कहो, किस विधि से हो जाये।
Thursday, 24 December 2020
श्री राम दर्शन!
कहो, किस विधि से हो जाये।
Saturday, 5 December 2020
विजय की बुद्धिजीविता शृंखला: शौर्य दिवस पर विशेष
सर्वप्रथम तो भारतीय सनातन सभ्यता से जुड़े और विश्व शान्ति के प्रत्येक प्रहरी को ६ दिसम्बर अपितु 'शौर्य दिवस' की शुभकामनायें। ऐंसा दिन जब एक आतताई द्वारा राष्ट्रनायक श्री रामचंद्र जी के जन्मस्थान पर बनाये गये ढाँचे का अस्तित्व कारसेवकों द्वारा समाप्त कर दिया गया और अब उस स्थान पर पुनः विश्व शाँति के, शौर्य के प्रतीक स्थल का पुनर्निर्माण आरम्भ हो चुका है। इस शुभ दिवस पर कुछ सामयिक विषयों पर जोकि भारतीय सभ्यता से जुड़े हैं, पर अपने विचार लिखना अति आवश्यक हैं और वे विषय इस प्रकार हैं।
प्रथम विषय जिस पर लम्बे समय से लिखना चाह रहा था परन्तु उचित समय नहीं आ पाया। आज वह अवसर मुझे दिया नवाब पटौदी के पुत्र सैफ अली खान ने। अपनी आने वाली फिल्म 'आदिपुरुष' के सन्दर्भ में उन्होंने साक्षात्कार दिया है और उनका कहना है, 'We will make Ravan Humane, justify his abduction of Sita'. पहले मुझे लगा कि छोड़ो इन पर क्या टिप्पणी देनी है लेकिन पुनः सोचा कि इन फिल्मों का जनमानस पर वर्तमान में कितना प्रभाव है, उसे आज के भारतीय समाज का मूल्याँकन कर समझा जा सकता है। अतः इस पर लिखना आवश्यक हो गया। सैफ अली खान स्वयं को जिस 'कुरानिक सभ्यता' से जोड़ते हैं (उनका नाम जिस अनुसार है) उसमें एक शब्द है 'अली' जोकि इनके नाम में भी है , क्या कभी यही सैफ उस अली की कहानी पर सच्ची फिल्म बना पायेंगे? 'अली' के बच्चों का कत्ल करने वाले के बारे में और उसकी प्रेरणा किस साहित्य से आती है, उस पर कुछ कह पायेंगे यदि ये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और रचनात्मक स्वतंत्रता की बात करते हैं तो ? क्या यही सैफ यदि कल इनकी पुत्री को कोई अगवा कर लेता है उस लुटेरे/आततायी का "humane" पक्ष रखने की बात करेंगे? सुशांत सिंह राजपूत और इनकी पुत्री के संबंधों और उसकी परिणति के बारे में इन्हीं के फिल्म उद्योग से किस प्रकार की सूचनाएँ आयी उससे जनसामान्य अनभिज्ञ नहीं है। क्या यही बॉलीवुड 'इस्लाम' पर अं'डरस्टैंडिंग मुहम्मद' जैंसी पुस्तक के अनुसार कोई फिल्म 'रचनात्मक स्वंतंत्रता' के नाम पर बना सकता है? क्या यही बॉलीवुड/सैफ 'Satanic Verses' लिखने वाले सलमान रुश्दी की पुस्तक पर बैन लगने और फतवा जारी किये जाने पर कुछ कह रहा था? क्या चार्ली हेब्डो के स्टॉफ की हत्याओं के समय या अभी वर्तमान में एक शिक्षक की इन्हीं सैफ के मजहब वालों द्वारा पेरिस में हत्या करने पर इन्होंने कुछ मानवता की बात की या इनकी टिप्पणी मात्र हिन्दू समाज तक ही सीमित है?
स्मरण हो कि इसी बॉलीवुड से बहुत से छद्म हिन्दू कठुआ की घटना के समय प्लेकार्ड लेकर अपने हिन्दू होने पर दुःख प्रकट कर रहे थे पर क्या यही सैफ या इनकी 'तथाकथित हिन्दू' बेगम पेरिस में शिक्षक की हत्या किये जाने पर 'इस्लाम' को उत्तरदायी ठहरा रहे थे जबकि यह कृत्य मात्र इस्लाम के प्रोफेट के लिए कुछ कहे जाने के कारण हुआ था। इन सब प्रश्नों का उत्तर है "नहीं" क्यूंकि उस समय ये सब 'एथीस्ट' वाला चोला ओढ़ लेंगे।
यही बॉलीवुड भारतीय समाज को पितृसत्तावादी (patriarchal) बताकर उसे समाप्त करने की पहल की बात करता है (सुशांत सिँह की तथाकथित महिला मित्र की पोशाक पर लिखा कोट आपने देखा ही होगा या फिर ट्विटर के सीईओ की भारत यात्रा के समय का नैरेटिव) परन्तु मैं इनका दोहरा चरित्र इन्हीं 'सैफ अली' के उदाहरण से समझाता हूँ। कहते हैं ना कि 'Charity begins at Home'. इनके पिता का नाम था मंसूर अली खान। विवाह हुआ प्रेम के नाम पर एक हिन्दू से जोकि स्वयं इसी फिल्म उद्योग से थी और शर्मिला टैगोर हो गयीं 'आयशा बेग़म'. पुत्र हुआ 'सैफ अली खान' पुत्री 'सोहा अली खान' . प्रेम विवाह था तो शर्मिला को आयशा होने की आवश्यकता क्यूँ हुयी? क्या किसी भी बच्चे का नाम शर्मिला 'रवीन्द्र' या 'लक्ष्मी' रख पाईं यदि यह पितृसत्तात्मक परिवार नहीं था तो? भारत में क्रिकेटर और फ़िल्मी नायक/नायिकाएँ तो तथाकथित खुले विचारों वाले होते हैं ना? शर्मिला को अपनी विवाह पूर्व की पहचान भी छोड़नी पड़ी और अपने बच्चों के नाम रखने का अधिकार भी नहीं मिला और 'my rights' की बात सर्वाधिक यही 'आधुनिक' करते हैं। अब इनकी अगली पीढ़ी में चलते हैं। स्वयँ 'सैफ' पहला विवाह करते हैं 'अमृता सिंह' से। बच्चों के नाम 'इब्राहीम अली खान' और सारा अली खान। अब तो दूसरी पीढ़ी में भी किसी अन्य समुदाय से विवाह हुआ था तो एक बच्चे का नाम 'शविंदर' या 'रविंदर' ही रख लेते पितृ सत्ता के विरुद्ध (सेक्युलर मूल्यों के अनुसार)? और आगे देखेँ। 'सैफ' मियाँ अब अमृता को छोड़ देते हैं और पुनः चलते हैं आगे की खेती करने। विवाह होता है 'करीना कपूर' से और अबकी बार बच्चे का नाम 'तैमूर अली खान' . उनकी क्रांतिकारी पत्नी पुत्र का नाम 'पृथ्वीराज कपूर' या थोड़ा मातृ सत्ता थोड़ा सेक्युलर होते हुये पृथ्वीराज अली खान ही रखवा देतीं ? स्मरण हो कि इसी बॉलीवुड में नीलिमा अजीम अपने हिन्दू पति पंकज कपूर से उत्पन्न बच्चे का नाम 'शाहिद' रखवा लेती हैं वह शाहिद भी है और कपूर भी क्यूंकि पिता पंकज है।
दूसरा विषय जिस पर कुछ पंक्तियाँ लिखना आवश्यक है वह है किसान रैली में आये योगराज सिंह पर। यह भी विषय सनातन सभ्यता का अतः उत्तर आवश्यक। बिल पर बात होती तो वो उनके और सत्ता के बीच का विषय था।
उनका कथन है कि, 'ये वो कौम है जिन्होंने हज़ारों साल गुलामी की, इनकी औरतें टके-टके के भाव बिकती थीं' तो सुनों आर्थर मक्लिफ्फ़ के शिष्यो! हम तो हैं १० गुरुओं और गुरु ग्रन्थ साहब को मान ने वाले और तुम बोल रहे हो अपने गुरु मक्लिफ्फ़ की भाषा। हमारे गुरुओं ने तो शीश दे दिये सनातन के लिए और तुम्हारे वाले ने तुम्हारी मति ऐंसी पलटी कि तुम अब स्वयं से ही घृणा करने लगे हो। हम वो हैं जो हज़ारों साल के बाद भी अपना मूल नहीं भूले और आज भी युद्ध कर रहे हैं धर्म (not religion) के लिये। रही बात 'औरत' की तो तुम स्वयँ अपने अंतर्मन में झाँको और अपनी पत्नी के साथ क्या किया, स्वयं से पूछो? सारा भारत जानता है टी बी माध्यमों से तुम्हारी पत्नी ने क्या कहा तुम्हारे बारे में। सनातन सभ्यता में स्त्री को 'औरत' नहीं कहते और न ही माल ए गनीमत इसलिये नारी को वस्तु समझने वाली सोच जिस गुरु ने तुममें डाली, तुम उसी की वाणी बोलोगे। तुम्हें अंतिम सुझाव और वह ये कि शीघ्र नाम बदल लो, 'योगराज' शोभा नहीं देता तुम्हें। योग जिस सनातन परंपरा का शब्द है वह 'एकात्म' की बात करती है और 'योग' का मूल है 'प्रकृति के साथ समन्वय' परन्तु तुम्हारी बुद्धि में इस प्रकृति स्वरूपा 'नारी' के लिये जो है वह भारतीय नहीं।
आलेख पढ़ने वाले सभी लोगों से यही विनती कि तथ्यों के आधार पर ऐंसे लोगों को उत्तर अवश्य दें, मैं वही प्रयास कर रहा हूँ।
भारत माता की जय, वन्दे मातरम्, जय श्रीराम!!
विजय गौड़
दिसम्बर ०६, २०२०
Saturday, 3 October 2020
विजय की बुद्धिजीविता आलेख श्रृंखला: भारतीय राजनीति निरँतर धनानंद उत्पन्न करती रही परन्तु समाज आचार्य विष्णुगुप्त नहीं दे पाया, इसके कारण क्या हैं?
भारतवर्ष को 'तथाकथित स्वतंत्रता' मिले ७० से अधिक वर्ष हो चुके हैं परन्तु यह शताब्दियों पुरानी सभ्यता वाला राष्ट्र आज भी मानसिक रूप से स्वतंत्र हो पाया है, इस पर यदि चिंतन करें तो अत्यधिक विरोधाभास पायेंगे। स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि १९४७ में खण्डित किये जाने के बाद सत्ता हस्ताँतरण (transfer of power) के माध्यम से उत्पन्न तथाकथित 'मॉडर्न इंडिया' आज भी 'भारत' से स्वयँ को नहीं जोड़ पाया है। क्या यह 'संबिधान' के नाम पर जो एक पुस्तक जिसका मूल स्वभाव ही अब्राहमिक है (सनातन सभ्यता में यह एक 'किताब' की संकल्पना है ही नहीं, इसकी प्रवृत्ति तो निरंतर प्रवाह वाली नदी सी है कि जैंसे ही प्रवाह में व्यवधान आने से दुर्गन्ध उत्पन्न होना आरम्भ हुयी, यह अपनी नयी दिशा ले ले परन्तु मूल को सदैव जीवित रखते हुये), को जनसामान्य से सम्पूर्ण चर्चा के बाद इसका स्वरुप दिया गया या बहुत से अन्य देशों के संबिधानों को मिलाकर कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा, भानुमति ने कुनबा जोड़ा सा इसे इस राष्ट्र पर थोप दिया गया? प्रतीत तो ऐंसा ही होता है क्यूँकि जनमानस में यह डाला जाने लग गया कि आपके एक 'राष्ट्रपिता' हैं और उसके उपरान्त एक 'राष्ट्रचाचा' भी। ध्यान रहे कि सनातन समाज १००० वर्ष की परतंत्रता के बाद भले ही कुछ शक्ति अभाव में पहुँच चुका हो, उसका अनाज चाहे द्वितीय विश्व युद्ध लड़ने के लिए भेजकर 'अकाल' उत्पन्न कर दिया गया हो, परन्तु उसके बाद भी वह इस संकल्पना को स्वीकार करने में सहज नहीं हुआ क्यूंकि यह तो राष्ट्र को "माँ" मानने वाली सभ्यता थी, यँहा तो 'भारत माता की जय' का घोष चलता था। ऐंसे समुदाय को अचानक कहा जाय कि अब इस राष्ट्र में 'राष्ट्रपिता' पैदा हुये हैं तो असहजता होती ही। राष्ट्र को 'माँ' समझना भारत का साँस्कृतिक स्वभाव है जोकि पूर्ण रूप से वैज्ञानिक/तार्किक आधार पर है क्यूँकि माँ ही वो है जो तुम्हें जनती है, धारण करती है अतः जिस धरा पर आपका जन्म हुआ वह 'माँ' स्वरुप ही होगी न कि पिता स्वरुप और यही सनातनी दृष्टि है। परिणाम यह हुआ कि विदेशी 'फादरलैंड' की अब्राहमिक संकल्पना वाले नवनिर्माण को आत्मसात करना कभी भी भारतीय मानस से नहीं हो पाया। यही कारण है कि वर्तमान में भारत में चलाई जाने वाली 'Patriarchy' वाली पाश्चात्य बहस भारत में सफल नहीं हो पाती जबकि इसे भारतीय मानस और विशेषकर नयी पीढ़ी के मन में स्थापित करने के लिए अपार धन सम्पदा लगाई जाती है।
साँस्कृतिक भारत और राजनैतिक भारत के बीच जो सेतु निर्माण का कार्य करती वह संकल्पना स्थापित ही नहीं की गयी बल्कि जिस प्रकार अंग्रेज सत्ता राज चला रही थी, उसे ही आगे घसीटा जाने लगा। मात्र अब श्वेत चेहरों के स्थान पर भारतीय रँग वाले चेहरे आ गये जिन्होंने पहनावा तो भारतीय रखा परन्तु आंतरिक स्वभाव वही अंग्रेजों वाला ही रहा। पहले अंग्रेज 'साहब' पीछे वाली सीट पर बैठते तो अब भारतीय साहब। 'साहबी' कभी गयी नहीं चाहे वह राजनीतिज्ञों की हो या नौकरशाही (Bureaucracy) की। 'कलेक्टर साहब' आज भी उन्हीं अंग्रेजों वाले Bungalow में सुशोभित हैं और उनका जनता के प्रति व्यवहार क्या है, वह सर्वविदित है। न राजनेता का जनता के साथ कोई अपनापन है न ही शेष स्टेट मशीनरी का। अपनापन शेष है तो मात्र सत्ता से, पैंसे से। जिसको जँहा अवसर मिलता है वंही लूट आरंभ। शिक्षा के नाम पर उन्हीं लुटेरों का महिमामंडन जिन्होंने इस राष्ट्र की सम्पदा को लूटकर अपनी 'औद्योगिक क्रांतियाँ' बनाई और दोष मढ़ा भारत की सामजिक स्थिति पर। 'डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया' लिखी गयी जोकि पुनः पाश्चात्य संकल्पना आधारित, अब्राहमिक (चर्च) स्वभाव की।
जँहा तक मेरी व्यक्तिगत मान्यता/अध्ययन है इसका प्रमुख कारण है सनातन समाज को मिथ्या आधुनिकता के नाम दी जाने वाली शिक्षा जिसका राष्ट्र की जड़ों से कोई जुड़ाव ही नहीं। गुरुकुल (हिन्दू संस्थाओँ के लिये) के लिये 'इंडियन स्टेट' ने भिन्न नियम बनाये जिससे उन्हें चलाना अत्यंत कठिन हो गया जबकि दूसरी ओर मिशनरी द्वारा चालित संस्थानों या मदरसों को यही सत्ता/संबिधान विशेष सुबिधाएँ देती रही और यह आज भी अनवरत जारी है। 'मिशनरी' को बढ़ावा 'आधुनिकीकरण' के नाम पर जबकि 'मदरसों' को अल्पसंख्यक अधिकारों के नाम पर। इसके परिणाम ये हुए कि विश्व को नए-२ दर्शन देने वाली भारतभूमि आज सब कुछ पाश्चात्य जगत से लेने लगी और अपने मार्ग को भी उन्हीं 'आकाओं' द्वारा लिखी पुस्तकों से समझने लगी। वर्तमान में भारतीय राजनीति के लिए शब्द प्रयोग ही देख लें तो समझ पाएंगे कि भारत में भी "राइट विंग", "लेफ्टविंग","लिबरल" जैसे ही शब्द प्रचलन में हैं जबकि इनका भारत से कोई सम्बन्ध नहीं। भारत में जिसे 'लेफ्ट' कहा जाता है वह वास्तव में राइट (कट्टरपंथी) है और जो 'राइट' है वह लेफ्ट। आज यदि आप भारत में इतिहास के नाम पर जो पाठ्य पुस्तकें एन सी आर टी पढ़ा रही है उन्हें पढ़ेंगे तो समझ पाएंगे कि यह स्वयम से घृणा भाव कँहा से उत्पन्न हो रहा है। ऐंसे में जब तक समाज स्वयँ उत्तरदायित्व नहीं लेगा कि अपने मूल में जाये, उसे समझे और अपनी नयी पीढ़ी को बताये तब तक यह 'इंडियन स्टेट' ऐंसे ही भटके हुये मानस के युवा उत्पन्न करती रहेगी और उन्हें कोई भी धनानंद अपने राजनैतिक लाभ के लिये प्रयोग करता रहेगा। आचार्य विष्णुगुप्त (चाणक्य) पैदा करना तो दूर वे थे कौन इसका आभास भी यदि आज की पीढ़ी को आप करा दें तो यह एक नव आरंभ होगा। शेष तो सनातन का बीज उनके अन्दर है ही वह स्वयँ अपना मार्ग ढूंढ लेगा। आवश्यकता है तो उन्हें छद्म इतिहासकारों के लिखे इतिहास का सत्य प्रामाणिक रूप से बताने की और इसके लिये आपको स्वयं अध्ययन करना होगा। हमें बताना होगा उन्हें भारत की इतिहास परंपरा के बारे में, भारत गाथा के बारे में जिससे उनमें विश्लेषण की दृष्टि उत्पन्न हो और वे मात्र एक भीड़ न बनें, भारत तेरे टुकड़े होंगे को बोलना फैशनेबल न समझें। उनके बीच छद्म आवरण ओढ़े कितने कालनेमि, रावण, शकुनि, कंस हैं वे तब तक नहीं जान पाएंगे जब तक उन्हें यह इतिहास बताया न जाय। आप प्रयास करें अवश्य पुनः भारत कृष्ण अवतरित करेगा।
अभ्युत्थानम अधर्मस्य तदात्मानम सृजाम्यहम।
वंदे मातरम्।
विजय गौड़
Wednesday, 2 September 2020
संकल्प ४
मि त्वैमा रौंऊँ, तु मैमा रैई।
हाँ! बैंठि रै तु, हाँ सजीं रै तु, मेरा मन मा,
मेरि ह्वै जै तु ये जीवन मा।। (२)
महिला: मुखड़ा
(१) पुरुष: अंतरा
जनि सोचि, छै तनि छै तू, (२)
कबि बालि सि कबि ज्वनि छै तू।
ओ ! कबि बालि सि कबि ज्वनि छै तू।
हाँ! भिगीं रै तू, ये रँगी रै तू, मेरा रँग माँ
मेरि ह्वै जै तु ये जीवन मा।। (२)
(२) पुरुष: अंतरा
मुखि-मुख मा क्य ब्वनि छै तू ,
ओ गिची-गिचि क्य ब्वनि छै तू?
हाँ बोलि दे तू, ये खोलि दे जु, तेरा मन मा ,
मेरि ह्वै जै तु ये जीवन मा।। (२)
(३) महिला: अंतरा
मेरु बि सुपन्यु, सुपन्यु तू ई, (२)
एकि अपड़ु, अपड़ु तू ई,
ईं जिकुड़ि मा तुई, तू ई
हाँ! तेरी आस, तेरि हि सॉंस अंगि-अंग मा,
मेरु जीवन तेरा संग मा ।। (२)
विजय गौड़
सितम्बर ०२, २०२०
Saturday, 29 August 2020
विजय की बुद्धिजीविता: आलेख ६
Saturday, 1 August 2020
विजय की बुद्धिजीविता: श्रीराम शृँखला आलेख २
श्रीराम शृंखला आलेख १
Saturday, 25 July 2020
छद्म आवरण !!
कब तक इस 'कुधारा प्रभाव' में बहना होगा?
मौन रहना भी तो एक मूक स्वीकृति है।
किसी न किसी को तो ये कहना होगा।।
(१)
इस अमन की आशा के,
इस पुरुस्कारों की अभिलाषा के,
इस आक्रांताओं की भाषा के,
इस मिथ्या की परिभाषा के,
भवन को एक न एक दिन तो ढहना होगा
भय में रहना भी तो मन की विकृति है।
किसी न किसी को तो ये कहना होगा।।
(२)
इन 'झूठ' की कहानियों को,
इन 'भाईयों' की मनमानियों को,
इन 'कागजी' राजा - रानियों को,
इन स्वार्थ की निशानियों को,
कब तक समाज को सहना होगा?
प्रश्न न करना भी तो एक बुरी प्रवृत्ति है।
किसी न किसी को तो ये कहना होगा।।
(३)
उस शस्त्र-शास्त्रार्थी परंपरा को,
उस ताण्डवी शिव-शंकरा को,
उस शक्ति-शाँति की परिकल्पना को,
उस सर्व-समावेशी संकल्पना को,
पुनः भारतभूमि से बहना होगा,
मेरे राष्ट्र की तो यही सनातन प्रकृति है।
किसी न किसी को तो ये कहना होगा।।
विजय गौड़
शनिवार, २५ जुलाई, २०२०
मॉडेस्टो, कैलीफॉरनिया।
(सुशांत सिंह की मृत्यु की एकतरफा मिथ्या कहानी और उस पर देशव्यापी आक्रोश को समर्पित, उस पवित्र आत्मा को श्रद्धांजलि स्वरुप)
विजय की बुद्धिजीविता शृंखला: आलेख १
विजय की बुद्धिजीविता: आलेख २
विजय की बुद्धिजीविता: आलेख ३
मुनव्वर को जवाब!!
Wednesday, 22 July 2020
विजय की बुद्धिजीविता: आलेख ४
क्या अल्लामा इक़बाल का 'सारे जँहा से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा' "दारुल हर्ब" के लिये लिखा काव्य नहीं था?: विजय गौड़ द्वारा एक पूर्वपक्ष
Saturday, 18 July 2020
जननी!!
तब ही भारत, भारत बने।
हे मातु! होती धर्म-स्थापना,
जब तू कौशल्या-देवकी बने।।
शिव की शक्ति तू ही,
नारैण की भक्ति तू ही।
तू शारदा, तू सरस्वती,
है ब्रह्म की आसक्ति तू ही।
प्रकृति बन जब तू हो प्रकट शनैः-शनैः,
तब पुनः जीव-जीवन बने।
तुझसे उदय हो धर्म का,
तू है सँहार, अधर्म का।
है तुझे वरदान जग जन्म का
तू ज्ञान प्रथम दे कर्म का।
जब सृष्टि पर कुदृष्टि के बादल घने,
तब तू पर्वत सी अटल तने
जननी जब तू वीर जने,
तब ही भारत, भारत बने।
@ विजय गौड़
जुलै, १८, २०२०
मॉडेस्टो।