Monday, 26 August 2013

"उरख्यलि"

दगिड्यो,
आज सब्यों कु परिचय एक यनि चीज़ से कराणु छौं जु हमरा इतिहास मा बडु महत्व कु स्थान रख्दि छै। आज अवश्य नै समय क नौन्याल बुल ला कि मि क्य बात कनु छौं पण सच यु ई च कि ईं वस्तु कु हम सब्यों क वास्ता बडू योगदान रै। वे समय मा दिख्ये जा त या 'ब्वै' कु हि रूप छै। मै बात कनु छौं  "उरख्यलि" की ज्व कबि हरेक चौकै तिरालि दिखेंदी छै, जैमा रोज नाज कुटेंदु छौ अर वांका पश्चात हम खांदा छाया। आज य कुटणा कि परंपरा विलुप्ति का द्वार पर च, मेरु प्रयास यनु च कि ईं अन्नदाता की कुछ स्मृति बिटोलि की रखूँ। एक कविता हमरा पुरण्यों कि ईं सैन्दाण "उरख्यलि" थैं समर्पित। 


बिसरी ग्याँ तुम जैथैं, मै व़ी नखरयलि छौं,
जरा पछ्याँणा त भुलों मैथै, मै तुमरि हि उरख्यलि छौं। 

तुमरु मेरो साथ साख्यों बिटी च,
ब्वै क हतु कि रुटलि, भैणि राख्यों बिटी च  
तुम भूकन कबि रुयाँ त मि ब्वै बणी ग्यों,
मौस्याँण सि चा रयुं भैर, पण मौस्याँण कबि नि रौं,
मि सुप्पु कि दगड्या अर दीदि गंज्यलिक छौं,
पछ्याँणि तुमुन मैथै, मै तुमरि हि उर्ख्यलि छौं।   

ददि-दाज्यों बारम भुलों बड़ी सज-समाल छै,
धुवै-पुछ्ये कि, रोज कुटे कि होंदि जग्वाल छै,
ब्यो-पगिन्यों बेर मैमु बि रान्दि हल्दयाण छै,
बार-त्योहारों कि वे बगत अहा कनि रस्याँण छै,
पितरों कि सैन्दांण भुलों, मै नाजै औंज्यलि छौं,
पछ्याँणि तुमुन मैथै, मै तुमरि हि उर्ख्यलि छौं।   

अब मुल्कौ रीत-रिवाज सि मि बि हर्चि ग्यों,
नै ज़मानै दौड़-भागम भुलों, मि नि दौड़ी सक्यों,
खेति-पात्यों ब नाज हि क्वी नि बुतणा, 
उरख्यली, जन्दरि फेर कैन सुंगणा?
पाणी जैकु प्योणु नि क्वी आज, मि वा नवलि छौं,
पछ्याँणि तुमुन मैथै, मै तुमरि हि उर्ख्यलि छौं।   

कॉपीराईट @विजय गौड़ २७.०८.२०१३  


Sunday, 25 August 2013

साबधान, मेरु मुलुक, साबधान !!!!

दगिड्यो,
आज फेर मुल्कौ आवाहन कनु छौं, इन्टरनेट द्वारा उपलब्ध ये सामाजिक माध्यम द्वारा। हम्थैं नयु राज्य मिलि अब १३ साल ह्वै ग्येनि पण हमरि स्तिथि जख्यातखि च, राज्य बणु छौ पहाडों क वास्ता पण पाडों मा हि कुच नि ह्वै। आज बगत बुनु च कि एक हैंकु आंदोलन चयेणु उत्तराखंड मा, पहाड़ क वास्ता, पाड्यों क वास्ता। दगड़ा दगड़ी अकलबर बणी यन बि दिखण कि कखि फेर यनु नि ह्वै जा कि बीज बूता हम अर कुन्ना भरि जै हौरों का, जन उत्तराखंड राज बणणों बगत ह्वै। ये हि विषय पर कविता लिखि आवाहन कनु छौं सब्यों से, रैबार जरूर पौञ्चलु, यनि आस च, विस्वास च।  

साबधान, मेरु मुलुक, साबधान !!!!    


कबि खुटी ज़मीन नि छोड़ त्येरि,
अर टक नि छोड़ कबि असमान,
भैऱ्या पछ्यण्या बैऱ्यों से पैलि,
रै भितरै अजाणों से साबधान !!
साबधान, मेरु मुलुक जरसि साबधान!!
ब्वल्युं मान, बगतौ ब्वल्युं मान। 

जब तू अयूँ छौ सड़क्यों मा,
कुच चिलांग बैठ्याँ छा खिड्क्यों मा,
वुख तू लड़णू छौ सड़क्यों मा,
वू मौका द्वपणु छौ खिड्क्यों मा,
फेर नै लड़े लड़ण से पैलि,
जरा यूँ द्वी-चारों से साबधान!
साबधान, मेरु मुलुक जरसि साबधान!!
ब्वल्युं मान, बगतौ ब्वल्युं मान। 

बालु नि रै तू बडू व्है ग्ये अब,
तेरह सालम छड़छुड़ू व्है ग्ये अब,
मनखि पछ्यणणों बगत ऐ ग्ये अब,
हौरों सारा तू भिंडी रै ग्ये अब,
अपड़ू समझि बुलंण से पैलि,
जरा जैचंदों से साबधान!!
साबधान, मेरु मुलुक जरसि साबधान!!
ब्वल्युं मान, बगतौ ब्वल्युं मान। 

देस खुणि सहीद होणो इतिहास रै बुलंद त्येरो,
भविष्य नौन्यालु कु हेरुणों घौर बिटी मुखुंद त्येरो,
तौं उठै कि उन्द लि जैकि काज नि होण हल त्येरो,
यिखि पौढ़ी जब यिखि कमैलो, भाग तबि सुफल त्येरो,
भोलै पुन्गड्यों हलाहल से पैलि,
बीज त बूत ये बर्तमान,
साबधान, मेरु मुलुक जरसि साबधान!!
ब्वल्युं मान, बगतौ ब्वल्युं मान। 

रचना: विजय गौड़ 
कॉपीराइट @ Vijay Gaur २६/०८/२०१३                 

Friday, 23 August 2013

भोलै, भोल हि दिख्ये जालि!!!

भोलै सोचि मि डरु किलै,
भोलै, भोल हि दिख्ये जालि,
अबि ह्वै जौं अध्म्वरु किलै?

काम-धाणी आजै बचिं अबि,
जरा वे निमाडि ल्या त पैल,
सुबेरो घाम ऐ नि कखि,
तुम दिखण लग्याँ अछेल,
जै गौं मिन जाण हि नि,
वेकु बाटु मि हयरु किलै?

भोलै सोचि मि डरु किलै,
भोलै, भोल हि दिख्ये जालि,
अबि ह्वै जौं अध्म्वरु किलै?

आजम ज्योंण सीखि ल्या जरा,
भोल रै जाला बस टपकरा,
आज भुकि छाँ कि भोलकु बचौन्ला,
भोल कैन नि दयेखि रै ब्येलि छ्वड़दरा,
जु जलम ल्यालु, खै-कमै बि ल्यालु,
अफु मा कर्युं तिन, स्यु गरु किलै?

भोलै सोचि मि डरु किलै,
भोलै, भोल हि दिख्ये जालि,
अबि ह्वै जौं अध्म्वरु किलै?

विजय गौड़
Copyright @ Vijay Gaur 23.08.2013

Thursday, 22 August 2013

"प्याज, परजा (प्रजा) अर पुजै"

आज मि तिथैं प्याज दयुन्लू,
भोल तू मिथें वोट दये,
ये देसकि सज-समाल,
फेर म्येरा हथों मा छोडि दये। 

सस्तु प्याज अबि छौं दीणू,
सस्तु नाजों बंदोबस्त बि हुणु,
नाज-प्याज खै-खै कि, निचंद ह्वैकि तू स्ये जै,
ये देसकि सज-समाल,
फेर म्येरा हथों मा छोडि दये। 

सासु जिन यु कै यालि,
पुन्गड़ी तुमरि मै दये यालि,
कमों बेटा इथ्गा प्याज, जु सासु चुनौ जीति जै,
ये देसकि सज-समाल,
फेर म्येरा हथों मा छोडि दये। 

"पुजै" हैंका साल ह्वैलि,
धरयाँ तब तै स्यु प्याज च्वैलि,
दारु-बुग्ठ्या बि ऐ जालु, खै-प्ये वोट दये कि जै,
ये देसकि सज-समाल,
फेर म्येरा हथों मा छोडि दये। 

फेर तू ना मै पछयाँणि,
खांण-प्योणे फेर छ्वीं नि लाणि,
हमरि मुखाभेंट फेर, हैंका चुनौ मा होलि भै,
ये देसकि सज-समाल,
फेर म्येरा हथों मा छोडि दये।   

Copyright @ Vijay Gaur 
२२/०८/२०१३ 

Wednesday, 21 August 2013

"स्वीणु"

बिनसिरि मा अफि अफि, 
य क्व हैंसाणि आज?
य सबेर कनि अपड़ी सी,
छ्वीं लगाणी आज। 

            (१.)
बडुलि सि झणि कु लगाणु, 
आज ईं रतब्याण मा,
चखुलि सि मन थैं उडाणु, 
क्वी त वे असमान मा,
क्वी त वे असमान मा ........ 
अचणचक ये सुख्यां मन यु कनु,
छ्वयों पाणि आज?
बिनसिरि मा अफि-अफि. ..... ....... 

            (२.)
यु कु अजाण हात अयूं च, 
अफ़ि म्यरा हात मा,
कैकि माया य मै लिजाणि, 
वीं जुन्यलि रात मा,
वीं जुन्यलि रात मा. ......... 
होलि कैकि खुद य,
ज्व मै खुद्याणि आज? 
य सबेर कनि अपड़ि सी............ 
            
             (३)
तू छै त लुकणी छै किलै?
नि छै त न्यूतणी छै किलै?
लुकणु-न्यूतणु कब तैं रालु,
यु छुची दिन-रात मा
यु छुची दिन-रात मा....... 
ये जिकुड़ा मा य कनि ,
चुला सी आग भुबराणि आज?
बिनसिरि मा अफि-अफि....... 


विजय गौड़ 
कविता संग्रह: रैबार से 
Copyright @ Vijay Gaur 21/08/2013
Updated: ०४ जनवरी, २०२० 

Monday, 19 August 2013

मेरो प्यारो उत्तराखण्ड …………………………

मेरो प्यारो उत्तराखण्ड, तू सदनि रैई अखंड,
तू मेरो ज्यु-ज्याँन,
त्वै स्येई म्येरि पछ्याँण, मैमु बस त्येरि रस्याँण, 
त्वी मान - सम्मान। 

मैखुणि क्य छै तु दुन्या थैं, 
आज मिन कनक्वै बतोंण।
नौना-ब्वै कु नातु बुल्दरा, 
आखरों कख बिटि खुज्योंण,
मुखुड़ि म्येरि, त्येरि अन्वार, 
त्वी जिकुड़ि मा, त्वी छै भ्यार,
त्वी धरम, त्वी ध्यान,
मेरो प्यारो उत्तराखण्ड ………………………… 

वुन त त्वे छोड़ि क आज,
दूर भिंडी ऐग्युं मि दूर,
त्येरि सौं त्येरि खुद य कबि,
होंदि नि, द्वी घड़ि बि दूर,
दुफरा, रुमुका, राति-सबेर,
समलुणम कबि व्है नि देर,
भुयाँ रौं चा असमान,
मेरो प्यारो उत्तराखण्ड ………………………… 

खैरि का दिन जब अंदन कबि त,
जागि जन्दन नौना -बाला त्येरा।
चूंदा घौ - दुखदों मौल्याणु,
लग्याँ घौर-बौण वला त्येरा,
ल्वै नि बगि जु हौरि ब्वै,
सुख-संति रखि जत्र्वै,
दैणु ह्वै जै भगवान्,
मेरो प्यारो उत्तराखण्ड ………………………… 

बाटा लगीं त्येरा जुन्यलि रात,
रालि न यनि फेर औंस यिख,
होण वलि च व बि सबेर,
त्येरि बि होलि तड़ी - धौंस यिख,
दीणा छाँ हम त्वै बचन,
राँका उठयाँ छन सबून,
बालु , दानु य़ ज्वान,
मेरो प्यारो उत्तराखण्ड ………………………… 

रचना : विजय गौड़ 
१९. ०८. २०१३ 
कविता संग्रह 'रैबार' से 
Copyright @ Vijay Gaur 19/08/2013


Tuesday, 13 August 2013

"जैंगुणु" (जुगनू)

यीं कविता कि रचना कश्मीरी हिन्दू पण्डित समुदाय कु अपणा घर कश्मीर बटी मूसलमान आतंकियों (येमा स्थानीय मुस्लिम समाज अर प्रशासन कि बि मूक सहमति छै) द्वारा कर्यां सातूं अर अंतिम देश-निकालु थैं मन मा रखि कि, वुँकि व्यथा पर हुईं च अर यना गैरा संकट क बगत म बि ये समुदाय क मनै भितर ज्वा आस छै वेथैं एक जैंगुणु क रूप म दयखदी य कविता सकारात्मक अंत कि ओर देखद। कविता कु शीर्षक जैंगुणु (जुगुनू) अँधेरा थैं चुनौती देंदु एक छ्वटा सी जीव की जीवटता से प्रेरित च। कुछ प्रेरणा बच्चन जी की कविता जुगुनू से बि लियी च। पाठक कविता थैं कै सन्दर्भों मा समझ सकदा। मेरु प्रयास 'जैंगुणु' से प्रेरणा लेकि कविता का कई अर्थ रंचणा कु च।

ह्वै यनु चक्रचाल* अगास* मा,
लुकि ग्येनि जून* - गैणा*।
सूढ़ - बथों* यनु ऐ धरति मा,
उज्यला* का कखि चिन्ह बि नि दिख्येणा,
पण यनि बकिबात* म बि, उज्यलु कनाकु कु ऐंठ्युं च? 
ईं अंध्येरि रात मा बि, यु दयु जलै कु बैठ्युं च?
             (१)
अगास बटी धै लगै - लगै,
अगास म घुमड़ै - घुमड़ै,
डरोणा, सुणोंणा बादल छन,
कि अब नि होणु उज्यलु भै,
पण यनि निरास मा बि, आसै ज्योत उठै कु ऐंठ्युं च? 
ईं अंध्येरि रात मा बि, यु दयु जलै कु बैठ्युं च?
            (२)
चुकापटो राज - पाटम यख,
भितरौं तलक डौर बैठीं च,
उठै जु मुंड चल्दा छाया,
वून घुन्डों मुंडलि क्वोचिं च,
पण यनु तमसौ वातावरण मा बि, जगदु मुछ्यलु पल्ये कु ऐंठ्युं च?
ईं अंध्येरि रात मा बि, दयु जलै कु बैठ्युं च?  
            (३)
(यि पँक्ति केदारनाथ आपदा क सन्दर्भ म बि समझे सकेंदन, वस्तुतः "कश्मीर आपदा १९ जनवरी, १९९०" क वास्ता  लिखी छन)

रौला - बौलों न, बगाणे ठैरीं च। 
रोणी-कंपणी मनख्यात सैरी च। 
देवि-दिव्तों क थान बि दयेखा,
गदन्यों मा हुईं तैरा-तैरि च,
पण यनि संकटै घड़ी मा बि, अड्ड लगै कु ऐंठ्युं च?
ईं अंध्येरि रात मा बि, दयु जलै कु बैठ्युं च?  

विजय गौड़ 
१३ अगस्त २०१३ 
updated on जनवरी ०४,२०२०। 
कविता संग्रह"रैबार" से

(अगास: मस्जिद की ऊँचाई। चक्रचाल: भूकंप सा।  जून: माँ-बहनें।  गैणा: बच्चे।  सूड़ -बथों: आतंकियों का बीभत्स रूप। उज्यला: आशा, भरोसा। बकिबात: कठिन परिस्तिथि। 

Monday, 12 August 2013

"भेड़चाल"

दगिड्यो,
अबि एक-द्वी हफ्ता पैलि कुमों मा कै पुरणा गितेर न नई कैसेट निकालि अर नौ धर्युं, "चौकलेट्या होंठ". याँ से पैलि गढ़वलि मा य उमाल कै बेर ऐ ग्ये। फुरकी बाँद, चखना बाँद, माया बाँद, चन्दा बाँद अर झणी क्य-२ हौरि बि. सच्ये हमरा गितेर/लिख्वार खुणि यनु कलम कु अकाल पोड़लु, सोचि नि छौ. यनि सिक्यसौर जै से हमरु स्तर सदनि खड़ोलूँ मा जाणु च, मन दुखि च. एक संदेस लिख्णु छौं, आस करदू कि तौं भग्यानों तलक पौञ्चलु। 

लिखदरों बतावा त क्वी,
"बाँदों" कि य कनि उमाल?
गाणवलों सुणावा त क्वी,   
बिरणी सि य कनि अंग्वाल? 
लिखदरों बतावा त  ……… 
गाणवलों सुणावा त ……… 

थड्या, चौंफुलों कि ज्वा औन्दि छै भौंण,
वा बन्सुलि, ढुलकि अब कैन घुरौंण?
तुम त मिस्याँ अफु बिसरौंण म,
तुमरि छ्वीं फेर कैन लगौण?
गाणवलों सुणावा त क्वी,
यु कनु ढब, कनि सज-समाल?
लिखदरों बतावा त  ……… 

"चंदा बांद", "फुरकी बाँद", 
"चखना", "चौकलेट्या बाँद"   
गढ़-कुमों इकसनि रोग,
"बाँद" हुईं बखरयों सि तान्द,
गाणवलों सुणावा त क्वी,
क्य बकिबात, स्यु कनु बबाल?
लिखदरों बतावा त  ……… 
      
बौगा ना सिन, छित्ये सिकासौर म,
ठटा नि लग्वांण, अपणु कबि हौर म,
पाड़ी छाँ, पाड़ी बणी हि रावा,
बौंण छाँ रैणा चा रैणा छाँ घौर म,
गाणवलों सुणावा त क्वी,  
मेरु छुचों बस यु हि सवाल 
लिखदरों बतावा त  ……… 
लिखणे कि य कनि अकाल? 
गाणवलों …………
लिखदरों ……….… 

रचना: विजय गौड़ 
१२ अगस्त २०१३ 
कविता संग्रह "रैबार" से   

लोखु कि प्रतिक्रिया: (फेसबुक मा)


भगवान सिंह जयाड़ा commented on your photo.
भगवान wrote: "बहुत सुन्दर चिंतन की बात छ गौड़ जी ,,,सच मा कभी कभी यना नॉऊ की कैसिट देखिक ,बडु अजीब सी लगदु ,सस्ती लोकप्रियता हासिल करण का वास्ता कुछ गायक और रचनाकार भाई अपरी गढ़वाली संस्क्रती कु अपमान छन करण्या ,जू बहुत दुःख की बात छ ,,,"

प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल commented on your photo.
प्रतिबिम्ब wrote: "अकाल ब्वालो भेड़चल ब्वालो .... सच मा गितेर लोग अपर खुद ही मजाक उड़ाना छन ..... पर लोग भी किले यों ते बढ़ावा दीना छन ..... भौत भल लेखी आपण विजय जी ... सब्यू ते सुचण प्वाडल ..."

Rawat Hindustani commented on your photo.
Rawat wrote: "आदर्श मार्गदर्शक"
Ashish Kuliyal commented on your photo.
Ashish wrote: "waaah supercb"
Surendra Semwal commented on your photo.
Surendra wrote: "Praud of uttrakhand....."

Narendra Gauniyal commented on your photo.
Narendra wrote: "gaud ji mushkil y chha ki harek mankhi ko apno star,apni soch,apni kshmta hoond.sikaseri ka karan kuchh log takna takan kardin.jab soch hi oonchi ni ho t ooncha star ka geet,sahity,lekhan,manchan kakh biti holu.samajh hamara samaaj ki theek ho t ina kauthger gitaron tai kwee tavajjo ni diye jali...fir ye tarah ka gitaar afu hi harchi jala...pan samaaj ma bi t kuchh oonka dagdya chhan..."
Anil Rawat3:09pm Aug 12
dada ye pailee bhi bhi sanka band, chandra chori, roopa..... kathgaiee chali gyee.

Mukesh Singh Rawat3:13pm Aug 12
waw waw bheji kya khub h pad kar bahut sundar laga ......

Manish Mehta3:21pm Aug 12
बिलकुल सही बात को भेजी

Raj Rawat3:36pm Aug 12
bahut sundar rachna bheji

Mukesh Singh Rawat3:13pm Aug 12
waw waw bheji kya khub h pad kar bahut sundar laga ......

सतेन्द्र रावत3:40pm Aug 12
सुन्दर सन्देश गाण वालू खिणी और सुणन वालू खिणी भी............


Manoj Rawat3:42pm Aug 12
yeh sab bakwas gana likhi ki in logo ne apne gadhwal ke naam ko bhi duboya hai ish industries aise gano per rok lagna chahiye

सतेन्द्र रावत3:58pm Aug 12
इना गाणु से हमर संस्कृति कु पता लगद, गान वालू थै अपनी संस्कृति कु ध्यान जरूर रखन पोडालु।


Devaki Nandan Kandpal8:20pm Aug 12
bhula hum eak cha ki kumu ki gadao...hum uttarakhandi cha....

Prem Singh Kunwar9:25pm Aug 12
wa vijay shab ek dam sahi boli aapan


Dinesh Chauhan10:57pm Aug 12
bhaji ap jani soch ta sabhu ki ni hondi
Pankaj Rawat12:40am Aug 13
Yu baando ki maya khoob lage yali
Kyu khatti kwee mithhi kwee muyali
Utpataang no dhairik yonl
Gadwaal ka noni badnaam kairi yali


Anil Rawat3:09pm Aug 12
dada ye pailee bhi sanka band, chandra chori, roopa..... kathgaiee chali gyee.

Rahul Rawat9:49am Aug 13
ये पब्लिक डिमांड है जिनकी संख्या २% भी नहीं है और ये गायक जिनकी यही मानसकिता है इन २% लोगों के साथ दो कौड़ी की इमेज बना रखी है। ये २% लोग खुद डिमांड नहीं करते बल्कि ये उनको परोसते हैं। दो कौड़ी का टाइटल और दो कौड़ी के बोलों से ये उपर नहीं उठ सकते।

मुझे इन गायकों से परेशानी नहीं है ये जो मर्ज़ी गायें बजाएं बस इनकी उस मानसकिता से है जो ये कहते है की ये पब्लिक डिमांड है। ये नहीं कहते की हमारे बस का यही है

Prem Singh Kunwar10:05am Aug 13
thik beji aap ekdam manpasand ki baat likhdan bhut badiya

Rahul Rawat10:18am Aug 13
मैं पूरी गारंटी देता हूँ की अभी काफी समय तक वो दौर नहीं आने वाला क्योंकि आप जैंसे अच्छी सोच वाले कलाकार उभर कर आ रहे हैं। किशन महिपाल, बिरेन्द्र राजपूत, विनोद सिरोला ने अभी पहाड़ की परंपरा की लाज रखी है तो साथ में अनुभवी नरेन्द्र सिंह नेगी नेगी, प्रीतम भारतवाण जिनसे लोक गायक इस समाज में है।

हाँ अगर ये लोग नहीं होते तो ये दो कौड़ी के टाइटल और दो कौड़ी के बोलों से उत्तराखंड भी प्रदूषित हो जाता।

Rawat Hindustani10:12am Aug 13
"अप्प दीपो भवः "
जहां रहेगा वही रौशनी लुटायेगा !
चराग का अपना कोई मकां नहीं होता !


Tuesday, 6 August 2013

हिटणु रै!!!(संसोधित)

दगिड्यो,
भिंडि दिन बिटिंन आप सब्यों क बीच ऐ नि सक्युं, कारण कुच भै-बंद जणदा छन अर कुच थैं मि अब बथै देंदु। जुलाई २४ कु हमरा पूज्य पिताजी श्री सुरेशानंद जी गौड़ (सेवानिवृत प्रधानाचार्य एवं प्रथम अन्वैषक(PIONEER), जनता इंटर कॉलेज हल्दूखाल)  हम्थैं यखुलि छोडि स्वर्ग चलि ग्येनि, य हानि कबि पुरये साकलि, मै नि पता. मन कथगा दुखि च, ल्येखि नि सकदु। सुचणु छौ कि अब अग्नै कुच नि लिखण, फेर सोचि कि क्य एक शिक्षक जैन सरया ज़िन्दगी समाज निर्माण मा समर्पित करि, वूं थैं यु भलु लागलु, जवाब ऐ "ना". त अपणि एक कविता पूर्ण संसोधन क दगड़ी सुनांणु छौं ज्वा पूज्य पिताजी थैं समर्पित च. यु मन्ख्यात खुणि वुन्कू रैबार, माध्यम म्येरि कलम अर सीख वुंकी। आप सब्यों क सामणी कविता प्रस्तुत च. 


हिटणा कु दियीं खुट्टी,
रै मनखी हिटणु रै!!!
बुटणा कु दियीं च स्या मुट्ट,
तू बुटणू  रै!!!

कबि उकाल - कबि उंदार सि बाटू ज़िन्दगी कु,
ये थैं तिर्छोड़ी कनै कि हिकमत करणु रै!!!
हिटणा कु दियीं खुट्टी.........

उन्द अटगणे कि लगिं होड़ ये मुलुक अब,
उकल्या बणि बि तू यूँ स्ये अग्नै पौंछुणु रै!!
बुटणा कु दियीं च स्या मुट्ट........

सच थैं अब जरा भिंडि दबाणु स्यु झूठ यिख,
द्वी घड़ीम पलट्येलु यु ढुंगु, बाटु हेरुणु रै!!!
हिटणा कु दियीं खुट्टी.........

क्वी धक्यालू अग्नै त क्वी पिछ्नै त्वैई,
अपणा- परया पछ्याणि स्ये मन मा लिखणु रै!!!
बुटणा कु दियीं च स्या मुट्ट........

छंट्येलु अँधेरु, होलु उज्यालु सिंनक्वली,  
ढान्डू-कांडों मा तब तलक तू सकणु रै!!! 
हिटणा कु दियीं खुट्टी.........

ज्योंन मनखि कि वेन दियीं त्वै कना कु कुच, 
वेकु बुल्युं कैयालि? अफु स्ये पुछणु रै!!!
बुटणा कु दियीं च स्या मुट्ट........

खैरि-विपदों कि लम्बि लंगात जब दयेखा तब,
लगै कि अड्ड दूर धार पोर स्यों ठेलुणु रै!!!
हिटणा कु दियीं खुट्टी.........

ब्वै-बाब रैनि कैका सदानि दगडि यिख,
मि बि छ्वरयों, भोल तु बि छ्वरयेलि, बिन्ग्णु रै!!!  
बुटणा कु दियीं च स्या मुट्ट........

कबि त मुंड मलसणों आला पित्र त्येरा ड्यार बी,
मोल-माटन लीपि खान्दम वुन्कू बाँठु बि धरणु रै!!!
हिटणा कु दियीं खुट्टी.........

रचना: विजय गौड़ (कविता संग्रह "रैबार" से)
22.08.2012 (11.50 PM)
(संसोधन दिनांक ०७/०८/२०१३, पूज्य पिताजी को मरणोंपरांत समर्पित)  

Copyright @ Vijay Gaur 07/08/2013

Tuesday, 23 July 2013

"ज़िन्दग्युं रैबार"

यीं कविता क माध्यम से म्येरि कोसिस च कि मनखि कु ज्योँन ज्व झणी कथ्गा हौर ज्योंन जीणों बाद मिलदा, वेथैं हम सबि हैन्सि-खेलि जीणों कोसिस कारा. म्येरि कविता मा म्येरा पहाड़ो सन्दर्भ नि ह्व़ा, यनु ह्वै नि सकदु, वेका बिना कविता पुरये हि नि सकदी त मिन अपणा भै-बन्दों सणी द्वी अंतरा आखिर मा जरुर लिख्याँन, बक्कि कविता उन सबि मनखि जात खुणि बि च. 

"ज़िन्दग्युं रैबार"

ज़िन्दगी वेन ज्युंणों दियीं, ज़िन्दगी ईं काटा ना,
अफु हैन्सा, हौरों हंसैल्या, अन्सधरि बाँटा ना।

जख लचारि तुम थैं आसन दयेख, 
जख टुटदि सांस बिस्वासन दयेख, 
विधातौ रैबार बिन्ग्याँ, हुयाँ छांटा ना,
अफु हैन्सा, हौरों हंसैल्या, अन्सधरि बाँटा ना ……… 

जब कैमा क्वी ऐब दिखेणु,
जब कै मन फरेब दिखेणु,
मुख अग्नै बुल्याँ, खुज्ययाँ चेला-चांठा ना,
अफु हैन्सा, हौरों हंसैल्या, अन्सधरि बाँटा ना ……… 

अब पाड़ मा क्वी रौंण नि चाणु,
जु उन्द ऐ ग्ये, उब जौंण नि चाणु,  
यिख सब्यों बजार चयेणा, डाँड-काण्ठा ना,
अफु हैन्सा, हौरों हंसैल्या, अन्सधरि बाँटा ना ……… 

जब तुम थैं क्वी अपडु नि बथाणु,
जब पाड़यों कु क्वी ठटा लग्वाणु,
वोटै चोट मारा, बण्या रा लाटा ना,   
अफु हैन्सा, हौरों हंसैल्या, अन्सधरि बाँटा ना ……… 


विजय गौड़ 
२४.०७.२०१३ 
कविता संग्रह: रैबार से 

Copyright @ Vijay Gaur 24/07/2013



Monday, 8 July 2013

क्य यी प्रीत च?

हैंसद-हैंसद हि रोण लगि जांदु,
बैठ-बैठि हि जौंण लगि जांदु, 
स्योंण चांदु छौं, स्ये नि पांदु,
य कनि रीत च?
क्य यी प्रीत च? क्य यी प्रीत च?

क्य-क्य सुच्णु छौं मि,
मैं थैं हि नि पता,
तुम थैं पुछणु छौं मि,
क्वी त मै थैं बथा,
मन मा फूलों कि फुल्दी फुलार, 
जख दयेखा तख अयीं मौल्यार, 
य कनि रीत च?
क्य यी प्रीत च? क्य यी प्रीत च?

आज होणु च जु,
यनु त पैलि नि ह्वै,
क्वी अजाण मै से,
मै थैं लूछि ल्ये ग्ये,
वीं थैं सुच्णु, वीं थैं बंच्णु, दिन मा सौ-२ बार,
मुंड-हात कुच नि तच्णु, फेर बि मै बुखार,
य कनि रीत च?
क्य यी प्रीत च? क्य यी प्रीत च?

दिख्णु चाणु छौ कुच,
आंख्यों हौरि दिख्ये,
बिन लिख्याँ मेरो मन,
कैकु नौ ग्ये लिख्ये,
तुमखुणि बि ऐ कबि यनु रंत-रैबार,
मन मा ख्याल वींकु, आन्ख्यों मा मायादार,
य कनि रीत च?
क्य यी प्रीत च? क्य यी प्रीत च?

विजय गौड़ 
कविता संग्रह,"रैबार से" (०८।०७।२०१३)

Copyright @ Vijay Gaur 08/07/2013


    

Friday, 5 July 2013

म्येरा मुलुक !!!

हुईं रालि यनि रुमुक, यिख कब तलक?
म्येरा मुलुक कब होलि सबेर?
आलो घाम कब तलक?

करम तुमरा, अर भोगणा हम छाँ साख्यों बिटी,
पलणा हम, कमौणा तुम, बौंण-पाखों बिटी,
खाणे नाम सदनि अबेर,
बस कामि-काम कब तलक?
म्येरा मुलुक ................................................

फट्दा बादल, रड़दा डांडा, जख दयेखा तख,
पाड्यों भाग म रोणु, सुख पर दुन्या कु हक,
खल्याणों गुसैं, दांदा भैर,
हे राम कब तलक,
म्येरा मुलुक ................................................

मुलुक म्येरू, भैरा क पर् वाण जब दयेखा तब,
उज्यलु म्येरू, हौरौं न जलांण, कब छुटलू ढब,
रौल्युं-रौल्युं पाणि ठैर,
बणदा डाम कब तलक,
म्येरा मुलुक ................................................

रचना: विजय गौड़
कविता संग्रह, "रैबार" से
०५।०७।२०१३  

Copyright @ Vijay Gaur  05/07/2013    

Wednesday, 3 July 2013

हिटा भै-भैण्यो साथ-साथ!!!

खैरि-विपदों कु बगत अयूँ च,
हिटा भै-भैण्यो साथ-साथ,
रड़दी,बगदी मनख्यात का खातिर,
उठा भै-भैण्यो, मिला त हात

क्वी लचार त्वै धै च लगाणु,
मुलुक हुयुं ल्वै-ल्वै च बथाणु,
रौल्यों गलणी स्यीं गात क खातिर,
रीटा भै-भैण्यो ताल-मात,
खैरि-विपदों कु बगत अयूँ च हिटा........................

कखि बचपन ब्वै-बाब खुज्याणु,
कखि क्वी मन अफु धीत बंधाणु,
दिन मा हुईं स्यीं रात खातिर,
कारा भै-भैण्यो, उज्यलै कि बात,
खैरि-विपदों कु बगत अयूँ च हिटा........................

कुच दिब्तों कु रैबार च आणु,
पण लाटा त्वे स्ये नि बिन्ग्याणु,
ये रुसयाँ बद्री-केदार का खातिर,
सोचा भै-भैण्यो, मिलि-बैठि साथ,
रड़दी,बगदी मनख्यात का खातिर, उठा ......................

रचना: विजय गौड़
०३।०७।२०१३
कविता संग्रह, "रैबार" बिटी ...

Copyright @ Vijay Gaur 03/07/2013


  

Thursday, 27 June 2013

लोला अब कैथें खुज्यान्दु!!!

ऐंच म्येरा उत्तराखंड मा गों क गों बौगि ग्येनि। बुन-बच्याण कु बि मनखि नि बच्यान। यनु हि कै यकुलु बच्युं मनखि क मन का भाव सबि भै-भैनों तक पौंचाणु छौं।म्येरा सबि उत्तराखंडी भै-बन्दों यु हम सब्यों सणी रैबार बि च, बिग्याँ अर मुल्क खुणि कुच कर्यां।

मन रै कख-कख छै जांदू,
लोला अब कैथें खुज्यान्दु,
सरग न सबि सोरि-पोंछि,
अपणु-परया, क्वी त रान्दु,
मन रै कख......................

पाड़ सियूँ छौ निचंद,
सुपन्यो वलि स्वाणी निंद,
यनि ऐ बगतै कि मार,
हिलि ग्ये बद्री-केदार,
फेर कै थैं धै लगान्दु,
मन रै .............................

कैमा जैकि रोण तिन,
विपदा कै सुणोंण तिन,
आंख्यों पाणि पोछ लोला,
अफु थैं अफ़ि बुथ्योंण तिन,
गयुं, बौड़ी नि आन्दु,
मन रै .............................

चखुला घोलूँ गैनि सब,
त्येरु मुलुक, त्येरि लडै अब,
रुसयाँ दिब्तों मनै कि,
चड़ी जा स्यी उकाल अब,
बगत त्वै स्ये यु हि च चांदू,
मन रै .............................

रचना : विजय गौड़
कविता संग्रह, "रैबार" से
२८।०६।२०१३

Copyright @ Vijay Gaur 28/06/2013









Wednesday, 12 June 2013

ठोका छत्ति बोला, हम कुमों-गढ़वाल का !!!!

भै-भैण्यों! आज हमरा उत्तराखंडी समाज मा एक बदलाव दिखेणु, हम लोग जागरूक हूणा छाँ। आज कु युवा सवाल पुछणु सिखणु च जु म्येरा मन थैं एक नयु रैबार दीणू च। 
मि येतेंन एक रचनात्मक बगत क रूप मा दिखणु छौं, भलु बदलाव क रूप मा दिख्णु छौं। ये हि विषय पर म्येरि य गढ़वली कविता, आस मा छौंऊ कि जन मितै दिखेणु, तनि आप बि दिखणा होला, अगर अज्युं नि दिखणा त कविता पौढ़ी दिखण बसिल्या, समझण बसिल्या। रैबार जरुर याद रख्याँ .......


दिदौं, औंण वला छन दिन अब म्येरा पहाड़ का,
ठोका छत्ति बोला, हम कुमों-गढ़वाल का।।

'ब' अर 'ख' से उब उठुणु समाज अब,
छ्वटि जात-बडि जात कु टुटणु रिवाज अब,
उठदि सोच, पढ़याँ-लिख्यों कु राज अब,
धार-खालों कु बदलुणु मिजाज अब,
जिकुड्यों आग सुलगणि,
औणान दिन उमाल का,
ठोका छत्ति बोला ..................................

बिंगणी मनख्यात चकडैतों कि चाल अब,
बँटयां गढ़वली-कुमै वलु, नि रै वु साल अब,
सरया उत्तराखंड एकि सवाल अब,
मुलुक मा लाण 'विकासौ बबाल' अब
जौलि ग्येनि रांका, 
नि रैनि दिन जग्वाल का,  
ठोका छत्ति बोला ..................................

बुटि ग्येनि मुट्ट, मिलि ग्येनि हात अब,
'उत्तराखंडी' छोड़ी, नि रै क्वि जात अब,
निवास्युं कि कारा चा प्रवास्युं कि बात अब,
मुल्कौ खुणि हिटणा, सबि साथ-साथ अब,
भौ त व्है ग्ये भेद-भौ,
अब दिन अंग्वाल का,
ठोका छत्ति बोला ..................................

रचना:  विजय गौड़ 
कविता संग्रह "रैबार" से (१२।०६।२०१३) 

Copyright @ Vijay Gaur 12/06/2013