुल्युं च?
ठेका खुल्युं हो य बंद,
वुंकू झोला म खारयुं च,
नौनु तौन्कू बुबा खुज्याणु,
झाँजी गाड़ी ऐ ग्ये क्य? 
गफ्फा बि ..............

भैजी मुंडरै दवै दियाँ?
भुला, वा त निमड़ी च,
सुरुक भितिर औ त जरा,
मिन कामै दवै खुज्ययीं च,
भयो, जैकि डिमांड आज ,
मिन बि वा हि लईं च,
दादा बि ....................

पदानों ड्यार तुम बि गयाँ,
नौनै पौणे हुईं च,
खाणे फोड़ म क्वि बि ना,
"वुख" म्वरमोर हुईं च,
कारिज तखि सुफल दिदो,
जख बल बोतल अयीं च,
दादा बि ....................

ऐंसू साल चुनौ छन हूँणा ,
क्या तिन बि कुच सुच्युं च?
दारु गेलण रस्ता लग्युं,
बुगट्या चुलुम तच्युं च,
अब त जीत म्येरि हि पक्कि,
फेर पाँच सालै कि कमैई च,
दादा बि ....................

पल्या गोँ लोग किलै छन रोणा?
बल फ़ौजी 'गब्दू' ब्वै म्वरीं च,
फौजी च त हम बि जयोंला,
वेन कैंटीन वलि धरीं च।
ठुबा बि दारु, बुबा बि दारु,
ब्वै बि दारु हुईं च,
गफ्फा बि ..............

विजय गौड़ 
२४।५।२०१३ 

तेरी तस्वीर से!!!

छुप के तेरी तस्वीर से दो बात कर लेता हूँ।
मैं यूँ ही दिन में सौ बार मर लेता हूँ।।

यूँ तो मसगूल बहुत हूँ ज़िंदगी कि जद्दोजहद में अब।
पर रस्म के लिए तुझे ज़रूर याद कर लेता हूँ।।

तेरी करीबियों के वो निशाँ मिट ते भी तो नहीं,
कोशिश करने को मैं हज़ार कर लेता हूँ,

मोहब्बत में जाँ से गुजरते हैं गुजरने वाले,
मैं कुछ देर साँस रोके खुद को मज़ार कर लेता हूँ।।

तुम तुममें खुश, मैं मुझ में खुश,
मै अब वक़्त का ऐतबार कर लेता हूँ।

ज़माने को कोसने से आख़िर होगा क्या हासिल,
इसलिये मैं ख़ुद को, गुनहगार कर लेता हूँ।। 

विजय गौड़ 
२४।५।२०१३ 

'मेरु जोग'

स्वीणों मा दयेखी छै ज्वा ब्यालि,
माया जैन्कू तैं समालि,
आज वा, बांद म्येरि ह्वै ग्येई।
म्येरा स्वीणों थैं वा वीणा कै ग्येई।।

ब्यालि तक छै ज्वा अजाण,
छ्वीं-बथ ना बुन्न-बच्याण,
होंदु छौ कुज्याँण-कुज्याँण,
बल, वींकि टिपड़ी मिस्ये ग्येई,
म्येरा स्वीणों थैं ........... 

जोग न कनि जगै य आस
होणु नी चा मै विस्वास,
रौंदु छौ जु कबि उदास,
वेकु कनु चौमास ऐ ग्येई।
म्येरा स्वीणों थैं ...........

बथौं रैबार लाणु आज,
कबि बडुलि त कबि पराज,
कंदुड्यों मा बस ई अवाज,
त्वेकू सजिलो साज ऐ ग्येई।
म्येरा स्वीणों थैं ...........

विजय गौड़ 
२४।०५।२०१३   
  

औ, सुचणि छै क्या?

भोल सम्लौन्या ह्वै जाला,
लोग छ्वीं लगाला,
माया अर मायादारों का,
गीत हि रै जाला।
औ, सुचणि छै क्या?
द्वी दिना कि हि च य ज़िन्दगी,
हम, जी ल्योंला औ, आज, अर अबि।।
भोल सम्लौन्या .............

ब्यखुनि कु घाम बुनु च,
स्वाणि रात च औणी,
हमु थैं हमरि माया को,
रैबार च दयोंणी।
औ, सुचणि छै क्या?
द्वी दिना कि हि च य ज़िन्दगी,
हम, जी ल्योंला औ, आज, अर अबि ........

भोलै कि सबेर,
झणी क्या च लौणी,
म्येरि माया कि समोंण,
बणे धैरि दये तू गौणी,
औ, सुचणि छै क्या?
द्वी दिना कि हि च य ज़िन्दगी,
हम, जी ल्योंला औ, आज, अर अबि ........

भोल सम्लौन्या ......
लोग छ्वीं ...............
माया अर ...............
गीत हि .................
औ ............... अर अबि।।

विजय गौड़
२४।०५।२०१३ 
   



Thursday, 23 May 2013

म्येरि सौं ......

सौं छन खयीं म्येरि,
रौन्लु मि सदनि त्येरि,
आस छौं मि, त्वै बन्धाणु,
त्येरि हि प्रीत छौं लगाणु।। (female)

सौं छन खयीं म्येरि,
रौण तिन सदनि म्येरि,
बुन दये, कुच बि बोलु ज़मानु,
बंधन त्येरू-म्येरू पुराणु।। (Male)

एक-हैंका कि आन्ख्यों मा,
यनि डुब्याँ रौंला,
प्रीत कि निंद न टुटि ज्वा,
औ, यिन स्ये जौंला।
प्रीत खाणु, प्रीत हि कमाणु,
बंधन त्येरू .........  (Male)

प्रीत का मिठा गीत,
यनि गाणा रौंला।
माया कि मयलि रीत,
सब्यों थैं बिंगौला,
होणु रौ जु , मिलणु-मिलाणु,
दिब्तों बि ...........(Female)

सौं छन .....................छौं लगाणु ।।
सौं छन ....................म्येरू पुराणु।।

विजय गौड़
 २४।५।२०१३







Tuesday, 21 May 2013

ज्वनि नौ च मेरु!!!

मेरु दुन्या मा राज-पाट,
मेरु उज्यलु- अंधेरु,
जख देखा, बस म्येरि हि छवीं
ज्वनि नौ च मेरु।।


म्येरि अपड़ी हि पछ्याँण,
रौन्दि बतों मा रस्याँण।
हिटै यनि कि क्य बुन्न तब,
सोचि नि कबि क्य खाण-कमाण।।
अपड़ी हि चबोड़ मा रांदु,
हो ब्यखुनि चा सबेरू,
जख दयेखा ......


मी बालों को बि प्यारू,
दानों को बि मी सहारू।
आस मै हि छौं ज़माना कि,
माँ भैण्यो कु मी दुलारू।।
सब्यों अपडू बणाणु रांदु,
नि सुचदु तेरु-मेरु,
जख दयेखा ......


खुटि भुयां पण टक अगास,
सीखि नि मैन, रैणु उदास।
जैथैं मुख क्वी लगांदु नि,
वे निरस्याँ कि मै छौं आस।।
रीत ज्वनि कि निभाणु रांदु,
भोल ह्वै जाँण यीन पखेरू,
जख दयेखा ......

विजय गौड़
२१।०५।२०१३


Monday, 20 May 2013

चलणा छां, त चला!!

बाटु सुनसान भौत च,
चलणा छां, त चला,
दूर असमान भौत च,
हिट सकणा छाँ, त चला।।

मैन्गैं न मनख्यातै कमर तोड़ीं च,
उठि सकणा छाँ, त चला।
म्येरा घौर अबि पुरणि हि मोर-सिंगाड़ी च,
झुकि सकणा छाँ, त चला।। 

सीदा-सच्चों तैं ज़मानु 'लाटू' बुनू च,
यिन बिंगणा छाँ, त चला।
'सप्पन' बणना कि अटगा-अटग हुईं च,
तुम बि अटगणा छां, त चला।।

सुब्न्या भैजि, अज्क्याल चैन से खाणु च,
तुम नि दुखणा, त चला।
म्यारु मुलुक अज्यूँ बि दिबतों कु आणु-जाणु च,
तुमन बि दिखणा, त चला।।

ब्वे मुरण मा बि दारु बंटेणी गौंफुंड अज्क्याल,
तुम नि बँटणा छाँ, त चला।।
दादा बि दारु, भुला बि दारु, गफ्फा बि दारु, झुल्ला बि दारु,
यु तुम नि रटणा छाँ, त चला।। 

विजय गौड़ 
२०।०५।२०१३ 





Friday, 17 May 2013

गीत - संगीत

लिखणों बैठ्युं छौं,
आज, लिखणों बैठ्युं छौं ......
लिखणों बैठ्युं छौं,
क्वी गीत अपड़ू सी,
रंचणों बैठ्युं छौं,
संगीत मयलु सी।।
लिखणों बैठ्युं छौं ...................

ज्यू ब्वनु,
कुच यनु लिखु।
जैमा तुम दिख्याँ,
अर मि बि दिखु।
द्वी बात अपड़ों की,
पण छुटु नि बिरणु भी।।
क्वी गीत अपड़ू सी,
संगीत मयलु सी,
लिखणों बैठ्युं छौं ....................

ज्वान बुना,
नचणों कु लिखु।
दाना बुना,
सुचणो कु लिखु।
दीदी, भुलि, रखड़ी की,
धण्या, लूण, कखड़ी की।।
क्वी गीत अपड़ू सी,
संगीत मयलु सी,
लिखणों बैठ्युं छौं ....................

चैत कि,
बग्वाल लिखु।
कि सौंण कि,
बस्ग्याल लिखु।  
छ्वीं होलि कि, मेलों की,
बथ थड्या-झुमैलों की,
क्वी गीत अपड़ू सी,
संगीत मयलु सी,
लिखणों बैठ्युं छौं ....................

मुल्कौ कु,
रैबार लिखु।
स्यूं नेतों कु,
असगार लिखु।
बाटू हेरदा आंख्यों की,
जग्वाल साख्यों की।
क्वी गीत अपड़ू सी,
संगीत मयलु सी,
लिखणों बैठ्युं छौं ....................

विजय गौड़
१७/०५/२०१३
राति २.० बजि।  

Thursday, 16 May 2013

"नमो"-"नारैण" (तत्कालीन राजनीति, नेता, आइपीएल कि 'सान' मा!!!)

कखि "नमो" त,
कखि "नारैण" च होणु,
देखा! कलजुग मा,
कनु "रामैण" रंचेणु ।।

'द्वापर' मा मोहन बजांदु छौ बन्सुलि,
अर राधा छै नचदी,
अब "राधा" लगाणि भौंण,
अर "मोहन", "मन" से नचणु।।
देखा कलजुग मा ..........................

"संत" कना छन तौलियों से सानी,
'खेल' मा 'खेल' ना, भरैणि पैंस्योंन माणी,
'भारत' मा नी च, पीणों पाणी,
अर 'इंडिया' म प्रीमियर तमासु करेणु।।    
देखा कलजुग मा ..........................

"असगुनि" सिखाणन 'क़ानून' देस तैं,
"पवन" लिजाणि कखि हौरि 'रेल' तैं,
"जाँचै संस्था" मा बस 'अव्यवस्था'
"राजा" प्रजा कु हि माल च खौणु।।
 कखि "नमो" त ..............................

सिनक्वलि चुनौ कु रणसिंग बि बजलु,
एक दिनौ 'सेरा' हमरा मुंड बि सजलू,
एकन बटोली-सौंग्ये धैरयालि,
हैंकु उठिड्यों मा जीभ फिरौंणु।।
कखि "नमो" त,
कखि "नारैण" च होणु,
देखा! कलजुग मा,
कनु "रामैण" रंचेणु ।।

विजय गौड़
१७/०५/ २०१३
 


        

Tuesday, 14 May 2013

कनि अजाण माया!!!!

कनि अजाण माया,
कख मन लगाणु ग्वाया,
कुच नि बिग्येणु,
किलै मन खुदेणु, 
ह्व़े त क्य ह्व़े ग्याया?
कनि अजाण माया .........

को होलि वा,
ज्वा अपड़ी सि लगणी च,
लुकि-२ ज्वा,
मै थै हि दयखणी च,
न मिन गिचु खोलि,
न वीं बुनु आया,
कनि अजाण माया .........

वींन बोलि कुच न,
पण मिन त सूणि च,
अब मन मा स्वीणों की,
बार सि औणी च,
मैखुणि आज जून,
दिन मा हि ऐ ग्याया,
कनि अजाण माया .........

टक रौंदी असमान मा,
खुट्यों ठीन्स लगणी च,  
मै कु सरी दुन्या,
बौल्या-२ बुलणि च,
सुणे मै नि कुच,
क्य लोग बुना छाया,
कनि अजाण माया .........       

विजय गौड़ 
१४ मई २०१३ 
   

Friday, 10 May 2013

रैबार!!!

हैन्सि ल्या, 
रव़े-२ कि, बगत नि कटेण हो,
उठि जा, 
स्ये-२ कि, उकाल नि लंगयेंण हो।।

कैका सारा नि रौंण,
नि दिखण कै मुखौंदा,  
हथि-खुटी हिलैल्ये लोला,
स्यीं, ज्वनि का छौंदा।
सोचि ल्या, 
ध्वै-२ कि, आंख्युंन नि खुलेंण हो,
उठि जा, 
स्ये-२ कि, उकाल नि लंगयेंण हो।।

कोसिस कनु रैई,
भाग, अफ़ि धै लगौन्दा,
रोगै दवै खोजा,
जु मरज भगौंण चौंदा 
खाँसी ल्या, 
सै-२ कि, रोग नि ढकेण हो 
हैन्सि ल्या, 
रव़े-२ कि, बगत नि कटेण हो।।
  
मनखि, कर्मों से हि,
छवटु-बडु होंदा, 
अर मनखि वी,
जो मनख्यों काम औंदा,
पूछि ल्या, 
बौगा ह्वै कि, अपड़ू नि बणेण हो,
हैन्सि ल्या, 
रव़े-२ कि, बगत नि कटेण हो।।

अफ़ी अपुकु कमौण म,
सान नि चितौंदा,
कै लचारै, लचारि कू,
मखौल नि उड़ोन्दा,
दये बि दया, 
दान दयेकि सोनू नि खवेण हो,
उठि जा, 
स्ये-२ कि, उकाल नि लंगयेंण हो।।
   
औंण-जौणे कि य रीत,
दुन्या मा चनि रौंदा,
खालि हाथ ऐ जु यिख,
वुख बि खालि जौंदा,
बींगि ल्या, 
गालि दयेकि, नाम नि कमैण हो,
उठि जा, 
स्ये-२ कि, उकाल नि लंगयेंण हो।। 

विजय गौड़ 
१०/०५/२०१३  

बांदों मा कि बांद

बांदों मा कि बांद,
नल्वैया बांद ओ,
रात-दिन म्येरा मन,
त्येरो सोर रान्द, नल्वैया बांद ओ,
त्येरो ख्याल रान्द, नल्वैया बांद ओ।

ज्वानो मा को ज्वान,
डंडोया ज्वान ओ,
रात-दिन बैठ्युं रांदु,
बाटों त्येरा बान, डंडोया ज्वान ओ,
बाटों त्येरा बान, डंडोया ज्वान ओ।

आग कि अगेलि, 
नल्वैया बांद ओ,
मि त्वैकु खुदेणु छौंउ,
त्वै बि बडुलि लगली, नल्वैया बांद ओ।

घासै कि थमालि, 
डंडोया ज्वान ओ,
म्येरि साँची माया गैल्या,
धैरि  तू समालि, डंडोया ज्वान ओ,

पैनि जालि टैई, 
नल्वैया बांद ओ,
तू हि काम-धाणी लोलि,
त्वी म्येरि कमैई, नल्वैया बांद ओ।

लूण भरि दूँण, 
डंडोया ज्वान ओ,
गौं- गल्यों मा छ्वीं हमारि,
त्वै क्य जि बतौण, डंडोया ज्वान ओ।।।

ऐ ग्येई बग्वाल, 

नल्वैया बांद ओ,
ल्येकि आणु छौं बरात,
तू रैई जग्वाल, नल्वैया बांद ओ ....


विजय गौड़ 
१०/०५/२०१३