Friday, 7 March 2014

मैं "न्यूज़" बनना चाहता हूँ !!

दग्ड्यौ हम लोखु न जै उद्देश्य क वास्ता य संस्था NEWS (नैनी एकता वेलफेयर सोसाइटी) सुरु करीं च वैथें एक ढवण्या भासा म लिखीँ कविता क द्वारा सब्यों तलक पौंचाणै कि कोसिस कनु छौँ, आस करदु कि जु संदेस हम सबि भै-बंद, दीदी-भुल्यों, दाना-सयणों तलक पौंचाण चंद्य़ा, वू जरुर पौंचळु अर भंडी से भंडी लोक याँ से जुड़ेला।आज क समय म ज्व भासा प्रचलित च वेकु इस्तेमाल कना कि कोसिस मिन करीं च। 

@ विजय गौड़ 


मैं "न्यूज़" बनना चाहता हूँ,
द्वी ब्येलि कु गफ्फा कमाने के बाद बचे समय को,
मैं अपने गौं-मुलुक के लिये "यूज़" करना चाहता हूँ,
मैं "न्यूज़" बनना चाहता हूँ।।

हाँ! मिथै कुच बणना खुणि अपना मुलुक छोड़ना पड़ा,
पण मुलुक तो सरैल ने हि छोड़ा,
मन तो सदनि वुखि रहता है,
भोल म्येरि औण वलि पुश्त का सरैल अर मन द्वी वुखि रहें,
मैं ऐंसी कोई राह "चूज" करना चाहता हूँ,
मैं "न्यूज़" बनना चाहता हूँ।।

मि बि वी अन्न खा रहा हूँ 
जो बड़ि-बड़ि छ्वीँ करने वाले चकड़ैत खाते हैं,
बस तनि कोरि गप्प सूणी कि मैं तुमारा हो जाऊँ,
मि यनि सोच को "रिफ्यूज"करना चाहता हूँ,
मैं "न्यूज़" बनना चाहता हूँ।।

मि जणदु छौं कि म्येरा हि जनि आप बि सोचते हैं,
त फेर यखुलि-यखुलि किलै? चला दगड़ि चलते हैं,
कनक्वै रोक पायेंगे पलायन?कनक्वै जुटायेंगे रोजगार?
मैं ये फर आपके "व्यूज" चाहता हूँ,
मैं "न्यूज़" बनना चाहता हूँ।।

copyright@ Vijay Gaur

Tuesday, 24 December 2013

"बौल्या" बणण तुम छोडि दया।

ब्यो-पगिनि अर गों-गल्यों मा, 
अगड़ी-पिछड़ी अटगण छोडि दया। 
ब्वल्युं माना, "ब्यो" कि सोचा, 
सिन "बौल्या" बणण तुम छोडि दया। 

मनै क्या च, 
ग्वाया लगाणु रांदु लोलु जखि-कखि,
कबि इनै त कबि उनै कि रान्दि येकि दयखा-दयेखि,
द्वी-दिन कि प्रीतै रीत कि हवा चलणि तेज अब,
यनि हवा मा तुम लोलाओ जरा उड़ण छोडि दया,
ब्वल्युं माना, "ब्यो" कि सोचा,
सिन 'बौल्या' बणण तुम छोडि दया, 

गौं - बरात्युम, 
छजा मा द्येखि, उड़दु मन कख-कख त्येरु,
मि बि आज-यिखी बणि जौं ब्योला, बुल्दु मन जखि-कखि त्येरु,
हौरों क ब्यो मा, सिन्नी ख्याल-ख्यालों मा, 
मन कु डोला डोलुणु अब छोड़ि द्या ,
ब्वल्युं माना, "ब्यो" कि सोचा,
सिन 'बौल्या' बणण तुम छोडि दया,    

कब तलक यन बगणा रैल्या, अफि, अफु थैं ठगणा रैल्या,
ये मन थैं मन्चलु कैरि -कैरि, झूटा सुपन्या पलणा रैल्या,
सुपन्या छोड़िकि, सच मा आवा,
सुद्दि गाणि करणि तुम छोड़ि द्या,
ब्वल्युं माना, "ब्यो" कि सोचा,
सिन 'बौल्या' बणण तुम छोडि दया,    

विजय गौड़ 
Copyright @ विजय गौड़ 28.08.2013 
संसोधन : २३ दिसम्बर २०१३ 



Friday, 22 November 2013

' जग्वाल '

तू आज ऐलि या भोल ऐलि,
मै थैं त्येरि जग्वाल रैलि,
तू आस म्येरि, सूण बात म्येरि,
त्येरा औण से हि बग्वाल ऐलि। 
तू आज ऐलि या भोल … …

बालापन बिटि ज्वा मन मा छैई,
वा स्वाणि, अजाणि मुखुड़ि छै तू,
सुचदि रयों यु, मुख मा नि ऐई,
म्येरु ज्यू, पराण, जिकुड़ि छै तू,
जो बोलि नि मिन, वे बींगि जरुर,
त्वि रूढ़ि, ह्यूंद, बस्ग्याल लोलि,
तू आज ऐलि या भोल … …


ज्वनि का छौंदा तू ऐ जैई,
अर ऐकि बतैजा कि सच छै तू,
बैरयों का गौंवा कि न कै जैई,
म्येरु ठटा लगाला कि कख गै तू,
मि बाटू हेरुणु ये विस्वासन छौँउ,
म्येरि प्रीत त्येरा मन बि उमाल लैलि,
तू आस म्येरि ………… 

@विजय गौड़
२२ नवम्बर २०१३ 
१० बजि सबेर,
मॉडेस्टो, कैलिफोर्निया।


  

Tuesday, 29 October 2013

प्रीत

 म्येरा गीतों गैकि तू,
गीतों मा रस भरि द्ये।
म्येरि प्रीत निभै कि तू, 
प्रीत अमर-अजर करि द्ये।।

जु भि लिखी मैंन, त्वै सोचि कि लिखि,
जु भि बोलि मैंन, बस त्वैमा हि बोलि,
लिख्युं -ब्वल्युं बिंगी कि तू,
मन सुपन्यळु आज करि द्ये,
म्येरा गीतों गैकि तू ……………… 

ये मन मा बसि जु बि, वे लूछि लीगिन लोग,
हैंसि वुंथै दिईं वेँन, अर आँसु म्येरा जोग,
यि आँसु पोंछि जरा तू,
बैतरणी दुःख कि तरि द्ये,
म्येरा गीतों गैकि तू ……………… 

जात-पात नि देखि कबि मैंन, 
मैं त दिख्ये त्येरो मन,
दुन्या रुसईं यनि मै से,
बोला योन्कु क्य कै मिन यन,
बथ तौंकि नि सूणि कि तू,
म्येरि जीत बणि यिख ऐ,
म्येरि प्रीत निभै कि तू ………………… 

@विजय गौड़ 
११. ५६ राति, 
मॉडेस्टो, कैलिफ़ोर्निया 

आज बड़ा दिनों बाद कुच लिखणो बैठ्युं, विदेस कि धरति मा कुच आखर लिखिनि राति बिंजी रैकि, देखा दि कना लगणान  …… 



  

Friday, 13 September 2013

तालि बजौ, "चुनौ औंण वलु चा"

अचणचक श्यू काखड़ो मुंड मलसण बसि ग्ये,
खच्चर घासै खुणि ' भुलू ' बुलँण बसि ग्ये,
ग्वैरि बगतन गोर म्येलंण बसि ग्ये,
बैलि गौड़ि बि अचणचक पगरण बसि ग्ये,
जणि कलजुग, सतजुग मा जौंण वलु च,  
तालि बजौ, "चुनौ औंण वलु चा"। 

द्वी चार दिन बिटी प्रधान रामा रूमि करण लगि ग्ये,
अर बाटु कु गारू-माटु इना-उना ढुलौंण लगि ग्ये,
पाँच साल त लोलोंन नौ बि नि पूछि,
आज ढाँकि दे-देकि बुलौण लगि ग्ये,
साल सालों कु हमरु इ तेल,
भैजि हमरा इ चुफ्फों लगाणु वलु च  
तालि बजौ, "चुनौ औंण वलु चा"। 
           
मुझ्यां चुलों आग जगण बसि ग्ये, 
चिलम सजला फिर सजण बसि ग्ये, 
जु भड्डु मास उज्ये-उज्ये कि लबस्ये ग्ये छौ,
वेवुन्द अज्क्याल मुर्गा बँसण बसि गए
क्वी थैलि, क्वी पवा अर क्वी साबुत बोतल,
बिन ब्वल्यां कीसों कुच्योंण वलु च,
तालि बजौ,  "चुनौ औंण वलु चा". 
Copy Right @ विजय गौड़   
13.09.2013

Monday, 9 September 2013

भारत निर्माण !!!

ल्यावा दगिड्यो, जन कि मि ब्यालि बुनु छौ कि भोल एक चर्चरी, बर्बरी, रमरमी कविता आप लोखु थैं पढौंलू। मि अपणु बचन पुर्र्याणु छौं अर यूँ नेतों थैं कनि-कनि सुणाणु छौं। 
अज्क्याल यूँ नेतों थैं जनता खुणी कुच कनों कु बड़ु ख्याल आणों च, नया -२ बिल, आर्डिनेंस पास हूँणांन। मिथैं बि यु पर लिख्णों ज्यु ब्वैलि ग्ये, अखिर कब तलक मि अफ़ि -अफ़ि सुच्णु रांदु। 
भारे! पसंद आलो त टक लग्वै बथयाँ।

 ………………. @ विजय गौड़   

६५ सालों बिटी राज पाट तुमारो,
फेर अज्युं तलक रयाँ कन अजाण,
अचणचक निंद कनि टुट य तुमरि,
जु कन लग्याँ भारत निर्माण ??

साख्यों बिटी त लबड़खंड हि छाया,
अफ़ि धरीं छै सैरि मुल्कौ माया,
अपणा पुट्गा क्य छिकै यलिन,
जु जनता पुट्गा खुणि कानून ऐ ग्याया ?
क़ानून त जरुर लै ग्याँ तुम,
भुर्र्येलि बि थकुलि, कुज्याँण, कुज्याँण ?? 
अचणचक निंद कनि टुट य तुमरि,
जु कन लग्याँ भारत निर्माण ??

ज़मीनों क़ानून बल अब बाटु लग्युं,
जब जमीनों तुम मा तांतु लग्युं,
बेटि -जवैं खुणी ह्वै ग्ये छ्क्वै जणि,
तबि हमरा जोग कुच माटु लग्युं,
जाँद - जाँद हि निर्माणै खज्जि तुम थैं,
जणदा छाँ निथर भोल हैंकु पर्र्वाण ??
अचणचक निंद कनि टुट य तुमरि,
जु कन लग्याँ भारत निर्माण ??

वु गै छाँ 'शाइनिंग' मा,
तुम थैं लि जालु 'निर्माण',
चुनौ बाद कैन बि फेर नि दिख्याँण,
२०१३ तक तुमुन बटोलि,
२०१८ तक वोंन कमाँण,
जनता बिन्गली त ठोक-बजालि,
निथर फेर खिस्ययीं त रालि,
अर तुम बुना रैल्या,
हम नेता महान,
अचणचक निंद कनि टुट य तुमरि,
जु कन लग्याँ भारत निर्माण ??

Copyright@ विजय गौड़ 
०९। ०९। २०१३  

"लोग म्येरा गौं का"

दगिड्यो,

कुच दिन पैलि मिथैं एक बीर रस कि बड़ी भलि कविता पढ़ना कु मिलि, कवि छाया  "बल्ली सिंह चीमा" अर कविता छै:-

ले मशालें चल पड़े हैं लोग मेरे गाँव के
अब अँधेरा जीत लेंगे लोग मेरे गाँव के,

पूरि कविता पौढ़ी कि मिथैं बड़ु भलु लगि पण वे हि बगत मिथैं अपणा मुल्कौ (उत्तराखंड) ख्याल ऐ ग्ये, अर याद ऐ अज्क्याल कि सामजिक स्तिथि। मीं स्ये रये नि ग्ये बिन लिख्याँ अर बीर रस क जगा मा वास्तविक रस (सच्चु रस) मा लिखणै कोसिस कारि, जु बि मिन घौर फुण्ड देखि, यीँ कविता मा लिख्युं च. आप लोग प्रतिक्रिया टक्क लगै दियाँ। …………………  विजय गौड़  


राँका बालि रतब्याँण मि जाणान लोग म्यारा गौं का -२ 
खाल -धारों बस "ठेका" खुज्याणा लोग म्यारा गौं का - २ 

देखि ठेका म लग्युं तालु, हिकमत नि हरणा जमा बि -२ 
अफ़ि छंदड़ो मा, कच्ची बणै प्याणा, लोग म्यारा गौं का - २ 

ब्यो-पगिनी , बार-त्योवारों 'दारु दिब्ता' कि पुजै पैल -२ 
अब त म्वरण मा बि, 'पवा' लगाणा, लोग म्यारा गौं का - २ 

कुच कनै कि धाद द्येणु, मुलुक हैरि डांडी- कांठी - २ 
सरीं बौग, बस बुग्ठ्या -बोतल लगाणा, लोग म्यारा गौं का - २ 

स्कुल्या, मास्टर, बाबू, दफ्तर सबि मिस्याँ, यख छुटु नि क्वी - २ 
कथ्गै त रातिम बि, कुलिणौ इ राणा, लोग म्यारा गौं का - २ 

चकडैत चलणा छि चाल, बुणदन जाल हर चुनौ मा,
कच्चि - पक्किम छन बिकेणा, लोग म्यारा गौं का,
   
कब खुललि य कालि रात, कब मिट्यालु असगार यु -२ 
औ विधाता जरा त्वी बदिल द्ये, जोग म्यारा गौं का - २ 

Copyright@विजय गौड़ 
०९। ०९। २०१३ 

Saturday, 7 September 2013

"घंग्तोल अर दद्दि"

दगिड्यो,

आज फेसबुकै कनि बौल अयीं च, हम सब्बि जणणा छाँ, जै थैं जबि मौका लगणु, कुच्ये जाणू फेसबुक पर।  ब्यालि मिन एक अपडेट पढ़ी, कैन गौं मा डल्युं छौ कि भारै जै का गोर होला, हमरा पुंगड़ा उज्याड़ खाणा छन, जैं बि मौ क छन, लि जावा निथर हमुन गुठ्ये दीणन। द्वी-चार मिनट मा हि वेपर कथि 'लैक' बि ऐ ग्येनि, त बतावा ये फेसबुकन गोर त गोर, गुसैं बि उज्यड़ा बणै यलिंन, निथर ब्वाला दि गोर उज्याड़ खाणा न अर लोग "लैक" कन्नान, बकिबात च।  यनि फेसबुक स्ये परेसान 'दद्दि' कि छ्वीं लगाणु छौं जैंकु नौनु-ब्वारि त दूर नाति-नतिणा, यिख तक 'बाई' बि येमा हि व्यस्त छन,  'दद्दि' न "नाति"  जैकु नौ "घंग्तोल" च,  कु हात पखड़ी अर चलि ग्ये डाक्तार मा, जू अफु बि फेसबुक मा हि लग्युं छौ, त ल्यावा 'दद्दि' अर "डाक्तार" कि छ्वीं "घंग्तोल" क रोग पर जु अज्युं बि मोबैल पर हि लग्युं, बक्कि क्वी खबरसार ना .…


बिन तप्याँ हुयुं टट्गार,
मसाण लग्युं कि पित्रों असगार,
नाड़ नबज बि चलणी ठीक,
अयूँ लोलु यु कनु बुखार,
त्वै बि क्वी खबरसार,
बतौदि बेटा डाक्तार?

जांदू च त आन्दु नि,
ऐ बि त बच्यांदु नि,
कबि मोबैल, कबि कम्पुतार,
हौरि कुच खुज्यांदु नि,
कबि बैठि, कबि लम्पसार,
कनु क्य रांदु लगातार?
बतौदि बेटा डाक्तार?

रात-दिनौ सवाल इ नि,
बगतौ कुच मलाल इ नि,
कखि नौन्याल लग्याँ, कखि ब्वै- बुबा,
यूँ बूड-बुड्यों खयाल इ नि,
सेवा सौन्लि बि बल ये हि पर,
चिपग्याँ किलै सब्बि भितर-भ्यार?
बतौदि बेटा डाक्तार?

मि कुच बुन्नु, तु सुणनी नि?
 डाक्तार रोग पछ्यँणणी नि?
थाम बोड़ी तू रुकणी नि,
गौलि ब्वलि-ब्वलि बि सुखणी नि?
यु बिमारय़ों मा नै औतार,
सरय़ा दुन्या जै स्ये बिमार,
नौ च "फेसबुक्या बुखार"
सूण ब्वनु जु डाक्तार।

येकु नसा कबि रुकदु नि,
उमर कबि यु दिखदु नि,
नौना, ज्वान, बूड -बुड्या,
क्वी भेद -भौ बि करदु बि,
त सबि येका फेर तरफदार,
बिन्ग्ये क्य ब्वनु डाक्तार?

येकु खयुँ कखि ठौ नि खाँद,
वे निंद - बिज्याँ फेसबुक इ दिख्याँद,
ब्वै -बुबों पसंद चा कार नि कार,
वुख धक्याप्येलि "लैक" कनू रान्द
या त्वैकु बिमारि पण युंकु त्योवार,
बक्कि तु बोड़ी अफ़ी समजदार,
यो च "फेसबुक्या बुखार/ त्योवार"

Copy Right @विजय गौड़ "फेसबुक्या"
०६. ०९. २०१३




  

Thursday, 5 September 2013

"प्रीतौ रैबार"

मै तैं नि कुच पता,
मैमु नि सार- खबर,
तन-मन मा कुत्ग्यलि सि,
बोला क्यांकू यु असर। 

पैलि जु कबि नि व्है,
कुच यन्न मै होणु आज,
कबि गौला मा बडुली,
त कबि खुट्यों पराज,
मै तैं कुच हुयूँ त छै च,
पण मै इ नि आणों नजर,
बोला क्यांकू यु असर.…………………

बेर-बेर यनु लग्णु किलै,
कखि बिटी क्वी दिखणु आज,
भलु झणि किलै लग्णु मै थैं,
सजणों - सरमाणों रिवाज,
सरैल - मन मै से लूछि लिजाणी,
य कनि अयीं उमर,
बोला क्यांकू यु असर.…………………

दुन्या ज्वा ब्यालि बिरणी छै,
अपड़ी सि लगणि आज,
धरति फूलों न फुलीं -फुलीं,
अगास म रंगो कु राज,
खुचणी नि य गेड़ मन की,
टुट्णु अब सबर,
बोला क्यांकू यु असर.…………………

@विजय गौड़ 
रचना:रैबार से ………………… 

Tuesday, 3 September 2013

(अबि बदलाव होला येमा, पुरये नि अभि सबि भावों क साथ)


ए बांद, ये चाँद, 
तू  कनै जाणी छै?
इना -वुना दिखणी, 
बोल कै खुज्याणी छै?

चुप रै, फुंड जा लोला,

अपणा बाटा जाणु मि,
त्वै थैं क्येकि फिकर बोल, 
क्य खुज्याणु मि?

खुट्यों, सि पैजबि 

त्येरि खुट्यों, सि पैजबि,
छमछमै कि बजणि त्येरि 
खुट्यों, सि पैजबि ,
बिरडि कख छै जाणि लोलि,
औ मै जनै ऐ जदि, 
मै जनै ऐ जदि 
लोलि कनै जाणी छै?
इना -वुना दिखणी, बोल कै खुज्याणी छै?

दिलै सीं हैन्सि लोलि 

मै सि नि लुकौ,
मनै स्यूं छुयों आज मैमु दये लगौ,

जावा, भिंडी खिजावा ना,

मै तैं सिन रिझावा ना,
मै जै बाटु लोला हिटदी जाणू छौं,
त्वै नि बतोंण मिन,
मि सौंजडया खुज्याणु छौं,   
सौंजडया खुज्याणु छौं, अपणा बाटा जाणु मि,
त्वै थैं क्येकि फिकर बोल, क्य खुज्याणु मि?

"तीस"

तीस छै ज्वा बालापनै कि,
अब झीस सि बिनान्दि जिकुड़ा मा,
आस छै ज्वा म्येरा मनै कि,
अब फांस सि लगान्दि गौला मा। 

कबि ज्व चल्दि छै दगड़ी अछेलु सि,
आज छैल कैकु किलै ह्वै,
कबि ज्व झुल्दि छै मैमु लगुलि सि,
आज गैल हैंकु किलै व्है ,
चौका हिटदी-रिटदी छै ज्व म्येरा,
सजणी किलै हौरों जिंगला मा,
तीस छै ज्वा……… …
आस छै ज्वा……… …… 

कबि ज्व बगदी छै प्रीतौ गदेरू सि,
आज सुख्युं छ्वया किलै व्है,
कबि ज्वा फ़ुलदि छै मायौ सग्वडि सि,
माया व आज कनि सुख्ये,
बीज छौ जु मिन बुत्युं कबि,
उपजि किलै हौरों पुन्गडा मा .
तीस छै ज्वा……… ……
आस छै ज्वा……… …… 

खिलीं जून छै ज्व पुरन्मासि कि,
आज औन्सि रात सी किलै,
तिसलौं रुझाँदि छै ज्व चौमास सि,
आज रुड्या घाम ह्वै किलै,
सौं खै छै जैन ज्योण-म्वनै कबि,
छोड़ि ग्ये किलै रोंदु यकुला मा,
तीस छै ज्वा……… ……
आस छै ज्वा……… …… 


@copyright विजय गौड़ 
०५.०९.२०१३ 

Monday, 2 September 2013

'ज़िन्दगी'

कबि हैन्सै, कबि रुवै जख,
क्य तुम बि गयाँ वे गौं ?
'ज़िन्दगी' जैकु नौ।  
कबि घाम, कबि बथौं।।

भला दिन बि लान्दि या,
त कबि दिन बुरा कै जान्दि या,
भला-बुरा कर्मों कु फल बि,
यिखि चखै चलि जान्दि या,
फेर बि बुन्नु रांदु मनखि,
मै स्ये बड़ि क्वा मौ,
कबि घाम, कबि बथौं।।

कबि हैन्सै, कबि रुवै जख,
क्य तुम बि गयाँ वे गौं ?
'ज़िन्दगी' जैकु नौ।  
कबि घाम, कबि बथौं।।

कैकु दिन त कैकि रात यिख,
कैकि जीत, कैकि मात यिख,
वेकि मर्जि न रिन्गदा मनखि,
खिल्दा फूल, झड़दा पात यिख, 
वेका बि दिन बौड़ला भोल,
तू अफू हि फुन्डया नि चितौ, 
कबि घाम, कबि बथौं।।

कबि हैन्सै, कबि रुवै जख,
क्य तुम बि गयाँ वे गौं ?
'ज़िन्दगी' वेकु नौ।  
कबि घाम, कबि बथौं।।

दिलै सूणा, मनै बोला तुम,
जैथैं चौंदा, वेका ह्वै ल्या तुम,
सुपन्यल्या स्वीणों आज,
वीणा बणै ल्या तुम,
द्वी दिना कि या ज़िन्दगी,
काट- काटी नि बितौ,
कबि घाम, कबि बथौं।।


कबि हैन्सै, कबि रुवै जख,
क्य तुम बि गयाँ वे गौं ?
'ज़िन्दगी' वेकु नौ।  
कबि घाम, कबि बथौं।।


विजय गौड़ 
Copyright@ Vijay Gaur
02/09/2013

Thursday, 29 August 2013

"ज्वनि कि छ्वीं"

ब्यो-पगिनि अर गों-गल्यों मा, 
अगड़ी-पिछड़ी अटगण छोडि दया। 
ब्वल्युं माना, "ब्यो" कि सोचा, 
सिन "बौल्या" बणण तुम छोडि दया। 

मनै क्या च, 
ग्वाया लगाणु रांदु लोलु जखि-कखि,
कबि इनै त कबि उनै कि रान्दि येकि दयखा-दयेखि,
द्वी-दिन कि प्रीतै रीत कि हवा चलणि तेज अब,
यनि हवा मा तुम लोलाओ जरा उड़ण छोडि दया,
ब्वल्युं माना, "ब्यो" कि सोचा,
सिन 'बौल्या' बणण तुम छोडि दया, 

गौं - बरात्युम, 
छजा मा द्येखि, उड़दु मन कख-कख त्येरु,
मि बि आज-यिखी बणि जौं ब्योला, बुल्दु मन जखि-कखि त्येरु,
हौरों क ब्यो मा, सिन्नी ख्याल-ख्यालों मा, 
मन कु डोला डोलुणु अब छोड़ि द्या ,
ब्वल्युं माना, "ब्यो" कि सोचा,
सिन 'बौल्या' बणण तुम छोडि दया,    



कब तलक यन बगणा रैल्या, अफि, अफु थैं ठगणा रैल्या,
ये मन थैं मन्चलु कैरि -कैरि, झूटा सुपन्या पलणा रैल्या,
सुपन्या छोड़िकि, सच मा आवा,
सुद्दि गाणि करणि तुम छोड़ि द्या,
ब्वल्युं माना, "ब्यो" कि सोचा,
सिन 'बौल्या' बणण तुम छोडि दया,    

विजय गौड़ 
Copyright @ विजय गौड़ 28.08.2013 
संसोधन : २३ दिसम्बर २०१३ 


Monday, 26 August 2013

"उरख्यलि"

दगिड्यो,
आज सब्यों कु परिचय एक यनि चीज़ से कराणु छौं जु हमरा इतिहास मा बडु महत्व कु स्थान रख्दि छै। आज अवश्य नै समय क नौन्याल बुल ला कि मि क्य बात कनु छौं पण सच यु ई च कि ईं वस्तु कु हम सब्यों क वास्ता बडू योगदान रै। वे समय मा दिख्ये जा त या 'ब्वै' कु हि रूप छै। मै बात कनु छौं  "उरख्यलि" की ज्व कबि हरेक चौकै तिरालि दिखेंदी छै, जैमा रोज नाज कुटेंदु छौ अर वांका पश्चात हम खांदा छाया। आज य कुटणा कि परंपरा विलुप्ति का द्वार पर च, मेरु प्रयास यनु च कि ईं अन्नदाता की कुछ स्मृति बिटोलि की रखूँ। एक कविता हमरा पुरण्यों कि ईं सैन्दाण "उरख्यलि" थैं समर्पित। 


बिसरी ग्याँ तुम जैथैं, मै व़ी नखरयलि छौं,
जरा पछ्याँणा त भुलों मैथै, मै तुमरि हि उरख्यलि छौं। 

तुमरु मेरो साथ साख्यों बिटी च,
ब्वै क हतु कि रुटलि, भैणि राख्यों बिटी च  
तुम भूकन कबि रुयाँ त मि ब्वै बणी ग्यों,
मौस्याँण सि चा रयुं भैर, पण मौस्याँण कबि नि रौं,
मि सुप्पु कि दगड्या अर दीदि गंज्यलिक छौं,
पछ्याँणि तुमुन मैथै, मै तुमरि हि उर्ख्यलि छौं।   

ददि-दाज्यों बारम भुलों बड़ी सज-समाल छै,
धुवै-पुछ्ये कि, रोज कुटे कि होंदि जग्वाल छै,
ब्यो-पगिन्यों बेर मैमु बि रान्दि हल्दयाण छै,
बार-त्योहारों कि वे बगत अहा कनि रस्याँण छै,
पितरों कि सैन्दांण भुलों, मै नाजै औंज्यलि छौं,
पछ्याँणि तुमुन मैथै, मै तुमरि हि उर्ख्यलि छौं।   

अब मुल्कौ रीत-रिवाज सि मि बि हर्चि ग्यों,
नै ज़मानै दौड़-भागम भुलों, मि नि दौड़ी सक्यों,
खेति-पात्यों जब नाज हि क्वी नि बुतणा, 
उरख्यली, जन्दरि फेर कैन सुंगणा?
पाणी जैकु प्योणु नि क्वी आज, मि वा नवलि छौं,
पछ्याँणि तुमुन मैथै, मै तुमरि हि उर्ख्यलि छौं।   

कॉपीराईट @विजय गौड़ २७.०८.२०१३  


Sunday, 25 August 2013

साबधान, मेरु मुलुक, साबधान !!!!

दगिड्यो,
आज फेर मुल्कौ आवाहन कनु छौं, इन्टरनेट द्वारा उपलब्ध ये सामाजिक माध्यम द्वारा। हम्थैं नयु राज्य मिलि अब १३ साल ह्वै ग्येनि पण हमरि स्तिथि जख्यातखि च, राज्य बणु छौ पहाडों क वास्ता पण पाडों मा हि कुच नि ह्वै। आज बगत बुनु च कि एक हैंकु आंदोलन चयेणु उत्तराखंड मा, पहाड़ क वास्ता, पाड्यों क वास्ता। दगड़ा दगड़ी अकलबर बणी यन बि दिखण कि कखि फेर यनु नि ह्वै जा कि बीज बूता हम अर कुन्ना भरि जै हौरों का, जन उत्तराखंड राज बणणों बगत ह्वै। ये हि विषय पर कविता लिखि आवाहन कनु छौं सब्यों से, रैबार जरूर पौञ्चलु, यनि आस च, विस्वास च।  

साबधान, मेरु मुलुक, साबधान !!!!    


कबि खुटी ज़मीन नि छोड़ त्येरि,
अर टक नि छोड़ कबि असमान,
भैऱ्या पछ्यण्या बैऱ्यों से पैलि,
रै भितरै अजाणों से साबधान !!
साबधान, मेरु मुलुक जरसि साबधान!!
ब्वल्युं मान, बगतौ ब्वल्युं मान। 

जब तू अयूँ छौ सड़क्यों मा,
कुच चिलांग बैठ्याँ छा खिड्क्यों मा,
वुख तू लड़णू छौ सड़क्यों मा,
वू मौका द्वपणु छौ खिड्क्यों मा,
फेर नै लड़े लड़ण से पैलि,
जरा यूँ द्वी-चारों से साबधान!
साबधान, मेरु मुलुक जरसि साबधान!!
ब्वल्युं मान, बगतौ ब्वल्युं मान। 

बालु नि रै तू बडू व्है ग्ये अब,
तेरह सालम छड़छुड़ू व्है ग्ये अब,
मनखि पछ्यणणों बगत ऐ ग्ये अब,
हौरों सारा तू भिंडी रै ग्ये अब,
अपड़ू समझि बुलंण से पैलि,
जरा जैचंदों से साबधान!!
साबधान, मेरु मुलुक जरसि साबधान!!
ब्वल्युं मान, बगतौ ब्वल्युं मान। 

देस खुणि सहीद होणो इतिहास रै बुलंद त्येरो,
भविष्य नौन्यालु कु हेरुणों घौर बिटी मुखुंद त्येरो,
तौं उठै कि उन्द लि जैकि काज नि होण हल त्येरो,
यिखि पौढ़ी जब यिखि कमैलो, भाग तबि सुफल त्येरो,
भोलै पुन्गड्यों हलाहल से पैलि,
बीज त बूत ये बर्तमान,
साबधान, मेरु मुलुक जरसि साबधान!!
ब्वल्युं मान, बगतौ ब्वल्युं मान। 

रचना: विजय गौड़ 
कॉपीराइट @ Vijay Gaur २६/०८/२०१३