Thursday, 24 December 2020

श्री राम दर्शन!

हमें श्रीराम का दर्शन
कहो, किस विधि से हो जाये।
भला कैंसे दयानिधि में,
प्रभो हम सब समों जाँए।।

हमें भगवान् का दर्शन, कहो किस विधि से हो जाये।।

दया मुझ पर करो हनुमन! 
हे सीतराम के प्यारे,
कहो कैंसे मेरा जीवन भी,
प्रभु जपते हि कट जाये। 

हमें श्रीराम का दर्शन, कहो किस विधि से हो जाये।।

प्रभु जी अब तुम्हारे बिन,
नहीं लगता ये मन मेरा।
श्री चरणों में शरण भगवन,
कहो किस विधि से मिल जाए। 

भला कैसे दयानिधि में, प्रभो हम में समों जांये।।

माँ जानकी कृपा कर दो,
ह्रदय को प्रेम से भर दो। 
मिलन प्रभु से हमारा हो,
तुम्हीं ऐंसा जतन कर दो।।

हमें भगवान् का दर्शन, कहो किस विधि से हो जाये।।

कई पतितों को हे प्रभु जी,
किया है आपने पावन। 
हुआ हो पाप जो मुझसे,
उसे हरना हे मनभावन। 

हमें श्रीराम का दर्शन, कहो किस विधि से हो जाये।।

रचना: विजय गौड़ 
प्रेरणा: श्री पारेख जी द्वारा दी गयी गुजराती समाज के भजन से 


 

Saturday, 5 December 2020

विजय की बुद्धिजीविता शृंखला: शौर्य दिवस पर विशेष

सर्वप्रथम तो भारतीय सनातन सभ्यता से जुड़े और विश्व शान्ति के प्रत्येक प्रहरी को ६ दिसम्बर अपितु 'शौर्य दिवस' की शुभकामनायें। ऐंसा दिन जब एक आतताई द्वारा राष्ट्रनायक श्री रामचंद्र जी के जन्मस्थान पर बनाये गये ढाँचे का अस्तित्व कारसेवकों द्वारा समाप्त कर दिया गया और अब उस स्थान पर पुनः विश्व शाँति के, शौर्य के प्रतीक स्थल का पुनर्निर्माण आरम्भ हो चुका है। इस शुभ दिवस पर कुछ सामयिक विषयों पर जोकि भारतीय सभ्यता से जुड़े हैं, पर अपने विचार लिखना अति आवश्यक हैं और वे विषय इस प्रकार हैं। 

प्रथम विषय जिस पर लम्बे समय से लिखना चाह रहा था परन्तु उचित समय नहीं आ पाया। आज वह अवसर मुझे दिया नवाब पटौदी के पुत्र सैफ अली खान ने। अपनी आने वाली फिल्म 'आदिपुरुष' के सन्दर्भ में उन्होंने साक्षात्कार दिया है और उनका कहना है, 'We will make Ravan Humane, justify his abduction of Sita'. पहले मुझे लगा कि छोड़ो इन पर क्या टिप्पणी देनी है लेकिन पुनः सोचा कि इन फिल्मों का जनमानस पर वर्तमान में कितना प्रभाव  है, उसे आज के भारतीय समाज का मूल्याँकन कर समझा जा सकता है। अतः इस पर लिखना आवश्यक हो गया। सैफ अली खान स्वयं को जिस 'कुरानिक सभ्यता' से जोड़ते हैं (उनका नाम जिस अनुसार है) उसमें एक शब्द है 'अली' जोकि इनके नाम में भी है , क्या कभी यही सैफ उस अली की कहानी पर सच्ची फिल्म बना पायेंगे? 'अली' के बच्चों का कत्ल करने वाले के बारे में और उसकी प्रेरणा किस साहित्य से आती है, उस पर कुछ कह पायेंगे यदि ये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और रचनात्मक स्वतंत्रता की बात करते हैं तो ? क्या यही सैफ यदि कल इनकी पुत्री को कोई अगवा कर लेता है उस लुटेरे/आततायी का "humane" पक्ष रखने की बात करेंगे? सुशांत सिंह राजपूत और इनकी पुत्री के संबंधों और उसकी परिणति के बारे में इन्हीं के फिल्म उद्योग से किस प्रकार की सूचनाएँ आयी उससे जनसामान्य अनभिज्ञ नहीं है। क्या यही बॉलीवुड 'इस्लाम' पर अं'डरस्टैंडिंग मुहम्मद' जैंसी पुस्तक के अनुसार कोई फिल्म 'रचनात्मक स्वंतंत्रता' के नाम पर बना सकता है? क्या यही बॉलीवुड/सैफ 'Satanic Verses' लिखने वाले सलमान रुश्दी की पुस्तक पर बैन लगने और फतवा जारी किये जाने पर कुछ कह रहा था? क्या चार्ली हेब्डो के स्टॉफ की हत्याओं के समय या अभी वर्तमान में एक शिक्षक की इन्हीं सैफ के मजहब वालों द्वारा पेरिस में हत्या करने पर इन्होंने कुछ मानवता की बात की या इनकी टिप्पणी मात्र हिन्दू समाज तक ही सीमित है? 

स्मरण हो कि इसी बॉलीवुड से बहुत से छद्म हिन्दू कठुआ की घटना के समय प्लेकार्ड लेकर अपने हिन्दू होने पर दुःख प्रकट कर रहे थे पर क्या यही सैफ या इनकी 'तथाकथित हिन्दू' बेगम पेरिस में शिक्षक की हत्या किये जाने पर 'इस्लाम' को उत्तरदायी ठहरा रहे थे जबकि यह कृत्य मात्र इस्लाम के प्रोफेट के लिए कुछ कहे जाने के कारण हुआ था। इन सब प्रश्नों का उत्तर है "नहीं" क्यूंकि उस समय ये सब 'एथीस्ट' वाला चोला ओढ़ लेंगे। 

यही बॉलीवुड भारतीय समाज को  पितृसत्तावादी (patriarchal) बताकर उसे समाप्त करने की पहल की बात करता है (सुशांत सिँह की तथाकथित महिला मित्र की पोशाक पर लिखा कोट आपने देखा ही होगा या फिर ट्विटर के सीईओ की भारत यात्रा के समय का नैरेटिव) परन्तु मैं इनका दोहरा चरित्र इन्हीं 'सैफ अली' के उदाहरण से समझाता हूँ। कहते हैं ना कि 'Charity begins at Home'. इनके पिता का नाम था मंसूर अली खान। विवाह हुआ प्रेम के नाम पर एक हिन्दू से जोकि स्वयं इसी फिल्म उद्योग से थी और शर्मिला टैगोर हो गयीं 'आयशा बेग़म'. पुत्र हुआ 'सैफ अली खान' पुत्री 'सोहा अली खान' . प्रेम विवाह था तो शर्मिला को आयशा होने की आवश्यकता क्यूँ हुयी? क्या किसी भी बच्चे का नाम शर्मिला 'रवीन्द्र' या 'लक्ष्मी' रख पाईं यदि यह पितृसत्तात्मक परिवार नहीं था तो? भारत में क्रिकेटर और फ़िल्मी नायक/नायिकाएँ तो तथाकथित खुले विचारों वाले होते हैं ना? शर्मिला को अपनी विवाह पूर्व की पहचान भी छोड़नी पड़ी और अपने बच्चों के नाम रखने का अधिकार भी नहीं मिला और 'my rights' की बात सर्वाधिक यही 'आधुनिक' करते हैं। अब इनकी अगली पीढ़ी में चलते हैं। स्वयँ 'सैफ' पहला विवाह करते हैं 'अमृता सिंह' से। बच्चों के नाम 'इब्राहीम अली खान' और सारा अली खान। अब तो दूसरी पीढ़ी में भी किसी अन्य समुदाय से विवाह हुआ था तो एक बच्चे का नाम 'शविंदर' या 'रविंदर' ही रख लेते पितृ सत्ता के विरुद्ध (सेक्युलर मूल्यों के अनुसार)? और आगे देखेँ। 'सैफ' मियाँ अब अमृता को छोड़ देते हैं और पुनः चलते हैं आगे की खेती करने। विवाह होता है 'करीना कपूर' से और अबकी बार बच्चे का नाम 'तैमूर अली खान' . उनकी क्रांतिकारी पत्नी पुत्र का नाम 'पृथ्वीराज कपूर' या थोड़ा मातृ सत्ता थोड़ा सेक्युलर होते हुये पृथ्वीराज अली खान ही रखवा देतीं ? स्मरण हो कि इसी बॉलीवुड में नीलिमा अजीम अपने हिन्दू पति पंकज कपूर से उत्पन्न बच्चे का नाम 'शाहिद' रखवा लेती हैं वह शाहिद भी है और कपूर भी क्यूंकि पिता पंकज है। 

दूसरा विषय जिस पर कुछ पंक्तियाँ लिखना आवश्यक है वह है किसान रैली में आये योगराज सिंह पर। यह भी विषय सनातन सभ्यता का अतः उत्तर आवश्यक। बिल पर बात होती तो वो उनके और सत्ता के बीच का विषय था। 

उनका कथन है कि, 'ये वो कौम है जिन्होंने हज़ारों साल गुलामी की, इनकी औरतें टके-टके के भाव बिकती थीं' तो सुनों आर्थर मक्लिफ्फ़ के शिष्यो! हम तो हैं १० गुरुओं और गुरु ग्रन्थ साहब को मान ने वाले और तुम बोल रहे हो अपने गुरु मक्लिफ्फ़ की भाषा। हमारे गुरुओं ने तो शीश दे दिये सनातन के लिए और तुम्हारे वाले ने तुम्हारी मति ऐंसी पलटी कि तुम अब स्वयं से ही घृणा करने लगे हो। हम वो हैं जो हज़ारों साल के बाद भी अपना मूल नहीं भूले और आज भी युद्ध कर रहे हैं धर्म (not religion) के लिये। रही बात 'औरत' की तो तुम स्वयँ अपने अंतर्मन में झाँको और अपनी पत्नी के साथ क्या किया, स्वयं से पूछो? सारा भारत जानता है टी बी माध्यमों से तुम्हारी पत्नी ने क्या कहा तुम्हारे बारे में। सनातन सभ्यता में स्त्री को 'औरत' नहीं कहते और न ही माल ए गनीमत इसलिये नारी को वस्तु समझने वाली सोच जिस गुरु ने तुममें डाली, तुम उसी की वाणी बोलोगे। तुम्हें अंतिम सुझाव और वह ये कि शीघ्र नाम बदल लो, 'योगराज' शोभा नहीं देता तुम्हें। योग जिस सनातन परंपरा का शब्द है वह 'एकात्म' की बात करती है और 'योग' का मूल है 'प्रकृति के साथ समन्वय' परन्तु तुम्हारी बुद्धि में इस प्रकृति स्वरूपा 'नारी' के लिये जो है वह भारतीय नहीं। 

आलेख पढ़ने वाले सभी लोगों से यही विनती कि तथ्यों के आधार पर ऐंसे लोगों को उत्तर अवश्य दें, मैं वही प्रयास कर रहा हूँ। 

भारत माता की जय, वन्दे मातरम्, जय श्रीराम!!

विजय गौड़ 

दिसम्बर ०६, २०२० 



Saturday, 3 October 2020

विजय की बुद्धिजीविता आलेख श्रृंखला: भारतीय राजनीति निरँतर धनानंद उत्पन्न करती रही परन्तु समाज आचार्य विष्णुगुप्त नहीं दे पाया, इसके कारण क्या हैं?

भारतवर्ष को 'तथाकथित स्वतंत्रता' मिले ७० से अधिक वर्ष हो चुके हैं परन्तु यह शताब्दियों पुरानी सभ्यता वाला राष्ट्र आज भी मानसिक रूप से स्वतंत्र हो पाया है, इस पर यदि चिंतन करें तो अत्यधिक विरोधाभास पायेंगे। स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि १९४७ में खण्डित किये जाने के बाद सत्ता हस्ताँतरण (transfer of power) के माध्यम से उत्पन्न  तथाकथित 'मॉडर्न इंडिया' आज भी 'भारत' से स्वयँ को नहीं जोड़ पाया है। क्या यह 'संबिधान' के नाम पर जो एक पुस्तक जिसका मूल स्वभाव ही अब्राहमिक है (सनातन सभ्यता में यह एक 'किताब' की संकल्पना है ही नहीं, इसकी प्रवृत्ति तो निरंतर प्रवाह वाली नदी सी है कि जैंसे ही प्रवाह में व्यवधान आने से दुर्गन्ध उत्पन्न होना आरम्भ हुयी, यह अपनी नयी दिशा ले ले परन्तु मूल को सदैव जीवित रखते हुये), को जनसामान्य से सम्पूर्ण चर्चा के बाद इसका स्वरुप दिया गया या बहुत से अन्य देशों के संबिधानों को मिलाकर कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा, भानुमति ने कुनबा जोड़ा सा इसे इस राष्ट्र पर थोप दिया गया? प्रतीत तो ऐंसा ही होता है क्यूँकि जनमानस में यह डाला जाने लग गया कि आपके एक 'राष्ट्रपिता' हैं और उसके उपरान्त एक 'राष्ट्रचाचा' भी। ध्यान रहे कि सनातन समाज १००० वर्ष की परतंत्रता के बाद भले ही कुछ शक्ति अभाव में पहुँच चुका हो, उसका अनाज चाहे द्वितीय विश्व युद्ध लड़ने के लिए भेजकर 'अकाल' उत्पन्न कर दिया गया हो, परन्तु उसके बाद भी वह इस संकल्पना को स्वीकार करने में सहज नहीं हुआ क्यूंकि यह तो राष्ट्र को "माँ" मानने वाली सभ्यता थी, यँहा तो 'भारत माता की जय' का घोष चलता था। ऐंसे समुदाय को अचानक कहा जाय कि अब इस राष्ट्र में 'राष्ट्रपिता' पैदा हुये हैं तो असहजता होती ही। राष्ट्र को 'माँ' समझना भारत का साँस्कृतिक स्वभाव है जोकि पूर्ण रूप से वैज्ञानिक/तार्किक आधार पर है क्यूँकि माँ ही वो है जो तुम्हें जनती है, धारण करती है अतः जिस धरा पर आपका जन्म हुआ वह 'माँ' स्वरुप ही होगी न कि पिता स्वरुप और यही सनातनी दृष्टि है। परिणाम यह हुआ कि विदेशी 'फादरलैंड' की अब्राहमिक संकल्पना वाले नवनिर्माण को आत्मसात करना कभी भी भारतीय मानस से  नहीं हो पाया। यही कारण है कि वर्तमान में भारत में चलाई जाने वाली  'Patriarchy' वाली पाश्चात्य बहस भारत में सफल नहीं हो पाती जबकि इसे भारतीय मानस और विशेषकर नयी पीढ़ी के मन में स्थापित करने के लिए अपार धन सम्पदा लगाई जाती है। 

साँस्कृतिक भारत और राजनैतिक भारत के बीच जो सेतु निर्माण का कार्य करती वह संकल्पना स्थापित ही नहीं की गयी बल्कि जिस प्रकार अंग्रेज सत्ता राज चला रही थी, उसे ही आगे घसीटा जाने लगा। मात्र अब श्वेत चेहरों के स्थान पर भारतीय रँग वाले चेहरे आ गये जिन्होंने पहनावा तो भारतीय रखा परन्तु आंतरिक स्वभाव वही अंग्रेजों वाला ही रहा। पहले अंग्रेज 'साहब' पीछे वाली सीट पर बैठते तो अब भारतीय साहब। 'साहबी' कभी गयी नहीं चाहे वह राजनीतिज्ञों की हो या नौकरशाही (Bureaucracy) की। 'कलेक्टर साहब' आज भी उन्हीं अंग्रेजों वाले Bungalow में सुशोभित हैं और उनका जनता के प्रति व्यवहार क्या है, वह सर्वविदित है। न राजनेता का जनता के साथ कोई अपनापन है न ही शेष स्टेट मशीनरी का। अपनापन शेष है तो मात्र सत्ता से, पैंसे से। जिसको जँहा अवसर मिलता है वंही लूट आरंभ। शिक्षा के नाम पर उन्हीं लुटेरों का महिमामंडन जिन्होंने इस राष्ट्र की सम्पदा को लूटकर अपनी 'औद्योगिक क्रांतियाँ' बनाई और दोष मढ़ा भारत की सामजिक स्थिति पर। 'डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया' लिखी गयी जोकि पुनः पाश्चात्य संकल्पना आधारित, अब्राहमिक (चर्च) स्वभाव की। 

जँहा तक मेरी व्यक्तिगत मान्यता/अध्ययन है इसका प्रमुख कारण है सनातन समाज को मिथ्या आधुनिकता के नाम दी जाने वाली शिक्षा जिसका राष्ट्र की जड़ों से कोई जुड़ाव ही नहीं। गुरुकुल (हिन्दू संस्थाओँ के लिये) के लिये 'इंडियन स्टेट' ने भिन्न नियम बनाये जिससे उन्हें चलाना अत्यंत कठिन हो गया जबकि दूसरी ओर मिशनरी द्वारा चालित संस्थानों या मदरसों को यही सत्ता/संबिधान विशेष सुबिधाएँ देती रही और यह आज भी अनवरत जारी है। 'मिशनरी' को बढ़ावा 'आधुनिकीकरण' के नाम पर जबकि 'मदरसों' को अल्पसंख्यक अधिकारों के नाम पर। इसके परिणाम ये हुए कि विश्व को नए-२ दर्शन देने वाली भारतभूमि आज सब कुछ पाश्चात्य जगत से लेने लगी और अपने मार्ग को भी उन्हीं 'आकाओं' द्वारा लिखी पुस्तकों से समझने लगी। वर्तमान में भारतीय राजनीति के लिए शब्द प्रयोग ही देख लें तो समझ पाएंगे कि भारत में भी "राइट विंग", "लेफ्टविंग","लिबरल" जैसे ही शब्द प्रचलन में हैं जबकि इनका भारत से कोई सम्बन्ध नहीं। भारत में जिसे 'लेफ्ट' कहा जाता है वह वास्तव में राइट (कट्टरपंथी) है और जो 'राइट' है वह लेफ्ट। आज यदि आप भारत में इतिहास के नाम पर जो पाठ्य पुस्तकें एन सी आर टी पढ़ा रही है उन्हें पढ़ेंगे तो समझ पाएंगे कि यह स्वयम से घृणा भाव कँहा से उत्पन्न हो रहा है। ऐंसे में जब तक समाज स्वयँ उत्तरदायित्व नहीं लेगा कि अपने मूल में जाये, उसे समझे और अपनी नयी पीढ़ी को बताये तब तक यह 'इंडियन स्टेट' ऐंसे ही भटके हुये मानस के युवा उत्पन्न करती रहेगी और उन्हें कोई भी धनानंद अपने राजनैतिक लाभ के लिये प्रयोग करता रहेगा। आचार्य विष्णुगुप्त (चाणक्य) पैदा करना तो दूर वे थे कौन इसका आभास भी यदि आज की पीढ़ी को आप करा दें तो यह एक नव आरंभ होगा। शेष तो सनातन का बीज उनके अन्दर है ही वह स्वयँ अपना मार्ग ढूंढ लेगा। आवश्यकता है तो उन्हें छद्म इतिहासकारों के लिखे इतिहास का सत्य प्रामाणिक रूप से बताने की और इसके लिये आपको स्वयं अध्ययन करना होगा। हमें बताना होगा उन्हें भारत की इतिहास परंपरा के बारे में, भारत गाथा के बारे में जिससे उनमें विश्लेषण की दृष्टि उत्पन्न हो और वे मात्र एक भीड़ न बनें, भारत तेरे टुकड़े होंगे को बोलना फैशनेबल न समझें। उनके बीच छद्म आवरण ओढ़े कितने कालनेमि, रावण, शकुनि, कंस हैं वे तब तक नहीं जान पाएंगे जब तक उन्हें यह इतिहास बताया न जाय। आप प्रयास करें अवश्य पुनः भारत कृष्ण अवतरित करेगा। 

यदा-२ हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत,
अभ्युत्थानम अधर्मस्य तदात्मानम सृजाम्यहम। 
परित्राणाय साधूनाम, विनाशाय च दुष्कृताम,
धर्म सँस्थापनार्थाय संभवामि युगे-युगे।।

वंदे मातरम्। 

विजय गौड़ 

 

Wednesday, 2 September 2020

संकल्प ४

पुरुष: मुखड़ा 

मि त्वैमा छौंऊँ, तु मैमु छैई, (२)
मि त्वैमा रौंऊँ, तु मैमा रैई। 
हाँ! बैंठि रै तु, हाँ सजीं रै तु, मेरा मन मा,
मेरि ह्वै जै तु ये जीवन मा।। (२)

महिला: मुखड़ा
 
मि तेरि छौंऊँ, तु मेरो छैई, (२)
मि तेरि लगौंऊँ, तु मेरि लगैई। 
हाँ! रलि जै तु, ओ ढलि जै तु, मेरा ढँग मा,
मेरु जीवन तेरा संग मा ।। (२)

  (१) पुरुष: अंतरा 

जनि सोचि, छै तनि छै तू, (२)
कबि बालि सि कबि ज्वनि छै तू। 
ओ ! कबि बालि सि कबि ज्वनि छै तू। 
हाँ! भिगीं रै तू, ये रँगी रै तू, मेरा रँग माँ 
मेरि ह्वै जै तु ये जीवन मा।। (२)

    (२)  पुरुष: अंतरा 

हाँ! चुप रैकि, क्य कनि छै तू? (२)
मुखि-मुख मा क्य ब्वनि छै तू , 
ओ गिची-गिचि क्य ब्वनि छै तू? 
हाँ बोलि दे तू, ये खोलि दे जु, तेरा मन मा ,
मेरि ह्वै जै तु ये जीवन मा।। 
(२)

    (३) महिला: अंतरा 

मेरु बि सुपन्यु, सुपन्यु तू ई, (२)
एकि अपड़ु, अपड़ु तू ई,
ईं जिकुड़ि मा तुई, तू ई
हाँ! तेरी आस, तेरि हि सॉंस अंगि-अंग मा,
मेरु जीवन तेरा संग मा ।। (२)


विजय गौड़ 
सितम्बर ०२, २०२० 

 

Saturday, 29 August 2020

विजय की बुद्धिजीविता: आलेख ६

भारतीय दृष्टि, भाषा एवम दर्शन के ज्ञान के अभाव में उत्तराखण्ड की नयी पीढ़ी श्री नरेंद्र सिंह नेगी का काव्य आत्मसात करना तो दूर, क्या उसे समझ भी पायेगी? एक विश्लेषण 

मेरा जन्म हुआ भारत के उत्तर में स्तिथ उस राज्य में जँहा से भारतीय सनातन सभ्यता की जननियों में से प्रमुख 'माँ गँगा' का उद्गम होता है, दसवीँ कक्षा तक की शिक्षा वहीँ हुयी और उसके बाद जैंसा कि ग्रामीण भारत के प्रत्येक बच्चे का भविष्य होता है, मैं भी घर छोड़ कर निकल पड़ा आने वाले समय के दायित्वों के निर्वहन के लिये आवश्यक शिक्षण हेतु। जन्म से १५ वर्ष की आयु तक मेरे अंदर माता-पिता, परिवार, समाज और एक अन्य महत्वपूर्ण व्यक्ति जिसे उत्तराखंड में 'लोककवि' की स्नेहपूर्ण उपाधि मिली हुई है, नाम श्री नरेंद्र सिंह नेगी, द्वारा नैतिकता के बीज बोये जा चुके थे। श्री नेगी, वह विभूति जो भारतीय परंपरा, पहाड़ की परंपरा को जीती है, लिखती है। मेरे समय के प्रत्येक बच्चे के लिए 'नेगी जी' के गीत ऐंसे होते थे जैसे कि हमारे लिये ही लिखे गये हों। ऐंसे गीत, ऐंसा काव्य जिसका एक-२ शब्द भारतीय होता था, पहाड़ी होता था और काव्य के एक-२ शब्द में पहाड़ की, भारतीय सभ्यता की एक कहानी होती थी। गीत सुनकर यही लगता कि हम ही इसके मुख्य पात्र हैं। 

आज जब मैं शारीरिक रूप से अपने देश में न होकर उस देश 'अमेरिका' में हूँ जिसकी तथाकथित 'आधुनिक' सभ्यता को आज मेरे देश के युवा ने अपना लिया है (या ये कहें कि हमने एक भेड़चाल का अंग बनते हुये उन्हें इसमें डाल दिया है) तो सोचता हूँ कि क्या मेरी नई पीढ़ी 'नेगी जी' को समझ पायेगी। उन सन्दर्भों को समझ पायेगी जिनको 'नेगी काव्य' ने शब्द देकर सँकलित किया है? विचार आता है कि मैं हूँ तो उन्हें बताने के लिये और यह कुछ स्तर तक सत्य भी है परन्तु उसी समय भाषा के, विचार के, दर्शन के, दृष्टि के ज्ञान के अभाव को एक बहुत बड़ी बाधा के रूप में पाता हूँ। यह स्तिथि मात्र उन भारतीयों की नहीं है जो भारत से बाहर हैं अपितु उनकी भी है जो भारत के आज के समाज में भी पल-बढ़ रहे हैं। आज का बच्चा भारतीय सभ्यता के, विचार के श्रेष्ठ उदाहरणों के नामों तक का तो सही से उच्चारण नहीं कर पाता। 'राम' रामा हो चुके हैं। कृष्ण, कृष्ना हो चुके हैं। गणेश, गनेशा बन चुके हैं। शेष नामों को तो भूल ही जाँय कि वे बोल भी पाएँगे। 'दधीचि', शत्रुघ्न, वशिष्ठ जैंसे नामों के सही उच्चारण की कामना तो बहुत ही दूर की बात हो चुकी है। 'ण' अब 'न' हो चुका है. 'ड़' या तो ड हो चुका है या 'र'। इसकी वानगी इसी में देखें कि मेरा बेटा अपने पारिवारिक नाम 'गौड़' के स्थान पर 'गौर' उच्चारित करता है और वह समय दूर नहीं जब 'गौड़', गौर ही बन जायेगा। अब इन बच्चों से क्या आप यह अपेक्षा कर सकते हैं कि वे 'नेगी जी' ने जो लिखा है, उसे समझ पायेंगे? उस लेखन को समझ पाएँगे जोकि बहुआयामी है? तर्क/दर्शन को मात्र 'true-false' में समझने वाला मानस भारतीय दर्शन की चतुष्कोटि को समझ पायेगा। क्या वह उस भारतीय परंपरा की वैतरणी की निरंतरता को बनाकर रख पायेगा जिसे 'नेगी जी' अपने साहित्य में बना पाये हैं। उदाहरणार्थ, सदियों पूर्व रंचे हितोपदेश 'उद्यमेन हि सिद्धन्ति, कार्याणि न मनोरथै:' को नेगी जी 'मन का मन्युला बैठ-बैठी नि पुर्योंदा' लिखकर पुनः भारतीय मानस में डालते हैं। 

कुछ ही वर्ष पूर्व मैंने अपने जीवन के २-३ माह वेस्टइंडीज (Caribbean) के एक देश गयाना में एक व्यावसायिक कार्य के हेतु बिताये। ज्ञात हो कि यह देश एक समय में अंग्रेजों के अधीन था और वे भारत से बहुत से परिवारों को वँहा श्रमिक के रूप में ले गये और आज गयाना की बड़ी जनसँख्या हिन्दू है। मैंने बहुत पास से वँहा के बच्चों को देखा है जो हिंदी के नाम पर मात्र 'बॉलीवुड' के गानों को सुनते हैं, बहुत से गीतों को उन्होंने कुछ अलग ही रूप दे दिया है। स्तिथि यह है कि गीत के बोल यध्यपि दुःख के हैं परंतु उन्होंने उसके संगीत को 'डांस नंबर' में बदल दिया है और वे हर्ष के साथ उस पर नृत्य करते हैं जबकि वास्तविक गीत दुःख से, करुणा से भरा हुआ है। क्या यह भारत का भविष्य है? 'गढ़वाली' भाषा ज्ञान की स्तिथि देखें तो वह यँहा पहुँच भी चुकी है। क्या हमारी आने वाली पीढ़ियों  कि स्तिथि वैंसी ही होगी जो हमारी स्तिथि आज 'सँस्कृत' भाषा के ज्ञान को लेकर हो गयी है? क्या समाज में ऐंसी ही 'छवि' (perception) शेष भारतीय भाषाओँ की भी बन जायेगी, जो आज 'सँस्कृत' की है? (विश्व की सर्वाधिक वैज्ञानिक भाषा 'सँस्कृत' आज के भारतीय समाज में मात्र पूजा-पाठ की भाषा के रूप में जानी जाती है)।

इतनी समृद्ध भाषाओं का, सभ्यता का यदि ऐंसा अंत होता है तो यह मानव सभ्यता का अपने अंत की ओर जाना होगा। भारतीय ऋषियों ने अपने स्थूल शरीर को एक प्रयोगशाला बनाकर अध्यात्म के जिन आयामों को समझा, उससे उनकी ही आज की पीढ़ी सर्वाधिक अनभिज्ञ है। स्तिथि यह है कि वे ऋषि भी आज 'माइथोलॉजी' का भाग बन गए हैं। अतः आज समाज का यह मुख्य दायित्व है कि वह अपनी नयी पीढ़ी को भारतीय भाषाएँ, दर्शन, दृष्टि सिखाएँ तभी नया समाज सच्चे अर्थों में 'आधुनिक' हो पायेगा न कि छद्म बॉलिवुडी आधुनिक। ऐंसा समाज जो 'सत्यमेव जयते' मात्र अर्थ की कामना (पैंसे बनाने के लिये या PR Exercise के लिए) के लिये न कहे अपितु उसका मूल आत्मसात कर अपनी दिनचर्या में पालन करे अन्यथा समाज 'बादशाह' 'हनी सिंह' तो प्रतिदिन पैदा करेगा परन्तु 'नरेंद्र सिंह नेगी' नहीं। 

 नेगी जी की एक रचना:

अषाड़ कुयेड़ी लौंकण से पैलि,
सौंण बरखा पाणी बरखंण से पैलि,
भादो का भदोड़ा बाण से पैलि,
ऐ जई  ........   
फेर दिन नि छन,
बामण बुनु च फेर दिन नि छन,
देख्यालि पतड़ु, फेर दिन नि छन।।

यह मात्र आरंभ है इस रचना का जोकि नेगी जी की टी-सीरीज से निकली कैसेट 'तुम्हरि माया मा' (तुम्हारे प्रेम में) से ली है मैंने। यदि आप भारतीय लेखन विधा को समझते हैं तो पायेंगे कि यह मात्र गीत की कुछ पँक्तियाँ नहीं हैं अपितु इससे आप ऋतु ज्ञान, जीवन शैली, भारतीय परिवार व्यवस्था में पति-पत्नी की एक दूसरे के लिये पूरकता, समाज व्यवस्था आदि अनेकों बातें समझ सकते हैं। इसी गीत को यदि आप पाश्चात्य व्यवस्था से देखेंगे तो अर्थ का अनर्थ कर बैठेंगे। रचना पहाड़ के किसी गाँव में जीवन व्यतीत करने वाले एक युगल के जीवन पर लिखी गयी है। भारतीय साहित्य को बिना देश, काल, परिस्तिथि के सापेक्ष रखे नहीं समझा जा सकता, यह भारतीय दृष्टि का मूल है। पत्नी अपने पैतृक गाँव गई हुई हैं और इस समय पति अकेले हैं। पति अपनी पत्नी के घर लौटने की प्रतीक्षा में हैं और पत्नी आ नहीं रही हैं। गीत लिखा गया है जब ग्रीष्म ऋतु  अपने अंत की ओर है, उस समय में। पति कहते हैं  : -

गढ़वाली: अषाड़ कुयेड़ी लौंकण से पैलि, 
हिंदी: आषाढ़ (वर्षा ऋतु में पहाड़ों में कुहरा फैल जाता है) माह के कुहरे के लगने से पहले,
गढ़वाली: सौंण बरखा पाणी बरखंण से पैलि,
हिंदी: सावन की वर्षा का पानी बरसने से पहले,
गढ़वाली: भादो का भदोड़ा बाण से पैलि
हिंदी: भादों माह में बोई जाने वाली फसल के लिये लगने वाले हल से पहले,
गढ़वाली: ऐ जई  ....... 
हिंदी: आ जाओ 
गढ़वाली: फेर दिन नि छन
हिंदी: उसके उपरान्त कोई अच्छे दिन (शुभ मुहूर्त) नहीं हैं।
गढ़वाली: बामण बुनु च फेर दिन नि छन,
हिंदी: ब्राह्मण का कहना है कि उसके उपरान्त दिन, मुहूर्त नहीं हैं। 
गढ़वाली: देख्यालि पतड़ु, फेर दिन नि छन। 
हिंदी: उन्होंने अपनी पत्रावली (पुस्तक जो भारतीय ज्ञान परंपरा में ग्रहों की स्तिथि, जलवायु, दिशा आदि के विस्तृत अध्ययन के उपरांत बनाई जाती थी) देख ली है और उनका सुझाव है कि उसके उपरान्त शुभ मुहूर्त नहीं है। 

इसमें आप भारतीय सभ्यता के गीत के माध्यम से किये जाने वाले अप्रतिम कहानी लेखन (Story telling) को स्पष्ट देख सकते हैं। यह रचना पहाड़ की जीवन शैली से भी आपका परिचय करवाती है। आषाढ़, सावन, भादों वर्षा ऋतु के माह हैं यह भी बताती है। भारतीय साहित्य की व्याख्या करने के लिए भारतीय दृष्टि के मापदंडों (देश, काल, परिस्तिथि) के बिना आप कभी भी कवि के मानस तक नहीं पहुँच पाएंगे। इसी अज्ञान का फल हम एक अज्ञानी समझ के रूप में देवदत्त पटनायक, शेल्डन पोलॉक, वेंडी डोनिगर जैसे तथाकथित 'इंडोलॉजिस्ट' की भारतीय ग्रंथों (रामायण, महाभारत) की व्याख्या में पाते हैं। मूल भाषा का ज्ञान न होने के कारण, भारतीय दृष्टि की अज्ञानता के कारण हमारा युवा इन महानुभाओं द्वारा अंग्रेजी में लिखी पुस्तकों को सत्य समझ बैठता है और इसकी परिणति हींन भावना (Inferiority Complex) , अपनी पहचान को हेय दृष्टि से देखना (Identity Crisis), अपनी भाषाओँ को सीखने हेतु इच्छाशक्ति का अभाव (lack of determination to learn Indian languages) के रूप में होती है। नेगी जी द्वारा रचित इन्हीं कुछ पँक्तियों को आने वाले सैकड़ों वर्षों उपरान्त उस समय की पीढ़ी एक ऐतिहासिक तथ्य के रूप में भी प्रयोग कर सकती है कि कौन से महीनों में उस समय भारत में वर्षा ऋतु होती थी। समय के साथ ऋतु चक्र में प्रभाव स्पष्ट देखे जा सकते हैं। ज्ञात रहे कि महाभारत काल में नक्षत्रोँ की जो स्तिथि थी जिसे श्लोकों में वेद व्यास द्वारा लिखा गया है वह आज महाभारत के काल निर्धारण में सहायता कर रही है। नीलेश ओक और बहुत से अन्य महाभारतविद इसे आज प्रयोग में ला रहे हैं। यही भारतीय लेखन परंपरा की निरंतरता है जो भारत को सदैव प्रवाहित होने वाली सभ्यता की जननी बनाती है। 

आभार। 
कॉपी राइट @ विजय गौड़ 
कैलीफॉरनिआ, अमेरिका 

Saturday, 1 August 2020

विजय की बुद्धिजीविता: श्रीराम शृँखला आलेख २

श्रीराम की दृष्टि ही भारतीय दृष्टि है ! वर्तमान भारत को श्रीराम से उनकी दृष्टि सीखनी चाहिये 


भारत जिसे तथाकथित आधुनिक 'इंडिया' कहते है, आज एक मानसिक स्तर पर देखा जाय तो विभाजित समाज है। यह विभाजन आप कई प्रकार से देख सकते हैं। प्रमुख रूप से क्षेत्र के आधार पर, भाषा के आधार पर, वर्ग के आधार पर, कास्ट (मैं यँहा जाति शब्द का प्रयोग नहीं कर रहा हूँ) के आधार पर, आर्य-द्रविड़ के आधार पर, अँग्रेजी और भारतीय सोच के आधार पर, लेफ्ट और राइट (पाश्चात्य विचार) के आधार पर और भी पता नहीं क्या-२। इसका मुख्य कारण यदि आप जानने का प्रयास करें तो पायेंगे कि इसके मूल में भारत से भारतीय दृष्टि का समाप्त होना है। पिछले ७०-७२ वर्ष में भारत को 'मॉडर्न इंडिया' करने के प्रयास में भारत ने पाश्चात्य (अब्राहमिक) सोच को इतना समाहित कर लिया है कि वही आज इन विभाजनों का मुख्य कारण बन बैठी है। आज की भारतीय दृष्टि मूलतः एक 'बाइनरी लॉजिक' आधारित हो गयी है जोकि भारत का मूल नहीं है। यह सोच 'मैं' और 'दूसरा' (The Other), वाली अब्राहमिक सोच का परिणाम है जिससे आप पायेंगे कि समाज छोटी-२ बातों पर विघटित सा दिखता है और लोगों में येन केन प्रकारेण स्वयं को सही साबित करने की स्पर्धा सी लगी हुयी है। इसका उदाहरण आज आप मीडिया में होते संवादों में भी स्पष्ट रूप से देख सकते हैं। पाश्चात्य संकल्पना वाले 'लोकतंत्र' के तथाकथित स्तंभों पर होती चर्चाओं का स्वरुप देखें तो पायेंगे कि उसके मूल में भी यही 'बाइनरी' सोच है कि मैं ही सही हूँ (मेरी ही मान्यता/belief सही, मेरा ही भगवान सबसे ऊपर और शेष झूठे भगवान और उसके बाद इन झूठे भगवानों को मानने वालों का अंत होना आवश्यक है इसलिये इन्हें मारा जाना न्यायसंगत/नीतिसंगत है)।

श्रीराम के जीवन चरित्र से आप पायेंगे कि उनमें इस प्रकार के सोच कदापि नहीं। वह संकल्पना पूर्ण रूपेण धार्मिक (रिलिजियस नहीं) है और उसका मूल 'धर्मसँगत कर्त्तव्य निर्वाह' है। धर्म का मूल भी 'कर्तव्य' आधारित है न कि अधिकार (राइट) आधारित। श्रीराम को जब उनके पिता द्वारा दिये गये वचनोँ के निर्वाह हेतु बनवास मिलता है तो वे अपना पुत्रधर्म समझकर उसे सहर्ष स्वीकार करते हैं। अधिकार की अवधारणा के आधार पर उन्हें कहना चाहिये था कि मैं तो बड़ा पुत्र हूँ और मुझे ही राजा बनना चाहिये लेकिन वह यँहा पिता के प्रति पुत्र कर्त्तव्य को प्रधानता देते हैं। साथ ही उनके मन में भरत के प्रति कोई दुराभाव नहीं होता। 

दूसरा उदाहरण लँका काण्ड से लेते हैं जँहा रावण के समाप्त होने के बाद वे लँका को अपने राज्य का भाग नहीं बनाते अपितु विभीषण जोकि धर्म-परायणता (न्यायसँगतता) के प्रतीक हैं उन्हेँ राज्य देकर स्वयँ वापस अपने राज्य में आकर संतुष्ट भाव से राज करते हैं। यँहा यह भी उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व वे उनके द्वारा 'रावण वध' किये जाने के लिये प्रायश्चित करते हैं और वह इसलिये कि रावण का वर्ण (कास्ट नहीं) 'ब्राह्मण' था और उसका वध उन्होंने 'ज्ञान' के वध के रूप में, उस परंपरा (lineage) के वध के रूप में जिसमें रावण से पूर्व न जाने कितने धर्मपरायण ऋषि हो चुके थे, देखा, अतः प्रायश्चित करना उन्हें आवश्यक लगा। श्रीराम में एक राष्ट्रनायक के सभी गुण आप देख सकते हैं। विभीषण को उनके द्वारा राज्य संभालने का दायित्व दिया जाना इस बात की पुष्टि है कि उनकी दृष्टि 'धर्म-स्थापना' की थी न कि 'विस्तारवाद' जैंसे  मिथ्या की स्थापना की। विभीषण ने एक धर्म प्रतीक बनकर ही लँका का शासन सँभाला जबकि थे तो रावण के अनुज ही। यह स्वभाव यह भी दर्शाता है कि वे रावण को एक व्यक्ति के रूप में देखते थे और 'परिवार' के प्रति उनका कोई दुराभाव नहीं था। उनका उद्देश्य मात्र 'न्याय आधारित राज्य' (Just State) स्थापित करना था। आज की भारतीय राजनीति के परिप्रेक्ष्य में इसे देखा जाय तो आज के अनेकों नेताओं के लिये इससे बड़ा सुनहरा अवसर क्या हो सकता था जँहा उन्हें पूरी 'स्वर्णमयी लँका' मिल रही थी। ये तो अपनी कई पीढ़ियाँ इससे सुरक्षित कर लेते परन्तु श्रीराम कहते हैं: -

अपि स्वर्णमयी लँका लक्ष्मण न मे रोचते। 
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसि।।

ऐंसे श्रीराम का प्रतीक यदि आज के भारत में पुनः उनके जन्मस्थान पर न्यायसंगत रूप से बनना सुनिश्चित हुआ है तो इसमें पुनः वही 'बाइनरी' हिन्दू-मुसलमान डालकर उसके महत्व को निम्न दिखाने का संपूर्ण प्रयास इसी सोच के द्वारा किया जा रहा है। भारतीय समाज में उत्पन्न की गयी 'फाल्ट लाइन्स' जोकि इसी कुत्सित सोच द्वारा की गयी वह यँहा आग में घी का काम करती है। इसे दिखाया जाता है 'आर्य-द्रविड़' की दृष्टि से, 'हिन्दू-मुसलमान' की दृष्टि से, 'उत्तर-दक्षिण' की दृष्टि से, हिंदी भाषी (जोकि हिंदी है भी नहीं ७०% शब्द अरबी पारसी मूल के हैं) और शेष भारतीय भाषाओँ की दृष्टि से, हिन्दू पाकिस्तान की दृष्टि से। ये सारी दृष्टियाँ बड़ी बनायी गयी शिक्षा व्यवस्था, फिल्म, मीडिया आदि साधनों द्वारा और श्रीराम को अध्ययन किया जाने लगा पाश्चात्य दृष्टियों से और लिखने लगे शेल्डन पोलाक, वेंडी डोनिगर, देवदत्त पटनायक। प्रचारित करने लगे बरखा दत्त, राजदीप आदि। पुस्तकें लिखी गयी रोमिला थापर, इरफ़ान हबीब आदि द्वारा जँहा श्रीराम सुबिधा के आधार पर एक काल्पनिक और वास्तविक व्यक्ति होते गए। भारत का वास्तविक इतिहास "माइथोलॉजी' बन गया और श्रीराम, श्रीकृष्ण इन मिथोलोजियों के नायक न कि भारतीय इतिहास के वास्तविक नायक। हर्ष का विषय यह है कि इंटरनेट जैसी इस विज्ञान की खोज ने इस 'बाइनरी' को समझने में आसानी कर दी है क्यूँकि अब सूचना मात्र कुछ सत्ताओं की ही पूँजी बनकर नहीं रही और उसके कारण सँवाद, प्रश्नोत्तर की पुरानी भारतीय परंपरा पुनः विश्व पटल पर केंद्र में आ चुकी है। 'मिथ्या' जिसे सत्ता के बल पर स्थापित किया गया, सोशल माध्यमों पर आम मनुष्य को इसकी सूचना उपलब्ध हो जाने से एक नव-क्राँति उत्पन्न हुयी है और इस कारण बदलाव स्पष्ट दिख रहा है। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा था: -

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्‌ ॥

भावार्थ :  हे भारत! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं अपने रूप को रचता हूँ अर्थात साकार रूप से लोगों के सम्मुख प्रकट होता हूँ॥7॥

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्‌ ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥

भावार्थ :  साधु पुरुषों का उद्धार करने के लिए, पाप कर्म करने वालों का विनाश करने के लिए और धर्म की अच्छी तरह से स्थापना करने के लिए मैं युग-युग में प्रकट हुआ करता हूँ

अपने लेख का अंत मैं इसी से करूँगा कि सूचना/ज्ञान का यह प्रकटीकरण श्री कृष्ण का ही प्रकटीकरण ही है और वह समय अब आ चुका है जब 'रामराज्य' (न्यायसँगत राज्य) की स्थापना अवश्य ही होगी। राज्य ऐंसा होगा जँहा 'प्रश्न' किये जा सकेँगे न कि ऐंसा माना जाने लगेगा कि रावण अमर है। अमृत यदि रावणों की नाभि में चला जाय तो उसे भी नष्ट होना होगा। 

प्रणाम और जय श्रीराम!!

विजय गौड़ 
दिनाँक ०१/०८/२०२०  

श्रीराम शृंखला आलेख १

जैंसे-२ श्रीराम मंदिर भूमि पूजन की तिथि समीप आ रही है आपको मीडिया में भिन्न-२ प्रकार की चर्चाएँ सुनने को मिल रही होंगी। इन्हीं चर्चाओं में आपको बहुत से ‘इस्लाम’ को मानने वाले बुद्धिजीवी ये कहते हुये भी सुनाई दे रहे होंगे कि राम तो ‘इमाम-ए-हिंद’ हैं और इस पर हिंदू/सनातनी समाज बड़ा प्रसन्न होते भी देखा जा सकता है। यह वही ‘सेक्युलरिज़म’ वाली शिक्षा की उपज है जँहा कहा जाता है की ‘सभी धर्म समान हैं’। यह वाक्य भी इतना ही असत्य है जितना गाँधी जी कृत ‘ईश्वर-अल्लाह तेरो नाम’।
मुझे यह समझ नहीं आता कि आवश्यकता ही क्या है इस प्रकार के विमर्श की, इन प्रतिमानों की? राम भारतीय सभ्यता में एक राष्ट्र नायक हैं और जो भी लोग इस सभ्यता से स्वयम् को जोड़कर देखते हैं वे उन्हें उसी रूप में देख सकते हैं। आवश्यकता क्या है उन्हें ‘इमाम-ए-हिंद’ जैंसे शब्द देने की? Abrahmic मजहब की अवधारणा के आधार पर ‘अल्लाह’ उनका सर्वशक्तिमान है और वह मात्र एक है। अतः श्रीराम को इस सर्वशक्तिमान के समकक्ष रखना इस्लामिक अवधारणा के आधार पर ‘ईशनिंदा’ (blasphemy) होगी और ऐंसा कहने वाले को दंड दिया जाना चाहिये। फिर हिंदू समाज श्रीराम को ‘इमाम-ए-हिंद’ कहे जाने पर विरोध क्यूँ नहीं करता? क्या यह ‘ईशनिंदा’ नहीं है? यँहा यह भी स्पष्ट करना आवश्यक है कि श्रीराम हिंदू मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु का अवतार हैं और ‘इमाम’ इस्लाम में प्रचलित रूप से मस्जिद में religious prayer करवाने वाले व्यक्ति/लीडर को कहा जाता है। अब बतायें कि श्रीराम को यह कहना उचित है?
भारतीय सनातन समाज को न केवल अपनी भाषा का ज्ञान होना बहुत आवश्यक है अपितु दूसरी ओर ‘इस्लाम’ और क्रिस्चीऐनिटी’ जैंसी religion की अवधारणाओं का भी पूर्व पक्ष अत्यंत आवश्यक है नहीं तो वे इस अनावश्यक टी वी चर्चाओं में की गयी तुलना पर अपने अज्ञान के कारण मात्र ताली बजाते या प्रसन्न होते ही देखे जा सकते हैं और इसमें बहुत बड़ा योगदान भारतीय appeasement की राजनीति का है।
यँहा यह भी ध्यान देने योग्य है कि यह ‘इमाम-ए-हिंद’ की उपाधि देने वाला प्रथम व्यक्ति भी मोहम्मद इक़बाल ही है जोकि पाकिस्तान के तराना-ए-मिल्ली का रचयिता है और इस्लाम का ज्ञाता भी। उसे पूर्ण रूप से पता था कि श्रीराम को ‘अल्लाह’ के समकक्ष वह इस्लाम के अनुसार नहीं कह सकता और उसे गाँधी जी जैंसे मिथ्या ‘ईश्वर-अल्लाह तेरो नाम’ लिखने की आवश्यकता भी नहीं लगी होगी क्यूँकि उसे किसी का तुष्टिकरण नहीं करना था। उसने तुष्टिकरण किया (चालाकी से) लेकिन वँहा भी वह इस्लाम की मान्यता के विरुद्ध नहीं गया। आज भी हिंदू समाज इस ‘इमाम-ए-हिंद’ के मिथ्या से ग्रसित है।
धन्यवाद।

कॉपी राइट @विजय गौड़
दिनाँक: जुलाई ३१, २०२०

Saturday, 25 July 2020

छद्म आवरण !!

कब तक इस 'छद्म आवरण' में रहना होगा?
कब तक इस 'कुधारा प्रभाव' में बहना होगा?
मौन रहना भी तो एक मूक स्वीकृति है। 
किसी न किसी को तो ये कहना होगा।।

                   (१)
इस अमन की आशा के, 
इस पुरुस्कारों की अभिलाषा के, 
इस आक्रांताओं की भाषा के, 
इस मिथ्या की परिभाषा के, 
भवन को एक न एक दिन तो ढहना होगा
भय में रहना भी तो मन की विकृति है। 
किसी न किसी को तो ये कहना होगा।।

                  (२)
इन 'झूठ' की कहानियों को,
इन 'भाईयों' की मनमानियों को,
इन 'कागजी' राजा - रानियों को,
इन स्वार्थ की निशानियों को,
कब तक समाज को सहना होगा?
प्रश्न न करना भी तो एक बुरी प्रवृत्ति है। 
किसी न किसी को तो ये कहना होगा।।

                  (३)
उस शस्त्र-शास्त्रार्थी परंपरा को,
उस ताण्डवी शिव-शंकरा को,
उस शक्ति-शाँति की परिकल्पना को,
उस सर्व-समावेशी संकल्पना को,
पुनः भारतभूमि से बहना होगा,
मेरे राष्ट्र की तो यही सनातन प्रकृति है। 
किसी न किसी को तो ये कहना होगा।।

विजय गौड़
शनिवार, २५ जुलाई, २०२० 
मॉडेस्टो, कैलीफॉरनिया। 
(सुशांत सिंह की मृत्यु की एकतरफा मिथ्या कहानी और उस पर देशव्यापी आक्रोश को समर्पित, उस  पवित्र आत्मा को श्रद्धांजलि स्वरुप)



विजय की बुद्धिजीविता शृंखला: आलेख १

सेलिब्रिटी (Celebrity): एक मानस उध्योग
एक लम्बे अंतराल से इस विषय पर मेरे मानस में गूढ़ चिंतन चल रहा था और मेरा अंतर्मन मुझे निरंतर इस पर अपना विचार लिखने हेतु प्रेरित कर रहा था। अपना विचार लिखने के पूर्व में ही मैं यह स्पष्ट कर दूँ कि मेरा मानस स्वयम् इस शब्द से सुशोभित लोगों के प्रभाव में लंबे समय तक रहा है और इस प्रजाति को नायक के रूप में देखता रहा है। कारण कदाचित यह भी रहा कि प्रत्येक मनुष्य के स्वभाव में अनुसंधान (research/analysis) की प्रवृत्ति नहीं होती और न ही उसके पास समय होता है।
मुझे स्मरण होता है बॉलीवुड के एक मनोरंजनकारी (Bollywood entertainer) द्वारा किया हुआ एक विज्ञापन का जिसमें वह गोरे होने की क्रीम बेच रहा है और आज भी मैं यँहा अमेरिका में भी भारतीय किराने की दुकानों में वह क्रीम बिकते हुये देख रहा हूँ। ऐंसे ही साबुन के विज्ञापन भी हम देख सकते हैं भारतीय टेलिविज़न पर जिसमें उसे गोरा होने के लिये प्रचारित किया जाता है और इन सेलिवृटियों का ही उसमें भी प्रयोग होता है। यँहा यह ज्ञात हो कि ये लोग स्वयम् इन उत्पादों का प्रयोग करते हैं या इन्हें इस विषय का कुछ भी ज्ञान होता है, यह कोई मापदण्ड नहीं है।
इसका दूसरा उदाहरण जिसने मुझ पर यह लेख लिखने के लिये एक प्रकार से दबाव सा डाला, उसका भी वर्णन करता हूँ। यह उदाहरण अमेरिका से है जँहा का मनुष्य तो भारत में पॉप कल्चर (बॉलीवुड, मीडिया आदि) द्वारा बुद्धिजीविता की पराकाष्ठा के रूप में प्रचारित किया जाता है। मैं पिछले दो दशक से अधिक समय से अल्कोहोल उध्योग में कार्य कर रहा हूँ और अपने क्षेत्र में एक विशेषज्ञ के रूप में देखा जाता हूँ। अपने इसी कार्य के कारण मुझे अमेरिका से मैक्सिको निरंतर जाना होता है। वँहा एक उत्पाद बनाया जाता है ‘टकीला’ जो इस समय एक अल्कोहली पेय के रूप में विशेष प्रचलित है। वँहा जाकर पता चलता है कि हॉलीवुड का एक सेलिब्रिटी वँहा ‘टकीला’ बनवाता है और अमेरिका में वह उत्पाद बहुत बिकता है। कारण मात्र उसका सेलिब्रिटी (जनमानस पर प्रभाव) होना न कि उस पेय का कोई ज्ञान। पिछले ही वर्ष उसने वह ब्रांड किसी बड़ी कम्पनी को एक बिलीयन डॉलर में बेच दिया। इस बार पुनः मैक़्सिको गया तो पता चला कि एक और दूसरे सेलिब्रिटी ने अपनी ‘टकीला’ ब्रांड बनाना आरंभ कर दिया है और अवश्य ही ४-५ वर्ष बाद वो भी १-२ बिलीयन इसे किसी अन्य समूह को बेच देगा।
इन उदाहरणों से मेरा यह निष्कर्ष निकला कि किस प्रकार एक मनुष्य को पहले फिल्मों में एक नायक के रूप में दिखाकर एक छद्म उत्पन्न किया जाता है और उसके उपरांत उस छद्म छवि से जनसामान्य के मन पर हुये प्रभाव का प्रयोग कर व्यवसाय किया जाता है। यदि मैं जो स्वयम् उस ‘टकीला’ को बनाने का आदि-अन्त समझता है, उसे लेने के लिये विज्ञापन करूँ या उस ब्रांड से जुड़ूँ तो कदाचित एक दो के अतिरिक्त कोई भी उसे मात्र मेरे कहने पर न ले परंतु जब यही सेलिब्रिटी कहता है तो मात्र उसके कहने पर अनेकों लोग अपने कठिन परिश्रम का पैसा लगा देंगे (दिल्ली में आम्रपाली अपार्टमेंट के बारे में विदित ही है)। कहने का आशय यह है कि किस प्रकार मात्र एक व्यावसायिक कार्य हमारे मानस को कैंसे प्रभावित करता है कि हम बिना अधिक जानकारी लिये मात्र इनके कहने से ही कोई उत्पाद प्रयोग करना आरंभ कर देते हैं। इसी व्यवसाय का दूसरा रूप Facebook जैंसे माध्यमों पर देखने को मिलेगा फ़ैन क्लब के रूप में। यह भी पूर्ण व्यावसायिक, नैतिकता कभी भी मापदंड नहीं। इन लोगों का जनमानस पर प्रभाव ही है कि इन्हें उन विषयों पर भी सुना जाता है जिसका इन्हें कोई भी ज्ञान नहीं होता।
क्रमशः........
लेख: विजय गौड़

विजय की बुद्धिजीविता: आलेख २

भारतीय दृष्टि (Indian lense) और पाश्चात्य/अब्राहमी दृष्टि (Western lense)
भूमिका:

यह एक ऐंसा विषय है जिस पर मैं निरंतर पिछले कुछ वर्षों से अध्ययन कर रहा हूँ और जितना अधिक अध्ययन करता जा रहा हूँ, उतनी ही स्पष्टता आती जा रही है। इस विषय पर लिखना इसलिये भी और आवश्यक हो गया है क्यूँकि १९९० के दशक के आस-पास की पीढ़ी की स्तिथि आज यह है कि भारतीय दृष्टि (Indian lense) कुछ होता भी है, वह यह स्वीकार करने की भी मन:स्तिथि में नहीं है। जितना पाश्चात्य (brainwashed) वर्तमान भारतीय शिक्षा और समाज के साथ भारत में रहने वाला किशोर/नवयुवक या युवती है, उतना कदाचित अमेरिका में पलकर बड़ा हो रहा भारतीय पृष्ठभूमि का किशोर-किशोरी भी नहीं है। अपनी पहचान को, अपने मूल को जितना कम आंकने की प्रवृत्ति भारतीयों में है, वह कदाचित ही मैं किसी अन्य देश में देख पाता हूँ। यह मैं विश्व के २० से अधिक देशों में स्वयम् रहने के अनुभव के आधार पर कह रहा हूँ। इसका मुख्य कारण यह भी है कि भारत ही विश्व की एकमात्र जीवित सभ्यता है जिसमें निरंतरता शेष है अन्यथा शेष समकालीन सभ्यताएँ तो समाप्त कर दी गयी। यूनान, रोम, माया, परसिया, बेबिलीयोन, मेसोपोटामिया आदि अनेक प्राचीन सभ्यताएँ वर्तमान में मात्र म्यूज़ीयम में ही शोभायमान हैं। उनकी सारी अच्छी बातें आज की विस्तारवादी शक्तियों ने अपने नाम कर दी हैं और वे मात्र पेगंन संस्कृतियों के रूप में निम्न दृष्टि से देखी जाती हैं। भारत के साथ यह शक्तियाँ लगभग १००० वर्ष के दलन के बाद भी वह नहीं कर पायीं जो इन्होंने अन्य सभ्यताओं के साथ ५० से २०० वर्षों के अपने दमनकारी शासन द्वारा कर दिया। अवश्य ही आर्थिक रूप से भारत निम्न स्तर पर गया परंतु उसने अपनी सनातन पहचान को नहीं मिटने दिया। उसके बाद आया वह समय जिसने भारतीय मानस को सर्वाधिक प्रभावित किया और यह कहें कि भारतीय दृष्टि को क्षीण करने तथा क्रमशः समाप्त करने की नींव रखी। यह समय था सन १९४७ जब भारत से अंग्रेज गये और वह भी भारत का विभाजन करने के उपरान्त। एक सोच को पाकिस्तान मिल गया और दूसरी सोच जो शासक बनकर भारत में उभरी, वह भारत के मूल से पूर्णरूपेण अनभिज्ञ और ये कहें कि घृणा भाव रखने वाली तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। भारत का नया इतिहास भारत के बाहर या बाहरी सोच द्वारा लिखा जाने लगा और भारत के वास्तविक इतिहास को ‘मिथोलोजी’ कहकर प्रचारित किया जाने लगा और आज स्तिथि यह है कि स्कूल से लेकर प्रशासनिक सेवा की पुस्तकें इसी नव-इतिहास से भरी पड़ी हैं। आप दो भारतीयों को ही आपस में लड़ते पाएँगे अपने इतिहास को लेकर। भारतीय मानस को भ्रमित करने का जितना प्रयास पिछले ७ दशकों में हुआ, उतना १००० वर्ष भी नहीं कर पाये। इसमें प्रयोग किया गया आधुनिक तकनीकी का। पाठ्य पुस्तकों, मीडिया से लेकर सिनेमा तक सम्पूर्ण शक्ति से प्रयास किये गये कि कैंसे भारतीय को और सब कर दिया जाय पर भारतीय मूल से जुड़ा न रहने दिया जाय और इस हेतु उसमें अपनी पहचान को लेकर हीन भाव डालना अति आवश्यक था।

कृपया यह सूचित हो कि इस लेख का विषय इतिहास नहीं है। भूमिका मात्र आने वाले भागों में विषय को समझाने के लिये दी गयी है।
इसके अग्रिम भाग में मैं उदाहरणों के साथ आपके समक्ष अपना अध्ययन रखूँगा जिससे पाठक स्वयम् तुलनात्मक अध्ययन कर सकें।
प्रथम उदाहरण: witch hunting के समकक्ष भारतीय मानस में सती प्रथा का झूठ स्थापित करना और उसको हटाने में लॉर्ड विलीयम वेंटिंग का महिमामण्डन।

क्रमशः-

विजय गौड़

विजय की बुद्धिजीविता: आलेख ३

क्या भारत में एक सँस्था को ‘हलाल पंजीकरण’ का अधिकार देना व्यवसाय की स्वतंत्रता के नियमों का उल्लंघन और किसी समुदाय विशेष का तुष्टिकरण नहीं है?
मेरा बाल्यकाल की शिक्षाओं में एक प्रमुख शिक्षा थी ‘ईश्वर-अल्लाह तेरो नाम’। इस पंक्ति का प्रभाव मुझ पर इतना हुआ कि मेरा मानस उस प्रत्येक व्यक्ति को शंकित दृष्टि से देखता जो दूसरे मत वालों पर कुछ भी मेरी मान्यता के प्रतिकूल टिप्पणी करता। मैं सोचने लगता कि अवश्य ही ये लोग वैमनस्यग्रस्त लोग हैं। मेरी सोच को और अधिक शक्ति मिलती ‘हिंदू, मुस्लिम, सिख ईसाई। आपस में हैं भाई-२’ जैंसे सुंदर शब्दों/नारों से। शनैः-२ जीवन यात्रा आगे बढ़ती गयी और बॉलीवुड की फिल्मों से परिचय भी होना आरंभ हुआ। उस से पता चलता कि मौलाना जी कितने सरल और सबका कल्याण सोचने वाले होते हैं। स्मरण करें शोले फिल्म के ए के हंगल, वे मेरे मानस में मौलाना की प्रतिमूर्ति थे। मुझे ये लगता कि वे भी मेरी बूँगी देवी के मंदिर में आरती करवाने वाले बोड़ा जी (पुजारी) जैंसे ही थे और ऐंसे ही सब होते होंगे मौलाना/मौलवी लोग। साथ ही साथ सूचना का दूसरा मुख्य श्रोत बना टेलिविज़न समाचार। एनडीटीवी और आजतक। इन माध्यमों से निरंतर जिस प्रकार हिंदू प्रतीकों (भगवा,तिलक आदि) को प्रयोग करने वाले लोगों को दिखाया जाता (स्मरण करें राम मंदिर से जुड़े विषयों पर इनका प्रसारण, वैलेंटायन डे पर विरोध करते युवाओं का चित्रांकन, इतिहास के नाम पर झूठ दिखाती फिल्मों का विरोध करते लोगों का चित्रांकन) उस से मेरा मानस एक दूसरा ही रूप ले चुका था। इस मानस के साथ आया मैं भारत से अमेरिका। अब जीवन में कुछ समय मिलना आरंभ हुआ तो अपना स्वाध्याय करना आरंभ किया। पहली ही पुस्तक जिस से मेरी अध्ययन की मृग तृष्णा और बढ़ने लगी, वह थी श्री राजीव मल्होत्रा की Breaking India. इसके उपरान्त मेरी स्वयम् की दृष्टि में बड़ा अंतर आया। एक सरल स्वभाव जो बाल्यकाल से मिला था वह अब बातों को सही संदर्भ के साथ देखना आरंभ कर रहा था, लोगों की बातों को विश्लेषण के बाद ही सत्य मानना सीख रहा था।उसके बाद पढ़ी राजीव जी की ही दूसरी कृति ‘Being Different’ और इस पुस्तक ने मुझे अपने बचपन का विश्वास पुनः दिया जो बचपन राम लीलाओं के साथ बड़ा हुआ और उसे भारत का Grand narrative समझता और मेरा मानना है कि वही है भी। परंतु २० से ४० की आयु में जो भी पढ़ा-देखा, उस से जो एक ही दृष्टि से विषयों को देखने की छद्म (पॉप, pop) बुद्धिजीविता उत्पन्न हुयी थी, उससे शुद्धि का अनुभव जँहा स्वयम् के स्तर पर सुंदर है, सामाजिक (मुख्यतः Twitter, Facebook जैंसे पटलों पर) स्तर पर उसने मुझे अब ‘वाम’से ‘दक्षिण’कर दिया है। मूल रूप से मैं तब भी भारतीय था और आज भी (bharatiya lense is neither left nor right. left & right is something again a western construct which Indian intelligencia is using to study Indian hindu society which is not abrahmic in nature)।

अब आते हैं इस आलेख के मुख्य विषय पर जिसके कारण ये भूमिका देनी पड़ी। ‘हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई। आपस में हैं भाई-२’ जो वैज्ञानिक (gene study) और ऐतिहासिक सत्य भी है कि समस्त भारत मूल रूप से सनातन हिंदू ही है। ये जो आज जॉन और तैमूर हो रखे हैं वो भी रामलाल और श्यामलाल जी की वंशावली से ही हैं। इसे ही मूल मानकर इसकी व्याख्या करते हैं। यदि भारत की राज सत्ता भी यह मानती है तो भाई-२ अलग कैंसे? कुछ भाइयों को ये आवश्यकता क्यूँ पड़ रही है कि वे अपनी वंशावली अरब में ढूँढ रहे हैं? हमें तो ये बताया गया कि ऐंसी सोच रखने वाले पाकिस्तान हो गये, क्या ये असत्य था? यदि हमारे प्रथम प्रधानमंत्री और शिक्षा मंत्री भाईचारा और गंगा जमुनी तहजीब के प्रणेता थे तो उन्हें इसकी आवश्यकता ही क्यूँ पड़ी? दो भाइयों में तो भाईचारा स्वतः ही होता है, नहीं? मेरे माता-पिता ने तो मुझे कभी नहीं सिखाया कि अपने भाई-बहनों से प्रेम भाव रखो, ये तो नैसर्गिक हो गया। यही आपके साथ भी है ना? तो यह बनावटी बातें क्यूँ करनी पड़ी? क्या इसके मूल में ही कुछ विरोधाभास तो नहीं? क्या ऐंसा तो नहीं कि इनमें से दो भाईओं (मुस्लिम-ईसाई) का मूल कँही और है? वे अपनी प्रेरणा किसी दूसरे सिद्धांत से तो नहीं लेते? यदि ‘हाँ’ तो उस पर चर्चा करना अपराध क्यूँ? जब वे अलगाव का भाव रखते हैं तभी ‘हलाल पंजीकरण’ की आवश्यकता हुई ना? ये तो उचित नहीं ना कि एक भाई तो इतना ‘सेक्युलर’ कि वो अपना प्रेम दिखाने के लिये हलाल विधि से मारे गये पशु (वह पशु जिसे उसकी संस्कृति में मातु तुल्य इसलिये माना जाता है क्यूँकि वह उनकी अर्थ व्यवस्था का मूल रही है) के माँस वाले ‘टूंडे कबाब’ भी खा ले और दूसरा ‘झटका’ खाना ‘हराम’ समझे? ये तो हुई नैतिकता की बात। चलिये अब आते हैं अधिकार (rights) पर जो कि आज की पीढ़ी का ‘new cool’ है। सुना होगा आपने, ‘bro my body, my right’। वैंसे भारतीय दृष्टि अधिकार और कर्तव्य के सामंजस्य पर आधारित है, कदाचित कर्तव्य की ओर तुला कुछ अधिक झुकी है तभी तो आज भी भारतीय माता-पिता बच्चों की शिक्षा और विवाह तक के लिये धनार्जन करता है (हाँ ‘my body, my right’ संस्कृति की प्रवृत्ति इसके विपरीत है)। अधिकार तो सबको समान होना चाहिये ना यदि लोकतंत्र और न्याय आधारित व्यवस्था है तो। फिर ये ‘पर्सनल लॉ बोर्ड’ जैंसी संस्थाएँ पंजीकरण कर कैंसे पैंसे ले रही हैं? यह कार्य सरकारी सँस्था क्यूँ नहीं कर रही जिस से इस से अर्जित धन पूरे राष्ट्र के लिये प्रयोग हो।एक भाई के लिये ये विशेष सुविधा क्यूँ? दूसरे भाई के तो पूजा स्थान का पैंसा भी आप इसी भाई के कल्याण हेतु बनायी स्कीमों में लगा रहे हैं, नहीं? (Hindu temples are still government administered right?)। एक भाई का परिवार न्यायालय में हिंदू मंदिर (सबरीमाला) में उन्हें न आने देने में ‘न्याय’ हेतु जा सकता है और ‘फ्री मीडिया’ पर पूरा सहयोग ‘प्राइम टाइम शो’ के माध्यमों से पाता है तो दूसरी ओर वही ‘लोकतंत्र’ का स्तंभ ‘न्यायालय’ दूसरे भाई के परिवार की ‘न्याय याचिका’ जिसमें वह परिवार की मुख्य धुरी (महिला) को मस्जिद में पुरुषों के साथ नमाज पढ़ने की आज्ञा दिये जाने हेतु जाता है, तो उन्हें ये कहकर लौटा दिया जाता है कि ‘आप उस से प्रभावित नहीं होते’ (you are not a party)। ये कैंसा महिला सशक्तिकरण (feminism) है जँहा एक समुदाय की महिला के लिये साथ में पूजा का अधिकार न होना ‘cool’ और सुंदर परम्परा है और दूसरे भाई के परिवार की महिला का मात्र एक पूजा स्थान में प्रवेश वर्जित होना, सामाजिक कुरीति/पिछड़ापन है जिसे हटाने हेतु टेलिविज़न स्टूडीओ से अनेकों राजा राम मोहन रॉय, विलीयम वेंटिंग से इसे हटाने हेतु पुरजोर अनुग्रह करते प्रतीत हो रहे हैं। हो सकता है आने वाली पीढ़ियाँ इन समाज सुधारकों का नाम भी इतिहास की पुस्तकों में पढ़ें (आज की इतिहास की पुस्तकों में सती प्रथा नाम की मिथ्या को राम मोहन राय और वेंटिंग द्वारा हटाया गया) कि सबरीमाला की कुरीति पर रोक इन महानुभावों ने लगवाकर महिला सशक्तिकरण को नई ऊँचाइयाँ दी और दूसरे परिवार की महिला उस समय भी ‘निकाह हलाला’ जैंसी ‘cool’ परम्पराओं का श्रद्धा से निर्वहन ही कर रही हों।

कैंसे एक छोटे से ठेले पर फल बेच रहे विक्रेता का स्वयम् को ‘हिंदू’ फल विक्रेता कहना और एक पंजीकृत सँस्था द्वारा समर्थित बताना अपराध है? यदि दूसरी कुछ वैसी ही सँस्था ‘हलाल पंजीकरण’ तक दे सकती है? क्या यह एक भाई का ‘सशक्तिकरण’ और दूसरे के प्रति ‘अन्याय’ नहीं है? क्या यह एक लोकतांत्रिक देश में एक समुदाय विशेष को एक समानांतर अर्थव्यवस्था (parellel economy) स्थापित करने की न्यायिक अनुमति नहीं है? और दूसरे को उसके प्रतीकों का प्रयोग करना भी राज्य व्यवस्था द्वारा दंडनीय है। क्या लोकतंत्र में यह होना चाहिये कि कुछ लोग तो मजहब पहनकर पूरे देश में गौरव से भ्रमण करें और सड़कों पर यातायात रोकना तक जन्मसिद्ध अधिकार समझें और दूसरे अपनी पहचान बताने में पहले तो संकोच करें (आधुनिक/सेक्युलर हिंदू परिवारों में भगवा रंग, कलावा, टीका आदि अब uncool है और शेष के मानस में इसे ‘hindu terror’ के रूप में बिठाया जा रहा है) और जो थोड़ा भी प्रदर्शन करे उसे या तो राज्य व्यवस्था बलपूर्वक स्वयम् हटवा दे या कुछ का भीड़ द्वारा वीभत्स अंत भी करवा दे?
ये कुछ यक्ष प्रश्न हैं जिन पर समाज को सोचना आवश्यक है। लेख द्वारा मैं किसी की भावना को आहत नहीं करना चाहता अपितु अपनी प्रश्न करने की पौराणिक सनातन परम्परा का निर्वाह कर रहा हूँ। लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मेरा भी अधिकार है, यध्यपि मैं यह लेख अपने कर्तव्य भाव से लिख रहा हूँ। यह कृष्ण-अर्जुन युग से आदि शंकराचार्य से होती हुयी स्वामी विवेकानंद द्वारा मुझ तक पहुँची है और इसी प्रकार आगे बढ़ती रहेगी। मैं पाठकों को भी प्रश्नों हेतु आमंत्रित करता हूँ।
इति समाप्तम। ॐ।
विजय गौड़
कैलीफ़ोरनिया, अमेरिका

मुनव्वर को जवाब!!

यूँ तो अब मैंने शायरी छोड़ दी है लेकिन आज लिखना ज़रूरी हो गया। ये ‘बड़ी शख़्सियत’ मुनव्वर’ राणा कुछ ऐंसा कह गये जिसका उनकी ही ज़ुबान में ज़वाब देना लाज़मी है, वक़्त की फ़रमाइश है। जब तलक ये अपनी सियासत पर ही बयानबाज़ी/शायरी करते थे, तब तलक कुछ कहना ठीक नहीं था, अब इन्होंने दावत दी है तो ‘शुक्रिया’ तो कहना ही होगा। ये लीजिये हमारा भी ‘शुक्रिया’।
मुनव्वर!! ये नफ़रतों के बाज़ार मत बेचों,
जँहा हाथ थामने की ज़रूरत हो,
वँहा क़त्ल के औज़ार मत बेचो

जिस महफ़िल में कुछ दिन पहले ‘माँ’ बेचा करते थे,
अब उसी में ‘इस्लाम ख़तरे में है’ का अख़बार मत बेचो।

अच्छा नहीं ‘गंगा-जमुनी तहज़ीब’ की नींव का नम होना,
इसके लिये ‘संबित’ है गुनहगार, मत बेचो।

तुम तो ‘भाईचारे’ की चलती-फिरती मिसाल थे?
अब ये ३५ करोड़ ‘भाई’ और १०० करोड़ ‘चारे’ का संसार मत बेचो।

ये ‘कोरोना’ सरकार नहीं है जो ‘वोट’ समझे,
इसलिये ये अपना ‘मजहबी’ बुख़ार मत बेचो।

हमने देखा है ‘तराना ए हिंद’ को ‘तराना ए मिल्ली’ बनते,
अब तुम भी ‘सरज़मीं ए हिंद’ में वो ‘इकबाली हथियार’ मत बेचो।
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@विजय गौड़
१४/०५/२०२०

Wednesday, 22 July 2020

विजय की बुद्धिजीविता: आलेख ४


क्या अल्लामा इक़बाल का 'सारे जँहा से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा'  "दारुल हर्ब" के लिये लिखा काव्य नहीं था?: विजय गौड़ द्वारा एक पूर्वपक्ष 

आज संध्याकाल में मैंने 'जयपुर डायलाग' नामक एक यूट्यूब चैनल (जिसका मैं नियमित श्रोता/दर्शक हूँ) का संपादन करने वाले श्री संजय दीक्षित जी का आज का विडिओ देखा जिसमें उन्होंने 'कश्मीरियत' पर अपना विमर्श रखा है (लिंक साझा भी कर रहा हूँ) जोकि पूर्ण रूपेण तथ्य आधारित विश्लेषण है। उसके उपरान्त मैंने आवश्यक समझा कि इसी से मिलता-जुलता विमर्श मैं भी मो० इकबाल के उदाहरण के साथ सबके सम्मुख रखूँ।   
मो० इक़बाल जिनको कि अल्लामा इक़बाल के नाम से भी जाना जाता है को भले ही आज का भारतीय युवा नाम से न जानता हो परन्तु उनके काव्य "सारे जँहा से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा" को अवश्य ही जानता है। भारत की 'सेक्युलर' राज्य सत्ता द्वारा स्थापित स्कूल व्यवस्था में यह 'समूह गीत' के रूप मेरे अध्ययन काल में प्रतिदिन गाया जाता था (मुझे पूर्ण विश्वास है कि आज भी बच्चों से गवाया जाता होगा) और यदि आप अरबी/पारसी युक्त हिंदी में पारंगत हैं तो इस काव्य को पढ़/सुनकर गौरव की अनुभूति भी अवश्य करेंगे और मेरा मानना है कि करनी भी चाहिये। यह जो नैरेटिव है इसे तो सिनेमा या स्कूली शिक्षण प्रणाली के माध्यम से बड़े वृहद् रूप में आगे बढ़ाया गया परन्तु क्या यह आवश्यक नहीं कि इन्हीं इक़बाल की लिखी 'तराना ए मिल्ली' के बारे में आम जनमानस को बताया जाता? क्या यह प्रत्येक नागरिक का अधिकार नहीं है कि उसे पूरी सूचना दी जाय न कि मात्र महिमामण्डन वाली? क्या इस प्रकार के नैरेटिव का कुछ विशेष उद्देश्य था? क्या आज की पाठ्यपुस्तकों में कहीं यह सूचना दी जाती है कि मो० इक़बाल के साहित्य की भूमिका भारत विभाजन में क्या थी?  शिक्षण व्यवस्था का उद्देश्य विद्यार्थियों में उनके स्वयं के चिंतन, सत्य-असत्य के विवेक का विकास करना होना चाहिये न कि एक ओर की ही सूचना देकर उनकी सोच को संकुचित करना।  

मो० इक़बाल को पाकिस्तान का 'राष्ट्रकवि' और 'स्पिरिचुअल फादर' माना जाता है और इसमें कोई संदेह नहीं कि 'दो कौमी नजरिया' या 'Two Nation Theory' के नाम पर भारत को विभाजित करने वाले जिन्ना उनके शिष्य थे। (उनके विकिपीडिआ पेज पर भी जिन्नाह को उनके दर्शन को मानने वालों में बताया गया है) अतः वे इस्लाम की 'दारुल इस्लाम' (इस्लामिक स्टेट, state ruled by Islamic Sharia law) और 'दारुल हर्ब' (State which is not under Islamic law) की रूपरेखा को भलीभाँति समझने वाले ज्ञानी इंसान थे। 'दारुल हर्ब' के लिए कुछ विशेष 'code of conduct' (व्यवहार में प्रयोग की जाने वाली नियमावली) भी इस्लामिक मनीषियों द्वारा दिये गये हैं और उसमें मुख्य है कि उन्हें एक विशेष रणनीति 'स्टेट ऑफ़ वार' में रहते हुये इस्लाम के विस्तार हेतु कार्य करना है।श्री संजय जी ने इसका सुन्दर विश्लेषण किया है। इन बिंदुओं की पूर्ण विवेचना के उपरान्त ऐंसा प्रतीत होता है कि मो० इक़बाल की यह कविता (तराना ए हिंद) 'सारे जँहा से अच्छा' एक 'बुद्धिजीविता युद्ध' को ध्यान में रखते हुए लिखी गयी थी जिसका उद्देश्य भारतीय समाज (दारुल हर्ब) को सकारात्मक रूप से प्रभावित कर अपने दीर्घकालीन लक्ष्य (दारुल इस्लाम) को प्राप्त करना था। पाकिस्तान के लिये लिखा 'तराना ए मिल्ली ' मो० इक़बाल की इस्लामिक स्टेट (मुस्लिम भाईचारा, मुस्लिम ब्रदरहुड ) की स्पष्टता का धोतक है जिसमें वे स्पष्ट रूप से पूरे विश्व को 'इस्लामिक स्टेट' बनाने की बात करते हैं।  

चीनो-अरब हमारा, हिन्दोस्ताँ हमारा। 
मुस्लिम हैं हम वतन हैं सारा जँहा हमारा।।

उनके लेखों से यह भी स्पष्ट है कि यह भाईचारा वह शाँति मार्ग द्वारा स्थापित करने की बात नहीं करते। अपनी ही कविता 'शिकवा' में वे अपने अल्लाह के लिए यह लिखते हैं : -

तुझको मालूम है लेता था कोई नाम तेरा। 
कुव्वत-ए-बाजु-ए-मुस्लिम ने किया काम तेरा।।

उनकी इन पँक्तियों से स्पष्ट होता है कि उनकी मान्यता के अनुसार इस्लाम जनमानस के ऊपर बाहुबल का प्रयोग कर थोपा जाना उचित है। क्या यह महिमामण्डन एक सभ्य समाज के लिये सही है? आगे इसी में वे तलवार के बल पर पाई हुयी राजसत्ता का समर्थन करते हुए दिखते हैं जिससे यह स्पष्ट होता है कि वे इस्लाम के विस्तार के लिये अपनाये गये हिंसा के मार्ग का समर्थन करते हैं: -

पर तेरे नाम पर तलवार उठाई किसने। 
काट कर रख दिये कुफ्फार के लश्कर किसने।।

वे इस्लाम के पतन को लेकर दुःखी भी दिखते हैं परन्तु उनके शब्द चयन से आप स्पष्ट रूप से देख सकते हैं कि इसके पीछे की सोच कौन सी है। 

कहर तो ये है है कि काफिर को मिले हूर-ओ-क़ुसूरल। 
और बेचारे मुसलमान को फ़क़त वादा ए हूर।।

समय-२ पर उनके कुफ्फार/काफिर शब्दों के प्रयोग से उनकी 'अपने लोग और अन्य' वाली सोच भी स्पष्ट होती है। 

इसी रणनीति का प्रयोग 'तथाकथित हिंदी सिनेमा' जोकि वस्तुतः उर्दू सिनेमा है, भी करता आया है यह आप उनकी फिल्मों के बदलते स्वरुप (१९४७ से लेकर वर्तमान तक) से भी समझ सकते हैं। इसका विश्लेषण आने वाले समय में अन्य लेखों द्वारा आपके सम्मुख रखूँगा। 


नोट: 
१) लेख का ध्येय किसी मत/पँथ की मान्यताओं का असम्मान कदापि नहीं है। शब्द मात्र विश्लेषण हेतु लिये गये हैं। यह लेख मात्र मेरी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रयोग कर जनसामान्य के साथ चर्चा हेतु लिखा गया है। 

२) मैंने संजय जी के नाम के आगे सम्मान स्वरूप 'श्री' शब्द का प्रयोग किया है परन्तु मो० इकबाल के नाम के आगे इसका  प्रयोग नहीं किया है क्यूँकि 'श्री' शब्द हिन्दू सँस्कृति से आता है और वर्तमान में इस पर आपत्ति भी हो सकती है, भावनाएँ आहत भी हो सकती हैं। 'श्री' न लगाने से मेरा आशय उनका असम्मान करने से नहीं है। यह भी ज्ञात हो कि इक़बाल स्वयं कश्मीरी हिन्दू परिवार से थे और उनका अरबी/पारसी/तुर्क इस्लामिक वंशावली से कोई संबध नहीं था। 

आलेख: 
विजय कुमार गौड़ 
दिनाँक: २२ जुलाई, २०२० 
स्थान: कैलीफॉरनिया, अमेरिका

Saturday, 18 July 2020

जननी!!

जननी जब तू वीर जने,
तब ही भारत, भारत बने।
हे मातु! होती धर्म-स्थापना,
जब तू कौशल्या-देवकी बने।।

शिव की शक्ति तू ही,
नारैण की भक्ति तू ही।
तू शारदा, तू सरस्वती,
है ब्रह्म की आसक्ति तू ही।
प्रकृति बन जब तू हो प्रकट शनैः-शनैः,
तब पुनः जीव-जीवन बने।

तुझसे उदय हो धर्म का,
तू है सँहार, अधर्म का। 
है तुझे वरदान जग जन्म का 
तू ज्ञान प्रथम दे कर्म का। 
जब सृष्टि पर कुदृष्टि के बादल घने,
तब तू पर्वत सी अटल तने 
जननी जब तू वीर जने,
तब ही भारत, भारत बने। 


@ विजय गौड़ 
जुलै, १८, २०२० 
मॉडेस्टो। 



Saturday, 4 January 2020

मनोभाव

 “मनोभाव”

उत्सवों के आगमन में, पितरों के इस भवन में।
हो एकत्रण हमारा, मन यही हो प्रण हमारा।।

है यही अंतःकरण में,
यही है आवरण में।
है यही गगन हमारा,
हो यहीं मिलन हमारा।
उत्सवों के आगमन में, पितरों के इस भवन में.....

स्मृतियों का आँगन,
है पवित्र, है ये पावन,
है ये आचमन हमारा,
हैं यहीं तो धन हमारा,
उत्सवों के आगमन में, पितरों के इस भवन में.....

जीवन घटे कँही भी,
पर मन रहे यहीं ही,
ये तीर्थ है हमारा,
है यही मेरा देवाला,

उत्सवों के आगमन में, पितरों के इस भवन में,
हो एकत्रण हमारा, मन यही हो प्रण हमारा।।

दीपावली २०१९ को अपने पैतृक आवास के चित्र को देख उपजे मनोभाव।
रचना: विजय गौड़
दिनांक: ऑक्टोबर २६, २०१९