Thursday, 16 May 2013

"नमो"-"नारैण" (तत्कालीन राजनीति, नेता, आइपीएल कि 'सान' मा!!!)

कखि "नमो" त,
कखि "नारैण" च होणु,
देखा! कलजुग मा,
कनु "रामैण" रंचेणु ।।

'द्वापर' मा मोहन बजांदु छौ बन्सुलि,
अर राधा छै नचदी,
अब "राधा" लगाणि भौंण,
अर "मोहन", "मन" से नचणु।।
देखा कलजुग मा ..........................

"संत" कना छन तौलियों से सानी,
'खेल' मा 'खेल' ना, भरैणि पैंस्योंन माणी,
'भारत' मा नी च, पीणों पाणी,
अर 'इंडिया' म प्रीमियर तमासु करेणु।।    
देखा कलजुग मा ..........................

"असगुनि" सिखाणन 'क़ानून' देस तैं,
"पवन" लिजाणि कखि हौरि 'रेल' तैं,
"जाँचै संस्था" मा बस 'अव्यवस्था'
"राजा" प्रजा कु हि माल च खौणु।।
 कखि "नमो" त ..............................

सिनक्वलि चुनौ कु रणसिंग बि बजलु,
एक दिनौ 'सेरा' हमरा मुंड बि सजलू,
एकन बटोली-सौंग्ये धैरयालि,
हैंकु उठिड्यों मा जीभ फिरौंणु।।
कखि "नमो" त,
कखि "नारैण" च होणु,
देखा! कलजुग मा,
कनु "रामैण" रंचेणु ।।

विजय गौड़
१७/०५/ २०१३
 


        

Tuesday, 14 May 2013

कनि अजाण माया!!!!

कनि अजाण माया,
कख मन लगाणु ग्वाया,
कुच नि बिग्येणु,
किलै मन खुदेणु, 
ह्व़े त क्य ह्व़े ग्याया?
कनि अजाण माया .........

को होलि वा,
ज्वा अपड़ी सि लगणी च,
लुकि-२ ज्वा,
मै थै हि दयखणी च,
न मिन गिचु खोलि,
न वीं बुनु आया,
कनि अजाण माया .........

वींन बोलि कुच न,
पण मिन त सूणि च,
अब मन मा स्वीणों की,
बार सि औणी च,
मैखुणि आज जून,
दिन मा हि ऐ ग्याया,
कनि अजाण माया .........

टक रौंदी असमान मा,
खुट्यों ठीन्स लगणी च,  
मै कु सरी दुन्या,
बौल्या-२ बुलणि च,
सुणे मै नि कुच,
क्य लोग बुना छाया,
कनि अजाण माया .........       

विजय गौड़ 
१४ मई २०१३ 
   

Friday, 10 May 2013

रैबार!!!

हैन्सि ल्या, 
रव़े-२ कि, बगत नि कटेण हो,
उठि जा, 
स्ये-२ कि, उकाल नि लंगयेंण हो।।

कैका सारा नि रौंण,
नि दिखण कै मुखौंदा,  
हथि-खुटी हिलैल्ये लोला,
स्यीं, ज्वनि का छौंदा।
सोचि ल्या, 
ध्वै-२ कि, आंख्युंन नि खुलेंण हो,
उठि जा, 
स्ये-२ कि, उकाल नि लंगयेंण हो।।

कोसिस कनु रैई,
भाग, अफ़ि धै लगौन्दा,
रोगै दवै खोजा,
जु मरज भगौंण चौंदा 
खाँसी ल्या, 
सै-२ कि, रोग नि ढकेण हो 
हैन्सि ल्या, 
रव़े-२ कि, बगत नि कटेण हो।।
  
मनखि, कर्मों से हि,
छवटु-बडु होंदा, 
अर मनखि वी,
जो मनख्यों काम औंदा,
पूछि ल्या, 
बौगा ह्वै कि, अपड़ू नि बणेण हो,
हैन्सि ल्या, 
रव़े-२ कि, बगत नि कटेण हो।।

अफ़ी अपुकु कमौण म,
सान नि चितौंदा,
कै लचारै, लचारि कू,
मखौल नि उड़ोन्दा,
दये बि दया, 
दान दयेकि सोनू नि खवेण हो,
उठि जा, 
स्ये-२ कि, उकाल नि लंगयेंण हो।।
   
औंण-जौणे कि य रीत,
दुन्या मा चनि रौंदा,
खालि हाथ ऐ जु यिख,
वुख बि खालि जौंदा,
बींगि ल्या, 
गालि दयेकि, नाम नि कमैण हो,
उठि जा, 
स्ये-२ कि, उकाल नि लंगयेंण हो।। 

विजय गौड़ 
१०/०५/२०१३  

बांदों मा कि बांद

बांदों मा कि बांद,
नल्वैया बांद ओ,
रात-दिन म्येरा मन,
त्येरो सोर रान्द, नल्वैया बांद ओ,
त्येरो ख्याल रान्द, नल्वैया बांद ओ।

ज्वानो मा को ज्वान,
डंडोया ज्वान ओ,
रात-दिन बैठ्युं रांदु,
बाटों त्येरा बान, डंडोया ज्वान ओ,
बाटों त्येरा बान, डंडोया ज्वान ओ।

आग कि अगेलि, 
नल्वैया बांद ओ,
मि त्वैकु खुदेणु छौंउ,
त्वै बि बडुलि लगली, नल्वैया बांद ओ।

घासै कि थमालि, 
डंडोया ज्वान ओ,
म्येरि साँची माया गैल्या,
धैरि  तू समालि, डंडोया ज्वान ओ,

पैनि जालि टैई, 
नल्वैया बांद ओ,
तू हि काम-धाणी लोलि,
त्वी म्येरि कमैई, नल्वैया बांद ओ।

लूण भरि दूँण, 
डंडोया ज्वान ओ,
गौं- गल्यों मा छ्वीं हमारि,
त्वै क्य जि बतौण, डंडोया ज्वान ओ।।।

ऐ ग्येई बग्वाल, 

नल्वैया बांद ओ,
ल्येकि आणु छौं बरात,
तू रैई जग्वाल, नल्वैया बांद ओ ....


विजय गौड़ 
१०/०५/२०१३ 

Wednesday, 8 May 2013

कनि प्वडी स्या रात!!!

कनि प्वडी स्या रात, 
न क्वि छ्वीं, न बात।
यनु नु होणु मुल्कौ विकास, 
मिलि क रावा साथ।

तु छ्वटु मि बडू, तु सियुं मि खडू, 
पुरणी व्है य बात,
यखुलि-२, गिर्ज्वडोंन, 
नि पकणु दाल-भात,
जनता तुमरा मुखुन्द दिखणी, 
तुमुन करीं स्या रात,
यनु नु होणु मुल्कौ विकास, 
मिलि क रावा साथ।

सोच-बिचारि, मेल-जोलन,
हिटा लाटाओ ताल-मात,
निथर बग्तन तुमरू ठटा लगौण, 
कनु हुयुं बकिबात,
अपड़ू - २ सुचण स्ये, 
नि पैटणि स्या बरात,
यनु नु होणु मुल्कौ विकास, 
मिलि क रावा साथ।

आस बंध्ये छै तुमुतैं दयेखी, 
कि अग्नै औणी मनख्यात,
बाला अटगला, ज्वान हैन्सला, 
बुडापू कनु छौ बात,
हाल तुमरा यना हि राला 
त फेर नि लगणि लंगात,
यनु नु होणु मुल्कौ विकास, 
मिलि क रावा साथ।

विजय गौड़ 
१६/०४/२०१३   

Monday, 6 May 2013

"मनसा"

य जुन्यलि रात,
म्येरा मनै कि बात,
मुख मा अईं च,
बुल्येणि नी च,
कनक्वे बथों त्वै आज .... 
य जुन्यलि ......

रात-दिन युं आंख्युं मा,
सुपन्या, त्येरा हि सुपन्या,
साम-सबेर ईं जिकुड़ी मा,
तु हि अर त्येरि-म्येरि दुन्याँ,
त्येरा-म्येरा बीच,
कुच ना कुच त छें च,
कनक्वै बिंगों त्वे आज ....
य जुन्यलि ............

मन उड़दू असमान मा,
गाणी, अजाण मा, 
कब तक रौंण यन मिन,
त्येरि-म्येरि माया मिसाँण मा,
मन बस मा हि नी च 
पण त्येरि जणी नि  च,
कनक्वै जणों त्वै आज,
य जुन्यलि ............

छ्वीं त्येरि हि दगिड्यों मा,
बथ त्येरि हि कछिड्यों मा,
कबि पिड़ा घास मा,
कबि लगै लखुड्यों मा,
सब्यों सुणईं च,
त्वै स्ये लुकईं च,
कनक्वे सुणों त्वै आज
य जुन्यलि ............

विजय गौड़ 
०६/०५/२०१३         




Saturday, 4 May 2013

"माया"

आंख्युं मा,
कैकि मि डुब्यूं रांदु,
सान्यों ना, 
कैमा यु बुनु रांदु,
अब बगत कटेन्दु नि,
त्वै बिना रयेन्दु नि,
आंख्युं मा .......
सान्यों ना .........

क्वी च जु लगाणु पराज,
आन्ख्यों सुपन्यलि कै जाणु आज,
सच लगदि पण दिखेन्दि नि,  
कनि छ्वीं ज्वा बिङ्गेन्दि नि,
आंख्युं मा ..........................
सान्यों ना ............................

ज्वा छै हि ना, ह्वै कनक्वे,
ज्वा ह्वै हि ना, दिख्ये कनक्वे,
कनि गेड़ ज्वा खुलेंदि नि,
कनि तीस ज्वा मिटेंदि नि,
आंख्युं मा ..........................
सान्यों ना ............................  

जै कैमा त्वै ख्वज्याणु छौंऊ,
लाटु मन सिन्नि बुथ्याणु छौंऊ,
भौं क्वी दिन यनु आलो बि,
स्वींणु, वीणु सि दिख्यालु बि,
आंख्युं मा ..........................
सान्यों ना............................  

आंख्युं मा .........
सान्यों ना ......
अब बगत ......
त्वै बिना ........

आंख्युं मा ..........................
सान्यों ना ............................  

विजय गौड़ 
०४/०५/२०१३ 


Tuesday, 30 April 2013

अब ना!!!!: "पहाड़ों मा मंदिरों, गों मा पुजै क नौ पर होन्दि बलि पर"

मुंड गिंडै कि छुचौँ, 
स्यूँकु क्य पैल्या?
प्रेम का तिसला दिब्तों कि तीस तुम,
ल्वै चारि कि कनक्वै मिटैल्या?

हुयुं मन सवल्या जैं रीत फर,
यनि, रीतै नौ कु चुसिण्या,
कब तलक चुसिल्या?
प्रेम का तिसला दिब्तों कि तीस तुम,
ल्वै चारि कि कनक्वै मिटैल्या?

चट्वरि जिभड़ि का चटगरों बाना,
दैणा हुयाँ कब तैं बुलणा रैल्या। 
मुंड गिंडै कि छुचौँ, 
स्यूँकु क्य पैल्या?

गात-कंदुड़यों चौंल-पाणि डालि की,
डंगरौं ललंगा कब तैं करणा रैल्या?
प्रेम का तिसला दिब्तों कि तीस तुम,
ल्वै चारि कि कनक्वै मिटैल्या?
ब्यटुलि, जौंल कि जात इक़्सनि,
कै तै पुट्गा इ मारा,
कै से पुट्गु भोरिल्या।
मुंड गिंडै कि छुचौँ, 
स्यूँकु क्य पैल्या?

यु बि त छन कै ब्वै क 
हि जल्म्याँ,
असगार मयेड़यों कु 
कब तैं ल्योणा रैल्या? 
मुंड गिंडै कि छुचौँ, 
स्यूँकु क्य पैल्या?

अष्टबलि, जात, पुजै बिसरि अब,
दिब्तों नौ कि डालि लगै ल्या
नौना-बालों खुणि,
कुच त जोड़ि जैल्या,
………………………। 


विजय गौड़ 
३०/०४/२०१३ 
संसोधन
३०/०८/२०१४ 
आज फेर कुच लिखणौ ज्यु बोलि, अपणु मन पसँद विषय "हमरु समाज अर रीत रिवाज" पर हि फेर कुच लिख्युं च। कोसिस सदनि रैबार दीणा कि होंद मेरि, देखा अब कथगा ये रैबार बिंग्दन। 



मौल्यार!!!!


मन मा तिन ऐकि,
यन झणी क्य बतैई,
बिरणी स्य दुन्या,
अपणि सी व्है ग्येई।।

तू बुन्नि रै,
मि त्येरा बुल्याँ तैं 
लिखणु लग्युं रौन्लू,
गीत त्येरि छुयों पर,
मिसाणु लग्युं रौन्लू,
म्यरु लिख्याँ, म्यरा गाणों मा,
त्वी हि त्वी त छैई,
मन मा तिन ऐकि .......

तू हैंसणि रै,
मि त्येरि हैंसी तैं 
सौन्ग्याणु लग्युं रौंलू,
रुन्दरों तक त्येरि हैसि 
पौंचाण लग्युं रौंलू,
तू ऐ त युं आंख्यों मा,
फेर अन्सधरि नि ऐई,
बिरणी स्य दुन्या ......

त्वी बथै दये,
क्या च मैमा,
जु, त्वे दये दयोंलु,
अनमोल त्येरि माया,
कनक्वे मि मुल्योंलू?
त्येरा औणन जिंदगी मा 
"मौल्यार" ऐ ग्येई,
मन मा तिन ऐकि .......

विजय गौड़ 
३०/०४/२०१३  
   

 
 

म्यरु मुलुक!!!


म्येरि लचारि तैं बिंगी ल्ये म्यरु मुलुक,
मन मा त्येरि खुद, आंख्युं म आँसु, टुलुक-२।

जु भग्याँन छन 
वु तखि छन रौणा,
सवादि कोदै रुटलि 
ठण्डु पाणि छन प्योंणा   
उख सबि डाल्युं छैल बैठ्याँ, 
मै यिख फुकेणु सबेर-रुमुक,
मन मा त्येरि खुद, आंख्युं म आँसु, टुलुक-२।।

दूर इथगा ऐ ग्येऊँ,
दूर अफु से हि ह्वै ग्येऊँ,
नौनु झणी क्य गिटपिटान्दु,
मि वै बिंगांदु रै ग्येऊँ,
मनसा, यु गढवली बि बुल्दु    
भिंडी नि त, एक चुलुक 
मन मा त्येरि खुद, आंख्युं म आँसु, टुलुक-२।।  

आज मिन य मुट्ट बुटीं च,
घौर आणे कि मिन सुचीं च,
अब कैकु बनवास नि होलु,
यनि म्येरि रामैण रंची च,
नौन्याल उकाल जरुर लगला,
अज्यूँ न त सुरुक- सुरुक,
मन मा त्येरि खुद, आंख्युं म आँसु टुलुक-२।।  

विजय गौड़ 
२५/०४/२०१३      

Sunday, 21 April 2013

दगिडया, सौंजडया, लठ्यालि!!!!


दगिड्यो,

समाज खुणि मि लगातार लिखणु हि रांदु, आज जरा अपणि श्रीमति जी खुणि कुच लिखणु ज्यु बुन्नु। ब्यो से पैलि सब कुच वीं पर हि लिखदु छौ, बाद मा कलम हौर बि लिखण बसि ग्ये लेकिन यान्कु यु मतलब नि च कि मि ब्यो क बाद 'रोमांटिक' नि रौं। आप लोग बि पौढ़ा, छै छौं न मि अज्युं बि 'रोमांटिक'. अर या कविता आप अपुतैं रोमांटिक बतौण खुणि बि प्रयोग कैर सकदन। अपणा ज़ज्बात बंटणु छौं, आसा च पसंद आलु।   

मि बिंज्युं रौंऊ 
य सियूँ रौंऊ
मन मा त्वी रान्दि छै,
मि त्वैइ बतों
य़ नि बथों 
मै ते त्वी स्वान्दि छै
बुलणा खुणि त ईं दुन्या मा 
झणि कथगा अपणा छन
पण मैखुणि म्येरि अपणि
म्येरि दुन्या बस त्वी छै 
मन मा त्वी रान्दि छै .....
मैते त्वी स्वान्दि छै ....... 

कबि तू स्वीणों मा
कबि वीणों मा आन्दि छै 
मुरझईं यीं ज़िन्दगी मा 
जीणे मनसा दये जान्दि छै 
मि पिड़ा मा रौंऊ
अर रूणु रौंऊ
मैते त्वी हँसादि छै
मि त्वै बथों ..........................

कबि तू म्येरि दगडया
कबि सौंजड्या बणि जान्दि छै
कबि तू म्यारा बाना 
क्य-२ खैरि खान्दि छै 
यु लाटु मन 
जब अधीतो होंदु 
धीत त्वी बंधांदि छै 
मि बिंज्युं रौंऊ .......................

कबि तू मयलि होन्दि 
कबि तू रुसान्दि छै 
कबि आंख्यों न बतान्दि 
तू बस मैते चान्दि छै 
तू म्येरि छै
मि त्येरु छौंऊ 
दुन्या छ्वीं सरान्दि गै 
मि त्वै बथों .........

विजय गौड़ 
२०/४/२०१३    
      
     

Thursday, 18 April 2013

"इखरी माया"

कुच मि छौं बुनु, कुच तु बि बोल,
मिन अपणा बाँठौ खरोल्यूं च, बक्कि तु खरोल।।

मि त्वै खुज्यांदु रौं, 
तू बुज्यों लुकीं रै,
दिब्तों मनांदु रौं, 
पण य देवि नि दिख्ये,
मिन पुन्गड़ी बयीं च,
अब तिन लगांण जोल,
मिन अपणा बाँठौ खरोल्यूं च......

त्येरि मनसा जगांदु रौं,
तु सुनिंद पुड़ी रै,
माया बिन्गांदु रौं,
तिन बिंगी बि नि बिन्ग्ये,
मिन ज्व छांच छ्वलीं च,
अब तिन सौन्ग्याँण भोल,
मिन अपणा बाँठौ खरोल्यूं च ......
   
त्वै अपणि बथांदु रौं,
तु लाटि बणी रै,
त्वै जना आंदु रौं,
तू छांटि होन्दि ग्ये,
मिन आज त्वैमा बुल्युं च,
तु कब बतैलि, बोल?
मिन अपणा बाँठौ खरोल्यूं च ...... 

विजय गौड़ 
सर्वाधिकार सुरक्षित 
१८/०४/२०१३   

"यखुलि तु, यकुलू मि"

मि औंदु जरुर, पण औणे हिकमत नि व्है,
त्वै लिजौंदु जरुर, लिजौणे बंदोबस्त नि व्है।।

त्येरा रैबार सबि दिल्ली औंण वलों मा औणा रैनि,
सच छौं बुनु, मिन सुणी बि अणसुण्या कैनि,
लोखु का भांडा मंज्याणु रौं, अपसणी भांडु नि जुड्ये,
मि औंदु जरुर, पण औणे हिकमत नि व्है।।

तू पुंगिड्यों जाणि रै, म्येरा ढाबों मा दिन कट्येनी,
तू राति स्ये नि छै, मिन बि गैणा हि गैणिनी,
दुन्या खलांदु रौं, अपणि पुट्गी नि भुरये,
त्वै लिजौंदु जरुर, लिजौणे बंदोबस्त नि व्है।।

तु मै खुज्याणि रै, मिन बाटा बिरडैनी,
तु ज्वनि बगाणि रै, मै सोच हि पुड्यां रैनि,
त्वै आस बंधान्धु रौं , पण अये कबि नि ग्ये,
मि औंदु जरुर, पण औणे हिकमत नि व्है,

तख तु सारा लग्यीं रै, मिन बि गिर्ज्वडा लगैनि,
दिन रात एक कैदये, पण अमीरया दिन नि ऐनि,
सदान्यु घौर आणु छौं, अब कामै उमर नि रै,
त्वै लिजौंदु जरुर,लिजौणे बंदोबस्त नि व्है।।

विजय गौड़ 
१८/०४/२०१३ 
सर्वाधिकार सुरक्षित ....  

Sunday, 14 April 2013

चला, अग्नै कि छ्वीं लगौन्ला!!!!!

रात गै, अर बात गै,
कारा तुम शुरुवात नै,
व्यालि राति कु अंधेरु छोड़ि,
अब फजेलकु उज्यालम जौंला, 
चला, अग्नै कि छ्वीं लगौन्ला।।

देरादूण, गैरसैण,
तु गढ़वली, मि कुमैंण,
'बा' अर 'ख' मा ढोलदि माटु ,
छुचों खैरिन याँन नि मिटेंण,
आवा, जरा सबि दगड़म सोचा,
यन अफि-अफि कख तलक जौंला?
चला, अग्नै कि ....

तु दिल्लि वलु, मि गौं वलु, 
तु गाड़ि वलु, मि खुटों वलु,
घार-बूँण सच्यूँ भौत ह्वै ग्ये,
हमखुणि कन्ना कु क्य ई रै ग्ये?
खुज्या त कुच इखि यनु,
कि फेर दिल्लिउंद धक्का नि खौंला,
चला, अग्नै कि ......

डाम हि डाम,
ये मुल्का हे राम,
विकास अद्दा कत्तर कु बि नि,
रौल्युं-२, बिनासौ ताम-झाम,
जरा युं डमदरों से पूछा त आज ,
चूंडी कि जूँगा अर खैंचि कि नौला,
चला, अग्नै कि ...........
     
सूर्य अस्त, छवटा-बड़ा सबि मस्त,
दारुन हुयूँ सर्यु पाड़ तंदुरस्त, 
प्योंण-पिलौणा कि छ्वीं नि लगौणि,
पाड़यो, स्य दारु अब घौर नि लौणि,  
जरा बग्तै कि बात बि बींगा,
बगत बुनु अब होसमि रौंला,
चला, अग्नै कि ...............

रंग-ढंग कुच नि बदलि १२ सालम,
बस जरा मुल्का कु नौ बदल्ये ग्ये,
पैल लखडों मा दाल छै गल्दि,
अब जरा गैस सलेंडर ऐ ग्ये,
एकि तुराक मा धीत भुरेणकि  
अब वीँ लाटि टक्क छोड़ि द्यौंला,
चला, अग्नै कि .................

@ विजय गौड़ 
१४/४/२०१३ 
संसोधन: २९.१२.२०१३ 

क्य व्है यु बकिबात!!!

मन कि बात अब बतों य तब बतों मि त्वैमा,
घंग्तोल मचौन्दी रौंदी अब तु दिन-रात,
क्य व्है यु बकिबात .....

दिल कु भेद अब ख्वलूं  य तब ख्वलूं मि त्वैमा,
आंखि त्वै दिखणी रौंदी अब त दिन-रात,
तु बिंगी ल्ये म्येरि बात  ....

घुंगरयली  वा त्येरि लटुली, घुंग रयली,
गोरि-२ नखरयली मुखुड़ी,
सुर्म्यलि आंख्युं दयखी कि,
धक्दयांदी रै जांदी जिकुड़ी, धक्दयांदी रै जांदी जिकुड़ी।
अपणि छ्वीं-बथ लगों त कन लगों मि त्वैमा,
रणमणि लगौन्दि रौंदि अब तु दिन-रात,
क्य व्है यु बकिबात .....

मिठी-२ वा त्येरि छ्वीं, मिठी-२ ....
मिन समालि, मिन ढकैयीं,
दूर सर्या दुन्या स्ये धरीं च,
माया कि समोंण लुकैयीं, माया कि समोंण लुकैयीं।
त्येरि याद, त्यरि य खुद अब मिटों मि कैमा,
सारु क्वि खुज्यांदु रौंदु अब मि दिन-रात,
तु बिंगी ल्ये म्येरि बात .....    

कबि अपणि त कबि बिरणी, कबि अपणि,
ब्यालि, आज, भोल त्वी सदानि,
मुल-२ हैन्सणु वो त्येरु,
व्है ग्ये दवै मैखुणि भग्यानि, व्है ग्ये दवै मैखुणि भग्यानि,
अब या टक्क म्येरि लुकों, कन ढकों मि त्वैमा,
कुतग्यली लगौन्दि रौन्दि अब तु दिन-रात,
क्य व्है यु बकिबात ......

त्येरु रुसाणु, त्येरु दुलार, त्येरु रुसाणु,
चुलबुला गीतों कि हुलार,
कब कुज्यणि म्येरा मन बसि ग्ये,
त्येरि हि पिड़ा, त्येरु हि प्यार, त्येरि .....
अपणि मनसा अब बतों त कन बतों मि त्वैमा,
त्येरि आस, त्येरि सांस रौन्दि दिन-रात,
तु बिंगी ल्ये म्येरि बात .....     

विजय गौड़ 
जून २००७ 
ग्वाटेमाला, सेंट्रल अमेरिका 
डुएट (लाल: लड़का, नीला: लड़की )