Thursday, 31 January 2013

मिन उथगा हि त्वै खुदयाँण......

त्येरि मै बिसरणों बातन, बात हि रै जाण,
तू जथगा बिसरण चैली, मिन उथगा हि त्वै खुदयाँण।

क्वी सवाल कारलु कि चुप किलै छै,
तिन चुप हि राण,
शब्द खुज्यांदी रैलि,
पर गिचा बीटिंन क्वी जवाब नि आण,
तू जथगा बिसरण चैली, मिन उथगा हि त्वै खुदयाँण......

क्वी त्वै उक्सालु कि म्येरा बारा बता,
तिन टुल-टुल रव़े जाण,
यनि स्वाणी माया अपणी, 
आखिर जै कै मा कनक्वै बर्ताण,
तू जथगा बिसरण चैली, मिन उथगा हि त्वै खुदयाँण......

मिन सुणि जोडि त वु विधाता बणांद,
त मनखिन क्य कैर पाण,
तु जैखुणि बणे वेन, वुख चलि जैली,
म्येरि आश न मैम हि रै जाण,
तू जथगा बिसरण चैली, मिन उथगा हि त्वै खुदयाँण......
त्येरि मै बिसरणों बातन, बात हि रै जाण....

विजय गौड़ 
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सैंदाण

कै बिरणे सैंदाण मिन समालि धरीं च,
मिन कै नि दिखाण, कि मिन क्य पालि धरीं च।


माया ज़िन्दगी मा पंछी बणि आंदी,
त्वै मायादार कैकि, कखि हौर उड़ी जांदी,
मैमा एक तोला नि, वून नालि धरीं च,
कै बिरणे सैंदाण मिन समालि धरीं च....

म्येरु बाटू हिटणो, वा झणी कख्वै ए जांदी,
काण्डों वला बाटों बि सजीला फूल खिलै जांदी,
कबि ज्वा रै छै खुचिला, वा अब तिरालि धरीं च,
कै बिरणे सैंदाण मिन समालि धरीं च......


होन्दि म्येरि अपणी त मैमा हि त रांदी,
म्येरू बणयु घोल, सिन त नि रितांदी,
मिन अपणी नवलि, कै हैंको खालि करीं च,
कै बिरणे सैंदाण मिन समालि धरीं च....

विजय गौड़
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या सिन्नी गवाणे, रात नी च!!!

सुद्दी-सुद्दी मनाणे की बात नी च,
या सिन्नी गवाणे, रात नी च।

तू हि म्यरु ज्यू,
तु हि म्येरि ज्यान,
मिथें ज़मना कि जरुरत नी च,
त्वै दिखणु, त्वै सुचणु,
लठ्याली! म्येरि ज़िन्दगी यी च,
सुद्दी-सुद्दी मनाणे की बात नी च........

मैसणि त्येरि औंगाल हि भौत,
याँ स्ये अग्नै क्वी चाहत नि च,
एक नज़र त्येरि मुखुड़ी कि,
याँ स्ये बक्कि मै राहत नी च,
सुद्दी-सुद्दी मनाणे की बात नी च........

त्येरी मुल-मुल हैंसी भौत च मैकु,
अब दवै खाणे कि बात नी च।
त्येरा बाना हि इथगा बिमार छौं,
हौरि रोग आणे कि बात नी च
सुद्दी-सुद्दी मनाणे की बात नी च........

जब दिल स्ये दिल पैली मिल्यान,
फिर दुन्या दिखाणे बात नी च।
तु म्येरि, मि त्यरु ह्वै ग्यों आज,
या क्वी बताणे बात नी च।
सुद्दी-सुद्दी मनाणे की बात नी च........

विजय गौड़
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त्येरि मुखुड़ी से स्वाणु मै कुच बि नि लगदु!!!

त्येरि मुखुड़ी से स्वाणु मै कुच बि नि लगदु,
त्येरा अग्नै स्यु ज्यून बि पाणि मंगदु।

करलि आंख्युं न घैल कैर जांदी,

अर मरीजो हाल बि नि पुछणों आंदी,
आखिर मै स्ये चांदी छै त क्या चांदी,
लोलि त्येरा ख्याल से हि मै बडुली ऐ जांदी,
ब्यखुनि -फज़ल बस त्वै याद करदु,
त्येरि मुखुड़ी से स्वाणु मै कुच बि नि लगदु।।।।

यीं आग कु क्या, ज्वा बेर-बेर लग जांदी,

पर बुझदा-बुझदा कुज्यणि कथगा खंड खिलांदी,
जल्याँ कु दुःख जलदरा कि जिकुड़ी हि चितांदी,
जै मौलदा-मौलदा सर्या ज़िन्दगी लग जांदी,
मै त्वै हि यीं आग कु मलहम मनदु,
त्येरि मुखुड़ी से स्वाणु मै कुच बि नि लगदु।।।।  

ज्यू ब्वनु कि कबि तु भि मैथें चांदी,

म्येरा दगड़ी मायादार छवीं लगान्दी, 
त म्येरि ज़िन्दगी बि सब्यों बतै पांदी,
कि रोज-रोज ज्यून मै मिलणु आंदी,
यां से पोर मि कुच हौर नि सुचदु,
त्येरि मुखुड़ी से स्वाणु मै कुच बि नि लगदु।।।।       
त्येरा अग्नै स्यु ज्यून बि पाणि मंगदु।।।।

विजय गौड़ 

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Wednesday, 30 January 2013

मै पसंद ऐ ग्ये!!!

त्वै स्ये मिलणु, छ्वीं लगाणु, मैं पसंद ऐ ग्ये,
क्या च यु, क्योकु च यु,मै नि पता,
सच त यु हि च कि तु मै पसंद ऐ ग्ये!!!

तेरु मुल-मुल हैसणु
छित्ती -छित्ती खंसणु,
त्येरि खुद, तेरु हि ख्याल,
म्येरा मन्न बसणु,
क्या च यु, क्योकु च यु,मै नि पता,
सच त यु हि च कि तु मै पसंद ऐ ग्ये!!!

अफ़ी -अफ़ी बच्याणु, 
त्येरी छ्वीं लगाणु,
लोला मन्न मा अब,
हौरि कुछ भि त नि आणू,
क्या च यु, क्योकु च यु,मै नि पता,
सच त यु हि च कि तु मै पसंद ऐ ग्ये!!!

त्येरी सूरत आंख्यु मा रिंगणी,
ज़िन्दगी हौरि कुच बि नि बिंगणी,
खुट्टी बिन बुल्याँ, त्वै जना हिटणी,
स्वीणों-वीणों मा बस तू हि तु रिटणी,
क्या च यु, क्योकु च यु,मै नि पता,
सच त यु हि च कि तु मै पसंद ऐ ग्ये!!!    

त्वै स्ये मिलणु, छ्वीं लगाणु, मैं पसंद ऐ ग्ये,
क्या च यु, क्योकु च यु,मै नि पता,
सच त यु हि च कि तु, म्येरि ह्वै ग्ये!!!

विजय गौड़ 
सर्वाधिकार सुरक्षित...

भयात

कभि जु दगड़ी खेल्दु छौ,
कभि जु अपणु सि मिल्दु छौ।
कभि जु म्येरी हैंसी बानो,
अपणु सुख-दुःख भुल्दु छौ। 
आज यु कन बगत ऐ ग्ये, 
एक हि कोख से जन्म्यु भै,
म्येरू सोरु ह्वै ग्ये !!

कभि जु घुग्गा बिठांदु छौ,
कभि मि लम्डू, उठांदु छौ,
कभि गट्टा -कुंजा खिलांदु छौ,
कभि फुटयाँ घुन्डों सिलांदु छौ,
आज यु कन बगत ऐ ग्ये,
एक हि कोख से जन्म्यु भै,
म्येरू सोरु ह्वै ग्ये !!

कभि जु स्कूल लि जान्दु छौ,
कभि जु कंचौ खिलांदु छौ,
कभि दगड़ मा कुकर छुल्यांदु छौ,
कभि सारयों मा बांदर हकांदु छौ।
आज यु कन बगत ऐ ग्ये,
एक हि कोख से जन्म्यु भै,
म्येरू सोरु ह्वै ग्ये !!

हे विधाता! मि त्वै स्ये बुन्नु छौं,
अपणी हि न, सभि मन्ख्यों कि बात कनु छौं,
अगर तिन भयात कु अंत यन हि लिख्युं,
त मि त्येरि बात नि मनणु छौं,
तु यु कनु इंसाफ कै ग्ये,
जु बालापन कु अटूट ज़ोड़,
या लोलि ज्वनि, आन्द-आन्द हि खै ग्ये. 

विजय गौड़ 
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Monday, 21 January 2013

"नैनीडांड विकास संघ"

दयेखा नैनी डांड मा एक नयि सुबेर हूणी च,
नना -तिना, दाना-सयाणों कि एक नई पौध औणी च।

सब्यों का मन्न मा कुछ कर-गुजरणा कि बात च,
जग-जगों छेत्र विकास खुणी लगणी लंगात च। 
अहा! नैणी, बुंगी, दीवा, भौना, धुमा सब्बि दैणि हुयान,
अर अपणा नौन्यालु थैं औंगाल बोट्टी बुनान, 
कि म्येरा नौन्यालु कु यु कदम, म्येरा छेत्र का विकास खुणी च।   
दयेखा नैनीडांड मा एक नयि सुबेर हूणी च,

आज क्वी न रौत, न नेगी न बलूणी च,
हरेक कि बस एक हि मनसा एकि मनौणि च,
लगावा रै मर्दों जोर, और पौंचा दयेल्यूं-दयेल्यूं,
तुम थैं आज जलमभूमि भटयोणि च,  
दयेखा नैनीडांड मा एक नयि सुबेर हूणी च,

बालापन, ज्वनि अर बुडापू कु यु मिलाप क्वी राजनीति नि च,
यान्कू आदि अर अंत केवल अर केवल, विकासनीति च।
छेत्र जागरूक कना खुणी, हमन रांका उठयाँन,
अपणा व्यक्तिगत फैदा, पैलि कूणों चुटयाँन,
मुल्कै कि प्रगति हि सब्यो कु घ्यू, दूध अर नौणी च,
दयेखा नैनीडांड मा एक नयि सुबेर हूणी च....

जग-जगों मन्ख्यों का मेला लगणांन,
दीदी-भुली, काकी-बोड़ी सब छेत्र विकास मंगणान। 
अर बुलंदी कु नौ धर्युं नैनीडांड विकास संघ,
या त्यरि हि ना, म्यरि हि न, हम सब्यों कि जंग।
आवा अर जुड़ा यीं विकास यात्रा से,
जु बस हमुसणी हि ना, हमरी नई पुश्तों खुणी च।
दयेखा नैनीडांड मा एक नयि सुबेर हूणी च...

विजय गौड़ 

Saturday, 29 December 2012

दामिनी!! निर्भया!!! अमानत !!!



क्वी दामिनी बुन्नु, क्वी निर्भया त क्वी अमानत!
वीन त जाणु छौ और वा चलि भी ग्ये,
वाह रे म्येरा देस, म्यरु समाज,
त्वै परैं बस अर बस,  लानत!!

जै देस मा माँ-भैण्यो कु सम्मान नि,
जै देस मा इंसान, इंसान नि,
दरिंदा जख देखा, जना देखा 
लुटणा छन, नुचणा छन,
आखिर कख हर्चणि ये समाज बीटिंन इंसानियत,
क्वी दामिनी बुन्नु, क्वी निर्भया त क्वी अमानत!

व्यवस्था कु नौ बिवसता ह्वै ग्ये अज्क्याल,
शासन मा सांस नि रै ग्ये, सब्यों न दयेख्याल,
निर्दोस हथकडयों मा जकिड्यू च,
दोषी खुल्ला घुम्णो अर हैंकु शिकार खुज्णु च,
कखी वर्दी मा त कखी बिन वर्दी,
खून चुसणी हैवानियत 
क्वी दामिनी बुन्नु, क्वी निर्भया त क्वी अमानत!

नेता बुन्नान पुलिस ठिक नि 
पुलिस बुन्नी समाज ठिक नि,
जु मुंड उठाणु वेमा डंडा बर्स्येणा,
बर्फिलू पाणि कि वौछार बुन्नी, त्येरि जगह यिख नि,
तुमरू राज-पाट बस दयेली भितिर तक हि च,
बक्की सर्या देस पैंसा वलों कि मिल्कियत,
क्वी दामिनी बुन्नु, क्वी निर्भया त क्वी अमानत!

हे विधाता! त्वै त्येरा सौं, ये मुलुक अब बेटी नि पैदा होण दये,
सच बुन्नु छौ अब मिथै त्येरा नौ पर भि विस्वास नि रै ग्ये,
मिन सूणी त्रेतायुग मा रामराज छौ, सब सुरक्षित छाया,  
पर समय की पराकास्ठा दयेखा, 
कलयुग आन्द -आन्द 'रामसिंह' सबि मर्यादा भूलि, अफ़ी बलात्कारी ह्वै ग्ये,
सडकों मा जख देखा भेड़िया हि भेड़िया,
मानवता झणी कख व्है नदारद,
क्वी दामिनी बुन्नु, क्वी निर्भया त क्वी अमानत!
वीन त जाणु छौ और वा चलि भी ग्ये,
वाह रे म्येरा देस, म्यरु समाज,
त्वै परैं बस अर बस,  लानत!!

विजय गौड़ 'शर्मसार'
29/12/2012

Monday, 3 December 2012

"प्रवासी"


कैथैं सुणों यीं कथा, कैमा लगौं य व्यथा,
म्येरू ज्यु ब्वनु सब्यों बताणो,
क्वी त बोला दी!!!!......बथा।

मिन बि ल्ये छौ यु जलम,
स्यीं स्वाणी धरती मा,
मिन बि बाँचि छन आखर-पहाड़ा,
वीं नीली-ख़ाकी स्कुल्या बरदी मा,
फिर बगतन छुड्ये दये मुलुक,
झणी किलै! मै नि पता!!!!
म्येरू ज्यु ब्वनु सब्यों बताणो,
क्वी त बोला दी!!!!......बथा।

मजबूरी मिथें बिरणा मुलुक लि ऐ,
न यिख, न उख, क्वी बि त अब अपणु नि रै,
म्येरा अपणा हि अब मै "प्रवासी" बुलान्दन,
बेर-बेर म्येरि मजबूरी याद दिलान्दन,
"प्रवास" कैसणी भलु लगदु?
तुमि बोला, तुमि बता??
म्येरू ज्यु ब्वनु सब्यों बताणो,
क्वी त बोला दी!!!!......बथा।

स्यु छौं आज बिना "पछ्याण" कु जीणू,
पहाड़ी ह्वैकि बि पहाड़ नि रैणु,
लाटु मन्न पहाड़ों मा हि रिन्गणु,
निर्दयी बगत मनै बात नि बिंगणु,
प्रवासी से निवासी होण कि मंसा,
पूरी होलि कि ना, नि पता,

कैथैं सुणों यीं कथा, कैमा लगौं य व्यथा,
म्येरू ज्यु ब्वनु सब्यों बताणो,
क्वी त बोला दी!!!!......बथा।

विजय गौड़ 
सर्वाधिकार सुरक्षित।
पूर्व प्रकाशित 

Tuesday, 13 November 2012

"बारा सालौ उत्तराखंड"


पैली बि राति छै, अज्युं बि रात हि च,
एक-द्वी सालै ना, या बारा सालों बात च!!

अपणों न बोलि यनु होलु,
बिरणों न बोलि तनु होलु,
नयु राज होलु त झणी कनु-कनु होलु,
छ्वीं त सब्यों न बड़ी-बड़ी करिंन!
विकासे नौ ढाँके तीन पात च,
एक-द्वी सालै ना, या बारा सालों बात च!!

जनता अज्युं बि रेल सुणी जलक्येणी,
रेल त कखी सरक्ये नि च, लोग 'रेल पुरुष' ह्वै ग्येनी,
सड़क त सरकरी कागज़ों मा हि बणदन,
लोग नमान अज्युं बि उकाल-उन्दार हि नपणन,
जुन्यली रातै आस, पर हुयीं औंसी रात च!
एक-द्वी सालै ना, या बारा सालों बात च!!

मिन सुणी, हम गँगा मैति छाँ!
पण पाणि नौ पर बस सूखि गौलि च,
सच्ये! नौनि का मैत्यों पूछ कब छै,
रौली म्येरि पण पाणि गुसैं क्वी हौरि च,
मुलुक मा जख द्येखा, बस डामों कि लंगात च!
एक-द्वी सालै ना, या बारा सालों बात च!! 

जै धरती बिटिन कबि जलधार बगदी छै,
अज्क्याल उख बिटिन, मनखी बगणांन,
जौं थाडों म कबि बचपन अटगदू छौ,
अब सुनक्याल हुयान, अर छिप्वडवा-बिरला रिन्गडान,
प्रवास थमेनौ नौ नि लीणु,यु कनु बकिबात च!
एक-द्वी सालै ना, या बारा सालों बात च!! 

पैली बि राति छै, अज्युं बि रात हि च,
एक-द्वी सालै ना, या बारा सालों बात च!!

विजय गौड़ 
सर्वाधिकार सुरक्षित         

Friday, 9 November 2012

सौंजण्या!!!


दगीड्यों!! येबगत अर्जेंटीना का ब्वेनोस आइरिस मा एक होटल मा बैठ्यु छौं!! अबि-2 बरखा बंद व्है और बड़ी स्वाणी हवा चनी च!!यनु मौसम मा अपणी सौंजण्या कैथे नि याद आलि!! मिन सोचि यनि बात सब्यों दगड़ी कबि न कबि त होंदी होलि, त सब्यों थें सुणाणु छौं अपणा मन का स्यी उदगार!!!!      

सौंजण्या!!!  

त्येरी-म्येरि उठड्यों मा, मिठा-मिठा गीत सौंजण्या!!! 
अग्ने-अग्ने हिटणा हम, पिछ्नै औंदि प्रीत सौंजण्या!!!  

पैलि-पैलि यीं माया की या पैलि रात खुदयांदी रैलि!
माया की यीं मौल्यार माँ, हुयीं छ्वीं-बात खुदयांदी रैलि!
ज्यु ब्वनु या सरया ज़िन्दगी, यनि कटये, यनि बीत सौंजण्या!!!  
अग्ने-अग्ने हिटणा हम, पिछ्नै औंदि प्रीत सौंजण्या!!!  

आंख्यों मा त्वी रैंदी सदानी, आंखि मि जमा बि बुजदू!
जरा मि स्युं आंख्यों से, अपणा मनै बात पूछि ल्यूं!
त्येरी यनि छ्वीं बतों न, म्यरु मन ल्ये जीत सौंजण्या!!!         
अग्ने-अग्ने हिटणा हम, पिछ्नै औंदि प्रीत सौंजण्या!!!  

छ्वटा-छवटा यि दिन-रात, झणी कथगा छ्वीं छन बचीं!
जल्दि च क्ये बात कि, स्वाणी सरया ज़िन्दगी बचीं!
मन बुन्नु यन्नी छुयों-छुयों मा, बगत जा यु बीत सौंजण्या!!!     
अग्ने-अग्ने हिटणा हम, पिछ्नै औंदि प्रीत सौंजण्या!!!  

त्येरी-म्येरि उठड्यों मा, मिठा-मिठा गीत सौंजण्या!!! 
अग्ने-अग्ने हिटणा हम, पिछ्नै औंदि प्रीत सौंजण्या!!! 

विजय गौड़ 
सर्वाधिकार सुरक्षित 

Wednesday, 7 November 2012

"मैंगै"(महँगाई )


न क्वी दिन-बार, न रंत रैबार,
अर बिन बुलयाँ, म्येरू मैमान ह्वै ग्ये!
मैंगै!!! लोलि तू फेर ऐ ग्ये।

कबि आटु, कबि चौंल त कबि तेल मा आणि छै,
हे निर्दयी! तू त अज्क्याल पाणि बि नि छोड़ जाणि छै!
जु पाणि एक बगत छम्वाटोन छौ पियेंदु,
वेका घुग्गा बि तु टैक्स बणी बैठ जाणि छै,
न क्वी सरम-ल्याज, न कैकु लिहाज!
बिरणा मुल्कै नौनी सि ह्वै ग्ये!!
मैंगै!!! लोलि तू फेर ऐ ग्ये।

न घ्यू दूधै छरक,न गोर बखरों का खरक,
सरग त बरखणु बिसिर ग्ये, अब त्येरी हि हुई बरखा-बरख!
सारयों मा नाज अर क्यारों मा साग,
जरा सि ह्वै ग्ये त, वे भग्यानौ भाग!
न क्वी धै! न ढौ-ढसाग,
पहाडयों पर देसी लसाग सि ऐ ग्ये!!      
मैंगै!!! लोलि तू फेर ऐ ग्ये।

आखिर क्वी दीन-इमान बि होण चयेणु च,
यनि रक-रक ब्यखुनी-फजेल नि औण चयेणु च,
अफु थैं सिन्नी ब्योलो बामण चितांदी!!
त स्यों नेतों का घौर किलै नि जांदी??
न क्वी कट्वरा, न रसिदै किताब,
जै कै का द्वार भटकै, भितर कुच्ये ग्ये!!
मैंगै!!! लोलि तू फेर ऐ ग्ये।
मैंगै!!! लोलि तू फेर ऐ ग्ये।


विजय गौड़
सर्वाधिकार सुरक्षित 
 07/11/2012             

Tuesday, 30 October 2012

"माया कु रैबार"


कै बिना रयेणु नि, गफ्फा अब खयेणु नि,
रात-दिन आंखि बिन्जी रैन्दिन,
बोला! क्या यिथैं हि 'माया' बोदिन??

रूम-झुम वूं छीटों मा, बस्ग्याल का च्वींटों मा,
दयेखी छै पैलि बार,
ऐ ग्ये छै जिकुड़ी मौल्यार,
ऐ  छै जब सामणी,झणी क्या मै ह्वै ग्येई?
स्वीणों मा त छै हि छै, म्येरा वीणा भि ल्ये ग्येई!!
रात-दिन आंखि बिन्जी रैन्दिन,
बोला! क्या यिथैं हि 'माया' बोदिन??

कनि अजाण सि बात च, जन कि दिन मा हि रात च,
अफ़ी -अफ़ी बच्यांदु छौं कै बार,
क्या यी च 'माया कु रैबार'
दयेख्दु छौं जना भि अब तू हि तू दिख्येन्दी छई,
जाण-पछ्याण चा ह्वै नि च, पर तू अपणी ह्वै ग्येई!!
रात-दिन आंखि बिन्जी रैन्दिन,
बोला! क्या यिथैं हि 'माया' बोदिन??

म्यरु ज्यु - म्यरि ज्यान,  त्वी बता! त्वे कख खुज्याँण?
खोजि मिन त्वे सब्बि गों-बज़ार,
कख करु त्वे स्ये सौं- क़रार,
त्येरी माया कु असर, इथगा मै पर ऐ ग्येई,
दुन्या-दारी सर्या बुन्नी, स्यु नौनु बौल्या ह्वै ग्येई!!

कै बिना रयेणु नि, गफ्फा अब खयेणु नि,
रात-दिन आंखि बिन्जी रैन्दिन,
बोला! क्या यिथैं हि 'माया' बोदिन??  

विजय गौड़ 
30/10/2012
सर्वाधिकार सुरक्षित....
  

Sunday, 28 October 2012

लाटि माया!!!!!


जै खुज्याणो बाटों का गारा कुर्च्येनी,
वा सदानि बाटु बिरड़ान्दी रैई!
मी भितिर हि भितिर फुकेणु रौंऊ,
वा खित हैंसी, हौर सुल्गांदी रैई!

मिन मनै गेढ़ वीमा खोलिनि,
वा गारा सि छमड़ान्दि रै,
मिन दिलै बथ वीमा बोलिनी,
वा ज़मना थैं बथान्दी रै!

वींका बाना अपणा, बिरणा ह्वै ग्येनी,
वा बिरणों थैं अपणान्दी रै!
मी वीं जनै हिटदु रौं,
वा फुन्डों-फुन्डों जांदी रै! 

आज स्यु हुयू क्वीलु सि कालु,
वा ग्वारों खुज्यांदी रै!
मी भि बालपन मा गोरु हि छौ ,
या ज्वनी  कालु बणान्दी ग्ये!!
या ज्वनी  कालु बणान्दी ग्ये!!     

विजय गौड़ 
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Tuesday, 18 September 2012

"पहाड़ी नि छै त कु छै तू??"

क्योकु छै अपणी पछ्याण लुकाणु,
क्योकु छै अपु पर सवाल उठाणु,
क्योकु छै अपणो से दूर तू जाणू,
क्योकु छै झूटि सान चिताणु,
अन्वार मा पहाड़ लिख्युं जैकू,
पहाड़ी नि छै, त कु छै तू?

कख छै बस्ग्यली पाणि सि बगणु,
कैकु छै तू घामपाणि सि ठगणु,
क्योकु  छै बिरणा मुलुक तू भगणू,
क्योकु चौका-तिबारयु स्यु मन्न नि लग्णु,
छुयों मा पहाड़ लिख्युं जैकू,
पहाड़ी नि छै, त कु छै तू?

क्योकु  तेरु नौनु पहाड़ी नि बिन्ग्णु,
क्योकु  तेरा गों वू अपणु गों नि बुल्णु,
क्योकु  दाना ब्वे-बाबों का बारा नि सुच्णु,
क्योकु  त्वे से गोर-बखरू नि खुच्णु,
पैरवाक मा पहाड़ लिख्युं जैकू,
पहाड़ी नि छै, त कु छै तू?  

आज त्यरू पहाड़ त्वे धै च लगाणु,
तू वेकु हि छै त्वे बडुली लगाणु,
कख छै लोला तू बिरड़दू जाणू,
त्वैकू ठंडी हवा, ठंडो पाणि धर्युं,
अर तू छै स्यीं गरम लू तख खाणु,
गरमन हाल बेहाल हुणू  जैकू,
पहाड़ी अर बस पहाड़ी छै तू......

विजय गौड़ 
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१८.०९.२०१२

Public Views:

Jagpal Rawat बिलकुल सही बात गौर भै, हम थै अपरू पैछान नि छुपान चैन्द. सही बात च कि "पहाड़ी नि छै, त कु छै तू?" बहुत बढ़िया ............. मन खुश कर दिया... बस लिखदा राव अर हम थै इन चटपटा कविता सुनाण राव....