Wednesday, 22 July 2020

विजय की बुद्धिजीविता: आलेख ४


क्या अल्लामा इक़बाल का 'सारे जँहा से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा'  "दारुल हर्ब" के लिये लिखा काव्य नहीं था?: विजय गौड़ द्वारा एक पूर्वपक्ष 

आज संध्याकाल में मैंने 'जयपुर डायलाग' नामक एक यूट्यूब चैनल (जिसका मैं नियमित श्रोता/दर्शक हूँ) का संपादन करने वाले श्री संजय दीक्षित जी का आज का विडिओ देखा जिसमें उन्होंने 'कश्मीरियत' पर अपना विमर्श रखा है (लिंक साझा भी कर रहा हूँ) जोकि पूर्ण रूपेण तथ्य आधारित विश्लेषण है। उसके उपरान्त मैंने आवश्यक समझा कि इसी से मिलता-जुलता विमर्श मैं भी मो० इकबाल के उदाहरण के साथ सबके सम्मुख रखूँ।   
मो० इक़बाल जिनको कि अल्लामा इक़बाल के नाम से भी जाना जाता है को भले ही आज का भारतीय युवा नाम से न जानता हो परन्तु उनके काव्य "सारे जँहा से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा" को अवश्य ही जानता है। भारत की 'सेक्युलर' राज्य सत्ता द्वारा स्थापित स्कूल व्यवस्था में यह 'समूह गीत' के रूप मेरे अध्ययन काल में प्रतिदिन गाया जाता था (मुझे पूर्ण विश्वास है कि आज भी बच्चों से गवाया जाता होगा) और यदि आप अरबी/पारसी युक्त हिंदी में पारंगत हैं तो इस काव्य को पढ़/सुनकर गौरव की अनुभूति भी अवश्य करेंगे और मेरा मानना है कि करनी भी चाहिये। यह जो नैरेटिव है इसे तो सिनेमा या स्कूली शिक्षण प्रणाली के माध्यम से बड़े वृहद् रूप में आगे बढ़ाया गया परन्तु क्या यह आवश्यक नहीं कि इन्हीं इक़बाल की लिखी 'तराना ए मिल्ली' के बारे में आम जनमानस को बताया जाता? क्या यह प्रत्येक नागरिक का अधिकार नहीं है कि उसे पूरी सूचना दी जाय न कि मात्र महिमामण्डन वाली? क्या इस प्रकार के नैरेटिव का कुछ विशेष उद्देश्य था? क्या आज की पाठ्यपुस्तकों में कहीं यह सूचना दी जाती है कि मो० इक़बाल के साहित्य की भूमिका भारत विभाजन में क्या थी?  शिक्षण व्यवस्था का उद्देश्य विद्यार्थियों में उनके स्वयं के चिंतन, सत्य-असत्य के विवेक का विकास करना होना चाहिये न कि एक ओर की ही सूचना देकर उनकी सोच को संकुचित करना।  

मो० इक़बाल को पाकिस्तान का 'राष्ट्रकवि' और 'स्पिरिचुअल फादर' माना जाता है और इसमें कोई संदेह नहीं कि 'दो कौमी नजरिया' या 'Two Nation Theory' के नाम पर भारत को विभाजित करने वाले जिन्ना उनके शिष्य थे। (उनके विकिपीडिआ पेज पर भी जिन्नाह को उनके दर्शन को मानने वालों में बताया गया है) अतः वे इस्लाम की 'दारुल इस्लाम' (इस्लामिक स्टेट, state ruled by Islamic Sharia law) और 'दारुल हर्ब' (State which is not under Islamic law) की रूपरेखा को भलीभाँति समझने वाले ज्ञानी इंसान थे। 'दारुल हर्ब' के लिए कुछ विशेष 'code of conduct' (व्यवहार में प्रयोग की जाने वाली नियमावली) भी इस्लामिक मनीषियों द्वारा दिये गये हैं और उसमें मुख्य है कि उन्हें एक विशेष रणनीति 'स्टेट ऑफ़ वार' में रहते हुये इस्लाम के विस्तार हेतु कार्य करना है।श्री संजय जी ने इसका सुन्दर विश्लेषण किया है। इन बिंदुओं की पूर्ण विवेचना के उपरान्त ऐंसा प्रतीत होता है कि मो० इक़बाल की यह कविता (तराना ए हिंद) 'सारे जँहा से अच्छा' एक 'बुद्धिजीविता युद्ध' को ध्यान में रखते हुए लिखी गयी थी जिसका उद्देश्य भारतीय समाज (दारुल हर्ब) को सकारात्मक रूप से प्रभावित कर अपने दीर्घकालीन लक्ष्य (दारुल इस्लाम) को प्राप्त करना था। पाकिस्तान के लिये लिखा 'तराना ए मिल्ली ' मो० इक़बाल की इस्लामिक स्टेट (मुस्लिम भाईचारा, मुस्लिम ब्रदरहुड ) की स्पष्टता का धोतक है जिसमें वे स्पष्ट रूप से पूरे विश्व को 'इस्लामिक स्टेट' बनाने की बात करते हैं।  

चीनो-अरब हमारा, हिन्दोस्ताँ हमारा। 
मुस्लिम हैं हम वतन हैं सारा जँहा हमारा।।

उनके लेखों से यह भी स्पष्ट है कि यह भाईचारा वह शाँति मार्ग द्वारा स्थापित करने की बात नहीं करते। अपनी ही कविता 'शिकवा' में वे अपने अल्लाह के लिए यह लिखते हैं : -

तुझको मालूम है लेता था कोई नाम तेरा। 
कुव्वत-ए-बाजु-ए-मुस्लिम ने किया काम तेरा।।

उनकी इन पँक्तियों से स्पष्ट होता है कि उनकी मान्यता के अनुसार इस्लाम जनमानस के ऊपर बाहुबल का प्रयोग कर थोपा जाना उचित है। क्या यह महिमामण्डन एक सभ्य समाज के लिये सही है? आगे इसी में वे तलवार के बल पर पाई हुयी राजसत्ता का समर्थन करते हुए दिखते हैं जिससे यह स्पष्ट होता है कि वे इस्लाम के विस्तार के लिये अपनाये गये हिंसा के मार्ग का समर्थन करते हैं: -

पर तेरे नाम पर तलवार उठाई किसने। 
काट कर रख दिये कुफ्फार के लश्कर किसने।।

वे इस्लाम के पतन को लेकर दुःखी भी दिखते हैं परन्तु उनके शब्द चयन से आप स्पष्ट रूप से देख सकते हैं कि इसके पीछे की सोच कौन सी है। 

कहर तो ये है है कि काफिर को मिले हूर-ओ-क़ुसूरल। 
और बेचारे मुसलमान को फ़क़त वादा ए हूर।।

समय-२ पर उनके कुफ्फार/काफिर शब्दों के प्रयोग से उनकी 'अपने लोग और अन्य' वाली सोच भी स्पष्ट होती है। 

इसी रणनीति का प्रयोग 'तथाकथित हिंदी सिनेमा' जोकि वस्तुतः उर्दू सिनेमा है, भी करता आया है यह आप उनकी फिल्मों के बदलते स्वरुप (१९४७ से लेकर वर्तमान तक) से भी समझ सकते हैं। इसका विश्लेषण आने वाले समय में अन्य लेखों द्वारा आपके सम्मुख रखूँगा। 


नोट: 
१) लेख का ध्येय किसी मत/पँथ की मान्यताओं का असम्मान कदापि नहीं है। शब्द मात्र विश्लेषण हेतु लिये गये हैं। यह लेख मात्र मेरी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रयोग कर जनसामान्य के साथ चर्चा हेतु लिखा गया है। 

२) मैंने संजय जी के नाम के आगे सम्मान स्वरूप 'श्री' शब्द का प्रयोग किया है परन्तु मो० इकबाल के नाम के आगे इसका  प्रयोग नहीं किया है क्यूँकि 'श्री' शब्द हिन्दू सँस्कृति से आता है और वर्तमान में इस पर आपत्ति भी हो सकती है, भावनाएँ आहत भी हो सकती हैं। 'श्री' न लगाने से मेरा आशय उनका असम्मान करने से नहीं है। यह भी ज्ञात हो कि इक़बाल स्वयं कश्मीरी हिन्दू परिवार से थे और उनका अरबी/पारसी/तुर्क इस्लामिक वंशावली से कोई संबध नहीं था। 

आलेख: 
विजय कुमार गौड़ 
दिनाँक: २२ जुलाई, २०२० 
स्थान: कैलीफॉरनिया, अमेरिका

Saturday, 18 July 2020

जननी!!

जननी जब तू वीर जने,
तब ही भारत, भारत बने।
हे मातु! होती धर्म-स्थापना,
जब तू कौशल्या-देवकी बने।।

शिव की शक्ति तू ही,
नारैण की भक्ति तू ही।
तू शारदा, तू सरस्वती,
है ब्रह्म की आसक्ति तू ही।
प्रकृति बन जब तू हो प्रकट शनैः-शनैः,
तब पुनः जीव-जीवन बने।

तुझसे उदय हो धर्म का,
तू है सँहार, अधर्म का। 
है तुझे वरदान जग जन्म का 
तू ज्ञान प्रथम दे कर्म का। 
जब सृष्टि पर कुदृष्टि के बादल घने,
तब तू पर्वत सी अटल तने 
जननी जब तू वीर जने,
तब ही भारत, भारत बने। 


@ विजय गौड़ 
जुलै, १८, २०२० 
मॉडेस्टो। 



Saturday, 4 January 2020

मनोभाव

 “मनोभाव

उत्सवों के आगमन मेंपितरों के इस भवन में।
हो एकत्रण हमारामन यही हो प्रण हमारा।।

है यही अंतःकरण में,
यही है आवरण में।
है यही गगन हमारा,
हो यहीं मिलन हमारा।
उत्सवों के आगमन मेंपितरों के इस भवन में.....

स्मृतियों का आँगन,
है पवित्रहै ये पावन,
है ये आचमन हमारा,
हैं यहीं तो धन हमारा,
उत्सवों के आगमन मेंपितरों के इस भवन में.....

जीवन घटे कँही भी,
पर मन रहे यहीं ही,
ये तीर्थ है हमारा,
है यही मेरा देवाला,

उत्सवों के आगमन मेंपितरों के इस भवन में,
हो एकत्रण हमारामन यही हो प्रण हमारा।।

दीपावली २०१९ को अपने पैतृक आवास के चित्र को देख उपजे मनोभाव।
रचनाविजय गौड़
दिनांकऑक्टोबर २६२०१९

तुम कौन हो??

तुम कौन हो??

एक क्षण सहेली सी,
दूसरे में पहेली सी
एक क्षण साथ-
दूजे में अकेली सी
एक क्षण श्वेत-शुभ्र,
क्षण में हो मैली सी
एक क्षण प्रेम-माधुर्य
पुनः होती कसैली सी
तुम कौन हो?
जो मौन हो?
या जो शब्द हो?

एक क्षण प्रश्न सी,
दूसरे में कृष्ण सी,
एक क्षण हिमाद्र सी,
दूजे में अति उष्ण सी,
एक क्षण मुझमें निहित
क्षण में हो किसी और निमित्त
एक क्षण दिवास्वप्न सी 
पुनः होती दु:स्वप्न सी
तुम कौन हो?
जो कल थी?
या जो आज हो

एक क्षण संयोग सी
दूसरे में वियोग सी
एक क्षण अनुराग सी
दूजे में विराग सी
एक क्षण तुम हो फलित
पर तभी तुम हो व्यथित
एक क्षण संसार सी
पुनः होती संहार सी
तुम कौन हो?
जो अदृश्य थी?
या जो साफ हो?

@विजय गौड़

Monday, 5 November 2018

श्री सुरेशानंद गौड़: प्रतिक्षण चुनौती से लड़ता व्यक्तित्व  

जन्म: जनवरी ०२, १९३८ (१० वीं कक्षा के प्रमाण पत्र अनुसार). कुंडली के अनुसार जून १९३६ में जन्म हुआ। 
जन्म स्थान: ग्राम बवाणी, पट्टी बूंगी, विकास खंड - नैनीडांडा, पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखण्ड। 
पिता का नाम: श्री चन्द्रमणि जी गौड़ 
माता का नाम: श्रीमती शान्ति देवी जी गौड़ (औंलेथ कुकरेती परिवार से)
पारिवारिक सदस्य: दो बहनें। अग्रजा: श्रीमती गणेशी देवी (कांडी बिजलोट विवाहित), 
अनुजा: श्रीमती देवकी देवी (चैबाड़ा, ईडिया विवाहित)
पत्नी: श्रीमती देवी गौड़ (मैंदोला परिवार द्वारी, पट्टी पैनो से)
संतान: एक पुत्री एवं चार पुत्र। 
१. श्री विनोद गौड़ 
२. श्रीमती पुष्पा भदूला 
३. श्री संजय गौड़ 
४. श्री अजय गौड़ 
५. श्री विजय गौड़ 
अगली पीढ़ी में ५ परपौत्र एवं ५ परपौत्रियाँ। 
मृत्यु: २४ जुलाई, २०१३, दिल्ली में। 

प्रारम्भिक शिक्षा: आधारिक विद्यालय उमटा (घोड़कांद) 
१० वीं तक की शिक्षा: मथुरा दास प्रसादी लाल उच्चतर माध्यमिक विद्यालय रामनगर, नैनीताल, उत्तराखण्ड। 
१२ वीं एवं उच्च शिक्षा: हिन्दू कॉलेज, मुरादाबाद, उत्तर प्रदेश। 
टिप्पणी: ज्ञात हो कि उनके शिक्षण कालखंड में उत्तराखण्ड एक अलग राज्य के रूप में स्थापित नहीं था, अपितु उत्तर प्रदेश का ही भाग था। 
स्नातकोत्तर शिक्षा: मास्टर इन आर्ट्स (अर्थशास्त्र), मास्टर इन आर्ट्स (अंग्रेजी), बी टी (शिक्षण में स्नातक, बैचलर्स इन टीचिंग)

पिता चंद्रमणि जी ब्रिटिश शासित भारत में पटवारी (बाद में अमीन) के रूप में कार्यरत थे और अधिकतर घर से दूर ही रहे। आपका विवाह मात्र १५ वर्ष की आयु (उस समय ७वीं कक्षा के विद्यार्थी थे) में १२ वर्षीय श्रीमती से संपन्न हुआ। 

शिक्षक के रूप में प्रथम नियुक्ति आधारिक विद्यालय अपोला, बिजलोट या ईड़िया (स्पष्ट करना है), पौड़ी गढ़वाल में हुई। पिता के एकमात्र पुत्र होने के कारण उनकी इच्छा थी कि आप उच्च शिक्षा के लिये न जाँय एवं अपने घर के आस पास ही आधारिक विद्यालयों में शिक्षण करते रहें। अंतर्मन में कदापि पिता को यह भी संशय था कि उच्च शिक्षा के कारण कहीं आप घर छोड़कर बाहर रहना न शुरू कर दें परन्तु आपके मन में कभी भी यह विचार नहीं था। अपनी जन्मभूमि से अगाध प्रेम होने के कारण जीवन पर्यन्त न केवल उसे छोड़ा नहीं वरन क्षेत्र में एक प्रेरणा बनकर आने वाली पीढ़ियों के लिये उदाहरण प्रस्तुत किया। सूचित हो कि उस समय गढ़वाल क्षेत्र ही नहीं सम्पूर्ण भारत वर्ष में उच्च शिक्षण भारतीयों के लिये सरल नहीं था। देश से अंग्रेजों को गए हुये कुछ ही वर्ष हुये थे और वे तत्कालीन भारत को विरासत में विभाजन एवं भुखमरी दे गए थे। इन विपरीत परिस्थितियों में भी आपने अपना शिक्षण जारी रखा। अर्थशास्त्र एवं अंग्रेजी भाषा में स्नातकोत्तर किया। आप जहाँ भाषा के रूप में अंग्रेजी पर अच्छी पकड़ रखते थे परन्तु साथ ही साँस्कृतिक रूप से सम्पूर्ण रूप से भारतीय मूल्यों में रचे-बसे थे। 

सह-प्रधानाचार्य: राजकीय उच्चतम माध्यमिक विद्यालय, बढ़खेत, पैनो, पौड़ी गढ़वाल

उच्च शिक्षा का लाभ शीघ्र मिला और आप उच्चतम माध्यमिक विद्यालय बढ़खेत में मात्र २६ वर्ष की आयु में सह-प्रधानाचार्य  हो गये। अनुशाषित जीवन आपका मूल मंत्र रहा। कदापि ही ऐंसा कोई दिन रहा हो जब आपकी दिनचर्या प्रातः ५.३० बजे के बाद प्रारम्भ हुई हो। व्यक्तिगत एवं व्यावसायिक जीवन में नैतिक मूल्यों को सदैव प्राथमिकता देने वाले गौड़ जी (प्रचलित नाम) व्यसनों से एक दूरी बनाकर रखते थे। इसका प्रभाव विद्यार्थियों एवं समाज ही नहीं अपितु उनके साथी अध्यापकों पर भी पड़ा। धूम्रपान एवं मदिरा पान यदि कोई करता भी था तो उनसे छिपकर ही, ये उनके जीवन मूल्यों का सम्मान ही था। वे स्वयं किसी  से इस सम्मान की अपेक्षा नहीं करते थे परन्तु अनुशाषित एवं उच्च मूल्यों का निर्वाह करती जीवन शैली स्वतः ही उन्हें समाज में यह शीर्ष स्थान दे रही थी। संभवतः उनके लिये शिक्षक से अधिक उपयुक्त शब्द "गुरु"है क्यूंकि उनका चरित्र इस शब्द के अधिक समीप दिखता था। बड़खेत का उनका कार्यकाल उन्हें अब तक एक शिक्षक और कुशल प्रशासक के रूप में स्थापित कर चुका था।  

प्रधानाध्यापक: जूनियर स्कूल, हल्दूखाल 

जिस समय बढ़खेत एक उच्चतम माध्यमिक विद्यालय (इण्टर मीडिएट) के रूप में स्थापित था, हल्दूखाल में केवल ८वीं तक की शिक्षा (मिडिल) उपलब्ध थी। बूंगी क्षेत्र में अब सभी बुद्धिजीवी जनों को एक अच्छे शिक्षा संस्थान की आवश्यकता दिखनी प्रारंभ हो चुकी थी परंतु इस कार्य हेतु एक कुशल नेतृत्व की भी आवश्यकता थी। क्षेत्र ने इस कार्य हेतु सबसे उपयुक्त व्यक्ति आप में देखा। क्षेत्रीय जनमानस की ओर से लगातार हो रही माँग को आप ठुकरा न सके एवं अंततः १९६८ में अपनी उच्चतम माध्यमिक विद्यालय के सह-प्रधानाचार्य  की नौकरी जो आपको बेहतर एवं सफल भविष्य की ओर ले जा रही थी, का त्याग कर चुनौतियों से परिपूर्ण मिडिल स्कूल के प्रधानाध्यापक की जिम्मेदारी लेने हल्दूखाल चले आये। लक्ष्य यही कि बूंगी पट्टी में एक उच्चकोटि का शिक्षण संस्थान स्थापित कर सकें। 

प्रधानाचार्य: उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, हल्दूखाल 

१९७३ में ही मिडिल स्कूल हल्दूखाल जो कि केवल ८वीं तक की शिक्षा दे पा रहा था, उसे १० वीं तक के शिक्षण संस्थान में बदलने में सफल रहे। उसके बाद १० वीं विज्ञान वर्ग की मान्यता भी प्राप्त की। १९८० तक आते आते हल्दूखाल १० वीं तक की शिक्षा के लिये एक उच्च कोटि का विद्यालय बन चुका था और आपका एक मात्र ध्येय विद्यालय को नयी ऊँचाइयाँ दिलवाना रहा। विद्यालय में जैंसे -२ नई कक्षाएँ बढ़ती गयीं, विद्यार्थियों की सँख्या भी बढ़ी। विद्यालय जनता का था न कि राजकीय तो भवनों की व्यवस्था भी स्वयँ ही करनी थी।  

विद्यालय भवन निर्माण रणनीति: 

अपने समाज की उन्हें बहुत ही अच्छी समझ थी और प्रयास यही था कि न सिर्फ अपनी सांस्कृतिक विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाया जाय वरन समाज को एकजुट कर विद्यालय के लिए अपनत्व का भाव भी जागृत किया जाय। इस पुनीत कार्य में उनका साथ दिया अपनी परम्पराओं/त्योहारों ने। होली के समय पर बड़ी कक्षाओं के बच्चों एवं अध्यापकों को लेकर विद्यालय के नाम से होली उठायी गयी। उस समय पारम्परिक रूप से गाँव-२ जाकर प्रत्येक आँगन में होली गायी और खेली जाती थी। जिस किस भी परिवार के आँगन में होली होती थी, वह परिवार स्वेच्छा से कुछ पारितोषिक स्वरुप धन या अनाज देता था। एक साल की होली से कक्षा नौ के लिये भवन निर्माण किया गया। होली के बाद समय आता दशहरा/दीवाली का। तत्कालीन समाज में रामलीला का बहुत प्रचलन था। विद्यालय के कार्यों के लिए धनोपार्जन का यह भी एक अच्छा उपाय बना। ये कुछ ऐंसे प्रयास थे जो समाज को न सिर्फ एकजुटता देने में कारगर साबित हुए बल्कि विद्यालय हेतु धनोत्पार्जन के साथ-२ अपनी संस्कृति को निरंतरता प्रदान करने के वाहक बने। 

शिक्षा एवं समाज (जनता विद्यालय या राजकीय):

राज्य का शिक्षा में सीमित दखल होना चाहिए, आप इस विचार से पूर्ण रूप से आश्वस्त थे। यही कारण था कि विद्यालय राजकीय हो, इसके आप कभी समर्थक नहीं रहे। उनका मानना था कि शिक्षक एवं विद्यार्थी में जितना लगाव हो, शिक्षा उतनी आसान हो जायेगी। हल्दूखाल विद्यालय में ९०%शिक्षक स्थानीय थे जिनका विद्यार्थियों से सामजिक रूप में भी जुड़ाव रहता था  और यही कारण था कि उनके विद्यालय से सदैव अच्छे छात्र-छात्राएं निकले। 

तत्कालीन राजनीति में आपका बड़ा हस्तक्षेप था एवं श्री हेमवती नंदन बहुगुणा जोकि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री भी रहे, से काफी नजदीकियाँ थी। बहुगुणा जी लगातार विद्यालय को राजकीय करने की सलाह देते परन्तु आप जब तक प्रधानाचार्य रहे, ऐंसा नहीं होने दिया।  कारण ये कि विद्यालय राजकीय हुआ तो नये शिक्षक आयेंगे जो इस क्षेत्र के बाहर से भी हो सकते हैं। ऐंसे शिक्षकों का विद्यार्थियों से इतना प्रेम भाव नहीं रहेगा जोकि तत्कालीन स्थानीय शिक्षकों का है। किसी भी कारण शिक्षा की गुणवत्ता से समझौता हो ये आपको स्वीकार्य नहीं था। कभी-२ अपने इस स्वभाव के कारण आलोचना भी सुननी पढ़ती थी परन्तु अपने सिद्धांतों से हटना कभी मंजूर नहीं रहा। सूचित हो कि जनता द्वारा संचालित विद्यालयों में शिक्षकों को वेतन सरकार से प्राप्त होता था परन्तु विद्यालय प्रवंधन स्वयं समाज के ही हाथों में था। इस हेतु प्रवंधन समिति बनाई जाती थी। 

शिक्षण एवं सामजिक जागरण का तालमेल:

हल्दूखाल में जैंसे-२ विद्यालय का उच्चयन हुआ, बाजार का भी विस्तार होना शुरू हो गया। जहां विस्तार एक रूप से तरक्की लाता है, साथ ही कुछ चुनौतियां भी विकास के गर्भ में छुपी होती हैं। ऐंसी ही एक बड़ी चुनौती बनकर आयी 'शराब' .समाज के साथ-२ शिक्षा संस्थानों में भी इसका प्रकोप होने लग गया था। आपकी दूर दृष्टि ने इस विनाशकारी बदलाव को पहले ही भांप लिया था। हल्दूखाल में जनमानस को इसके विरुद्ध एकत्रित करने का कार्य किया और हल्दूखाल बाजार पर शराब का कम से कम असर रखने में सफल रहे। 

सेवा निवृत्ति: 

लगातार ३० वर्ष तक हल्दूखाल के प्रधानाचार्य के रूप में सेवाएँ देने के उपरान्त १९९८ में आप सेवा निवृत्त हुये। अवकाश लेने से पूर्व जूनियर स्कूल हल्दूखाल, उच्चतम माध्यमिक विद्यालय हो चुका था। बच्चों को १२ वीं तक की शिक्षा हल्दूखाल में ही मिलने लगी थी। संभवतः आप सम्पूर्ण उत्तराखंड में सर्वाधिक लम्बी अवधि तक एक विद्यालय के प्रधानाचार्य रहे हों। 

अन्य योगदान:

- उत्तराखंड राज्य आंदोलन में भागीदारी। 
- क्षेत्र में खेलों को बढ़ावा देने हेतु व्यक्तिगत स्तर पर वॉलीबॉल प्रतियोगिता का आयोजन। 
- हल्दूखाल में एक मुख्य व्यक्ति के रूप में समाज का नेतृत्व/मार्गदर्शन। 
- अपने जन्म ग्राम बवाणी के ग्राम प्रधान भी रहे। साथ ही अपने जीवन काल में गाँव में सदैव निर्विरोध प्रधान की परंपरा को बनाये रखा। स्वतंत्र भारत में बवाणी में प्रथम बार प्रधान चुनाव आपके देहांत वर्ष २०१३ के बाद ही हुआ। 
- राजनीति और शिक्षा का ताल मेल बनाने की अभूतपूर्व क्षमता।

लेख: 
विजय गौड़ 
गौरवान्वित सुपुत्र श्री सुरेशानंद गौड़। 
वर्तमान निवास: कैलिफ़ोर्निया, अमेरिका। 




Wednesday, 5 July 2017

#pseudonationalist.


अभी-२ अरनब गोश्वामी की एक डिबेट देखी। उनका और उनके कुछ दक्षिण भारतीय मित्रों का कहना है कि हिंदी को राष्ट्र भाषा के रूप में नहीं बढ़ावा दिया जाना चाहिये। अंग्रेज़ी जो कि एक विदेशी भाषा है, उस पर एक भी सवाल नहीं और अपने ही देश की एक भाषा का इतना विरोध?? अंग्रेज़ी हमारी पहचान कैसे हो सकती है? संस्कृत ही सभी भारतीय भाषाओं की जननी रही है और एक तरह से हमारी पहचान भी। लेकिन अपनी पहचान को बढ़ावा नहीं और अंगरेजियत पर गौरव??

दक्षिण भारत को छोड़कर बाक़ी भी तो हिस्से हैं देश के वहाँ से तो इतना विरोध कभी नहीं आता। जब भी देश में किसी एक भाषा को राष्ट्रीय भाषा के रूप में आगे किया जाय, इनके पेट मे दर्द शुरु। मेरी भी अपनी दुधबोलि गढ़वाली है, मेरे लिये भी हिंदी एक अलग भाषा है लेकिन यदि वो मेरे देश को एकत्व देती है, एक राष्ट्र करने में सफल होती है तो फिर विरोध क्यों? अरनव की टी आर पी कम हो जायेगी लगता है अगर अधिक लोग हिंदी बोलने वाले हो गये तो। बुरा क्या है अगर एक अपने देश की भाषा में से कोई राष्ट्र भाषा हो जाय तो? मुख्य भाषा हमारी संस्कृत रही है, धीरे-२ हिंदी में अधिक से अधिक संस्कृत के शब्द समाहित किये जा सकते हैं। ये विरोध अंग्रेज़ी का क्यों नहीं होता दक्षिण भारत में ये बात मेरी समझ नहीं आती? अपने ही राष्ट्र की दूसरी भाषा से इतना बैर, तभी हम आज़ भी मानसिक ग़ुलाम हैं। ७० साल की आज़ादी के बाद देश इस हालत में नहीं पहुँच पाया कि हमें अंग्रेज़ी पर इतना आश्रित न रहना पड़े। जापान का उदाहरण ले, उनके कितने लोग दूसरे देशों में पलायन करते हैं दो वक़्त की रोटी के लिये? उनका कितना अंग्रेज़ीयत पर ज़ोर है? मेरा विरोध अंग्रेज़ी भाषा से नहीं इस अंग्रेज़ीयत वाली सोच से है जो अपने देश को दूसरों से नीचे देखती है। दूसरे देश की भाषा को ब्रिज लैंग्विज बना लेती है और अपने देश की ही एक और भाषा को ज़रा भी सहन नहीं कर सकती।

हम ऐँसे ही बँटे रहेंगे और दूसरों की भाषा बोलकर अपने ही देश को, अपनी पहचान को नीचा दिखाते रहेंगे। कल फिर कोई गजनी या गौरी या ईस्ट इंडिया कम्पनी आकर हम पर राज करेगी और उनका विरोध हम कभी नहीं कर पायेंगे। बनते हैं हम नैशनलिस्ट चैनल और बात दोगली। #pseudonationalist.

Saturday, 30 April 2016

जै भोले भण्डरि!!(गढ़वलि शिव आरती)

जै-जै बोला दि भोला भण्डरि,
कष्ट-विपदों तरि,
मनसा पूरण करी....... (कोरस)

ऐँच ह्युंचुलों मा, भोले वास तेरु ....(कोरस)
नंदा-नंदी को सदनि, संग-साथ तेरु...... (कोरस)
देवतों-मनख्यों कु त्वी परहरी..... 
कष्ट-विपदों तरि,
मनसा पूरण करी....... (कोरस)

सजदि बागम्बरि,  तनमा धूलि रमीं, ....(कोरस)
घुरकी हथ हुड़की, गंगा लटुल्यों थमीं, ....(कोरस)
ह्युं कि चदरी तेरा चौंछड़ि  ..... 
कष्ट-विपदों तरि,
मनसा पूरण करी....... (कोरस)

रौलि-गदनि तेरी, धारा-पंद्यरा त्यरा, ....(कोरस)
जून,धरति,सुरज, गैणा,चखुला त्यरा,....(कोरस)
बूंगी वला बि त्यरा, बूंगी देवी त्यरी,
कष्ट-विपदों तरि,
मनसा पूरण करी....... (कोरस)

यिख विराज्यां हरी, उख माँ बूंगी शंकरी, (कोरस)
जौंन दरसन करि, तौंकि विपदा टरि।  (कोरस)
लगदि भगतों कि रैलि मण्डली।।।।।।।
कष्ट-विपदों तरि,
मनसा पूरण करी....... (कोरस)

जै-जै बोला दि भोला भण्डरि,
कष्ट-विपदों तरि,
मनसा पूरण करी....... (कोरस)

@कॉपी राइट विजय गौड़ 
आदरणीय पितजि कि स्मिर्ति मा हल्दुखाल, बूंगी मा बणयु "शिवाला" थैं समर्पित शिव आरती । 
दिनाँक ३०/०४/२०१६, शनिवार दिन मा 

Tuesday, 13 October 2015

अकलबरि !!


न त हिंदू-मुसलमान न,
अर न बामण जजमान न,
भयों मुल्कन उब उठण त बस,
भलि शिक्षा अर गैरु ज्ञान न।।

मेलजोलन रैलया त ढयों जन उच्चु दिखेल्या,
अपड़ों कि टॉग खैंच-खैंचि त 

खिचड़ि से बकि क्य खैलया।
ननौं कि भुकि पेकि, 

अर ठुलौं कु सम्मान न,
भयों मुल्कन उब उठण त बस,
भलि शिक्षा अर गैरू ज्ञान न।


अगनै बड़ण त बस अपड़ा हथ-खुटा हिलै कि,
न घना घूस देकि, 

न मन्ना दारु पिलैकि।
जरसि तेरा कंधा न, 

अर थुड़ासि मेरि ज़्याँन न।
भयों मुल्कन उब उठण त बस,
भलि शिक्षा अर गैरू ज्ञान न।।


कॉपी राइट
@ विजय गौड़
बवाणी, नैनीडांड
उत्तराखंड।
मेरु देश अर क्षेतर थैं समर्पित।


त्येरि प्रीतौ रंग मा यनु रंग्योँऊँ !! (for 8'th Marriage Anniversary)


त्येरि प्रीतौ रंग मा यनु रंग्योँऊँ ,
हल्दण्या , ललंगु अर झणि कै-२ रंग मा रंगे गेऊं।
मन अज्यूँ बि उनि ८ साल पैलि कु छोरा सि उतड़ेंदु त्वै  देखि कि,
या हैंकि बात च कि आज मि जरसि बुड्या हवै ग्येऊँ।।

आठ जिंदगि से भुरयां साल,
कबि उंदार, कबि उकाल।
हैंसि, रवैई, खैरि, विपदा कैकि बि कमि ना,
हरेक दिन मि त्वैमा जरसि हौरि डुबे गेऊं।
हल्दण्या , ललंगु ........


तु बि यनि हिटणि रै मैं जना,
मि त उनि अटगुणु रौंदु त्वै जना।
यनि साम-सबेर, रात-दिनौं, अता-पता इ नि चलु जु,
जरसि तु मेरि हूंदि रै, भंडि सि मि तेरु जौंऊं।
तेरि प्रीतौ.....
हल्दणयां, ललंगु.....
Eight year of togetherness! Shalini

Copy right@ Vijay Gaur
अपणा ब्यो कि आठवीं वर्षगाँठ क उपलक्ष मा अपणी प्रेयसी/धर्मपत्नी थैं समर्पित।
12 october 2015

Tuesday, 11 August 2015

लगौ तू मर्दा जोर लगा !!!

लगौ तू मर्दा जोर लगा,
जरा लगि ग्ये, जरा हौर लगा। 
औ, अब यनि तू लगौ ताणी,
मिलि जौ जु, त्वै त्येरू सब्बि-धाणी।
अखरी दौं कुच यनु सोर लगा,
लगौ तु मर्दा  ...................  

राजि रौ तू, 
रौ राजी गौं-मुलुक त्येरु,
हिट, उज्यलका बाटों हिट, 
नि कनु सुद्दी, त्येरु-म्येरू। 
छोड़ अब ईं चुप-चाणि,
बगौ सुख्यां मन, सुखौ पाणि। 
अफु बि लग,
दगड़म बछरा-गोर लगा,
लगौ तु मर्दा  ...................  

कब तलक ऊँका पिछनै-पिछ्नै,
कब तलक बस उँखुणी तालि। 
भै, कब तलक रीता कीसों लेकि,
भ्वर्याँ पुटगों क़ि कनू रैलि गाणी।
बगत अब अफखुणी कना कु,
य जिकुड़ी मँगणी "मोर" लगा। 
लगौ तु मर्दा  ...................  

कॉपी राइट @ विजय गौड़ 
११ अगस्त,२०१५ 

  

Sunday, 2 August 2015

क्या उत्तराखण्डी समाज मा नाच-गाण वलों क प्रति सोच बदल्ये च ??

हमरु समाज मा नाच-गाण थैंन एक विशेष वर्ग से जोड़ि कि दिख्ये जांदु छौ। पुरण्या बुल्दा छाया कि भलि मौ का नौना-नौन्यों थैंन यना काम नि कन चयेणा। बगत बदल्ये अर गढ़-कुमौ मा बि सिनेमा कि शुरुवात ह्वै ग्ये अर दिखदा-दिखदा लगभग हर जाति-वर्ग क लोग ये क्षेत्र मा औण लगि ग्येनि। अगर सिनेमा कि परगति क मापदण्ड से देखा त समाजन लम्बि दौड़ लगै यालि पण सवाल अबि बि यु इ च कि क्य हमरि सोच बदल्ये च नाच-गाण वलों क प्रति??? समाजकि त जथगा बि बदल्ये होलि पण क्य कम से कम ये क्षेत्र से जुड़याँ लोखुं कि सोच बदल्ये च ??? सोशल मीडिया त यनु नि बोलणु च??

याँका सन्दर्भ मा कुच दिन पैलि एक पोस्ट फेसबुक मा पढ़ना कु मौका मिलि जैमा कै कलाकार कु लिख्युं छौ कि फलणु नेता मै थैंन "बद्दी" बुलणु च। बद्दी/छटँगि/नचाड़ आदि कुच संबोधन छाया जु हमरु समाज मा परचलित छन यीं विधा म पारंगत लोखु क वास्ता। पुरणा बगत मा यि कलाकार लोग ब्यो-बरात्युं मा औंदा छाया अर सच बोलु त वाँकु अपणु एक आनंद छौ। बगत क दगड़ि हमरु समाज बि अग्नै बढ़ि, अब बि कलाकार अपना कार्यक्रम भौं-भौं क अवसरों पर कना छन, काम कमोवेश वि हि च, मनोरंजन कु, पण सोच बदल्ये च क्य? दिख्ये जावन त सिनेमा वीं कला कु इ त परिस्कृत रूप च, त यनु कनक्वै ह्वै सकदा कि जौंन यीं विधा थैंन हमरा समाज मा ज़ारी रखि, वेइ संबोधन से हैंकु कलाकार थैंन खुसि नि हूणि च, बल्कन वु अपणु विरोध समाजिक पटल पर बि रखणा छन। रै बात नेता जाति क लोखु कि यनि टिप्पड़ी कनै कि त वाँ पर मि अपड़ु बगत नि खपाण चाणु छौं, ईं प्रजाति पर जथगा कम बगत दिये जावन, उथ्गा समाज कि भलै च।   

दास लोग, बद्दी-बादिन आदि हमरा समाज मा सँगीत क, लोकगीतों क वाहक रैनी अर वुं लोखु थैंन एका वास्ता पुरू सम्मान मिलणु चयेणु। यिख बात सोशल मीडिया कि हूणि च त एक और सन्दर्भ उठांण जरुरी च। "यूनिवर्सिटी ऑफ़ सिनसिनाटी, अमेरिका" क संगीत विधा म एक मनखी छन डॉ० स्टीफन फिऑल जौंकु एक वीडियो भौत सा लोक जु सोशल मीडिआ म छन, फेसबुक/व्हाट्सप्प आदि पर, सब्यों न देखि होलु जैमा वु नेगी जी कु गीत "म्येरा डांडि-कांठ्यों कु मुलुक जैल्यु" गौणा छन। सबि गौरव महसूस करदन कि अग्रेज गढ़वळि गीत गाणु च। पण ये सँगीत थैंन जौंन हमरा समाज म बचै कि रखि वे इ संबोधन से हम बुरु मनणा छाँ? त क्य "बद्दी" गलत शब्द च? य याँ से कम से कम कलाकारों थैंन त गर्व महसूस कन चयेणु? यु सब चर्चा क विषय छन। म्येरू ब्यक्तिगत सोचणु यु च कि अगर हम यु संबोधनों थैं सम्मान से दिखला त यु नै भौणि क कलाकारों कु बद्दी/छटँगि आदि पुरणा कलाकारों क वास्ता सम्मान/श्रद्धांजलि होलि। 

एक हैंकि बात सब्यों क सामणि रखण चांदु कि डॉ स्टीफन फिऑल से मै ईमेल से संपर्क मा रान्दु अर वु मनखि अपणु नौ ईमेल क आखिर मा  "फ्योंलि दास" लिख्दु। य ह्वै सच्चि श्रद्धांजलि। हम लोखु थैंन अपणा पारम्परिक लोक कलाकारों थैंन सम्मान देणु होलु तबि समाज शिक्षित मने जालु, निथर सोच क्य बदल्ये ? 

लेख मा जु बि संदर्भ लियाँ छन वु कै पर व्यक्तिगत नि छन, आस च कि याँ थैंन मात्र संदर्भ रूप मा दिखे जालु। 

विजय गौड़ 
कैलिफ़ोर्निया 
(मूल ग्राम: बवाणी, ब्लॉक नैनीडांडा, पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखण्ड)   

Saturday, 25 October 2014

"म्येरि लाटी, म्येरि पाटी"

दगड़यो "पाटी" याद च? जब सबसे पैल आखर लिखणै-सिखणै की बात व्है छै घौर मा? इस्कुल्या दिनों कि ईं पैलि दगड्या थैं आज कुछ लैन समर्पित कनु छौं। अज्क्याल त स्लेट, कॉपी-पेंसिल अर कम्प्यूटर कु ज़मनु ऐ ग्ये पण मिथैन त अपणु बचपन इ सबसे भलु लगद। त ल्यावा पाटी कि खुद मा कुच आखर !


वै लाटी, म्येरि पाटी। 
झणि कख हर्चि तू?
झणि कब ह्वै छाँटि?
वै लाटी, म्येरि पाटी  …………………… 

मितै आज बि याद च,
वा इस्कूल जाणै पैलि रात,
अर वा त्यरी गोरि उजलि गात,
ज्व मिन त्वै स्ये बिन पुछ्याँ इ झ्वलण्या कै द्ये।
अर तू हँसदी-हँसदी मेरा बाना कालि ह्वै गे। 
वै पाटी! तू यनि कनि छै लाटी?

कथ्गा अलग छै तू ये जमाना का मनख्यों से,
जौंमा सफ़ेद हूणा कि होड़ लगीं च,
एक तू छै जू यूंकि सबेर खुणि,
अफु रात होंदि गै, 
पर युं से तब बि नि बिंगे 
तू रोज कलेणि रै,
पण हौरूमा त्वैन उज्यळु इ बाँटि।
म्येरि पाटी! तू यनि कनि छै लाटी?

तू, बुल्ख्या अर वा बाँसै कलम,
म्येरा बालापन क पैला दगड्या छाया,
मि त्वै छोड़ि उब उब जान्दु गौं,
पण तु कबि किलस्ये नि छै। 
तिन मी जना झणि कथगा उबुखण धंगल्येनि,
झ्वालु, तेल, कमेड़ु चाटी,
वै पाटी! तू यनि कनि छै लाटी?

आज बगत यनु बि  ऐ ग्ये कि 
अब त्वै क्वी पुछदु नि, 
अर यु नयु जमनु त्वै जणदू नि। 
पण यूँ थैं क्य पता कि,
जौं पैंसों न, आज त्येरि सौत कॉपी, कम्प्यूटर अयुं च ,
वे थैं कमाणों सगोर, यूँका बुबों तिनि सिखयूं च। 
मिखण त तु आज बि उन्नी अपड़ि छै,
जनु मेरु पाड़, पाणि, हवा, माटी,
वै लाटी तु त मेरि ब्वै सि छै लाटी, तु त मेरि ब्वै सि छै लाटी।।।।।।। 

कॉपी राइट @विजय गौड़
२५ अक्टूबर २०१४  

Tuesday, 7 October 2014

दगिड्यो, अग्नै कि छ्वीं लगौन्ला!!


रात गै,
अर दगड़मा राति किवा बात बि गै
भौत ह्वै ग्ये, खैरि कि रुवा रो,
चला,
अब सुख का वु हरच्याँ, बाटा खुज्योंला ।  
दगिड्यो, अग्नै कि छ्वीं लगौन्ला ।।

देरादूण, गैरसैण,
तु गढ़वली, मि कुमैंण
'बा' अर 'मा ढोलदि माटु,
छुचों, खैरिन याँन नि मिटेंण,
आवा
, जरा सबि दगड़म सोचा,
इन्नि अपड़ी-अपड़ी कब तलक गौंला?
दगिड्यो, अग्नै कि छ्वीं लगौन्ला ।।

तु दिल्लि वलु
, मि गौं वलु
तु गाड़ि वलु, मि खुटों वलु,
घार-बूँण सच्यूँ
 भौत ह्वै ग्ये,
हमखुणि कन्ना
 कु क्य ई रै ग्ये?
टाँग खैंचणु छोड़ि जरा सोचदि कुच यनु
,
जु भोल फेर दिल्लीउन्द धक्का नि खौंला।  
दगिड्यो, अग्नै कि छ्वीं लगौन्ला ।।

डाम हि डाम, ये मुल्का हे राम,
विकास अद्दा कत्तर
 कु बि नि,
रौल्युं-२
बिनासौ ताम-झाम,
जरा युं डमदरों
 से पूछा त आज ,
चूंडी कि जूँगा अर खैंचि कि नौला

दगिड्यो, अग्नै कि छ्वीं लगौन्ला ।।

सुख हो या दुःख,
गिच्चा सदनि बोतलि मुक 
छ्वटु बडु, क्वी नि विरयुं च 
जैंथे देखा, वी डाला टुक । 
लोलावो अब पाणि मुण्डमात चलि ग्ये ,
 बगत बुनु अब बिटावो रै बौंला । 
 दगिड्यो, अग्नै कि छ्वीं लगौन्ला ।।

विजय गौड़ 


भारतीय समाज कि मन:स्तिथि पर १००० वर्ष कु जु गुलामी कु प्रकोप ह्वैवाँका बाद जु आजै समाज कु मानस  वेकू प्रकटिकरण  कविता जैकु शीर्षक ,” दगिडयोअगनै कि छ्वीं लगौंला” हिंदी में कहूँ तो हे भारतभूमि अब समय  गया है पुनः भारत होने का। येसमय ने जो परदे हमारे मानस पर डाल दिये हैं उन्हें हटाने का समयउनके पीछे जो कारण हैं उन्हें समझने का और तत्पश्चात उनसे बाहरनिकलने का समय  गया है। समय  गया है कि भारतीय मानस एक स्पष्ट मानस  (कृष्ण साको प्राप्त हो और संशयित (अर्जुन सास्तिथि से बाहर आये।