Saturday, 23 March 2013

"देवी वंदना"

ऐ ग्ये माँ ऐ ग्ये त्येरा थान मा त्येरा ग्वाल-बाल ऐ ग्ये,(२)
नागर-निसाण ध्वजा नरयुल ल्येकि त्येरि उकाल लै ग्ये।

ऊँचा डाँड्यू मा बसदि, मुल मुल सदानि हैंसदी,
त्येरि स्वाणी या सूरत, लाड़ प्यारै कि मूरत,
मुखड्यों मा मौल्यार ल्येकि जैकारा लगौन्दा ग्वाल-बाल ऐ ग्ये,
नागर-निसाण .....

त्येरा थान जू आन्दु, खाली हाथ नि जांदू,
त्येरि खुचल्यों मुंड धैरि, खैरि-बिपदा बिसरांदु,
नौन्यालु ल्येकि धार-२ बेटिं ब्वै-बाब ऐग्ये,
नागर-निसाण ....

चंडी-मनसा त्वी छैयी, गिरिजा-धारी त्वी गैई,
नैणी-धूमा ह्वै ग्येयी, बूंगी-दीवा बि त्वी छैयी,
तू छैयी एक त्येरा रूप अनेक माता दैणी ह्वै जै,
नागर -निसाण ....
ऐ ग्ये माँ ....

Wednesday, 20 March 2013

दयवतों कि धरती फेर भगीरथ खुज्याणी!!!!

ऐंच हिमाल बीटिंन, माँ धै च लगाणी,
दयवतों कि धरती फेर भगीरथ खुज्याणी।।

कख छाँ उन्द बगणा, अफसणि अफ़ी ठगणा,
स्यीं उंदार छोडि, उकाल किलै नि लगणा?
देखा सब्यों का चुल्लों मा आग भुबराणी,
ऐंच हिमाल बीटिंन, माँ धै च लगाणी।

सूनि तिबरी-डंडयालि, रीति रौलि-नवालि,
अन्धेरों मा डुब्यीं छन, ख्वै ग्ये झणी कख उज्यालि,
बौडी कि आवा, कूड़ी-पुन्गड़ी भट्याणी,
ऐंच हिमाल बीटिंन, माँ धै च लगाणी।

तुम मा नि लगाण, त कैमा लगाण,
ये मनै पिड़ा मिन कैथैं सुणाण,
रवे रवे कि सुखि ग्ये यूं आख्यों कु पाणी,
ऐंच हिमाल बीटिंन, माँ धै च लगाणी।

क्वी त अब सोचा, तुमरू क्वी गौं चा,
जलमभूमि छोड़ी, कख छाँ तुम पौन्च्याँ?
सियाँ छाँ सुनिंद, ब्वै कि खुद नि खुदयाणी?
ऐंच हिमाल बीटिंन, माँ धै च लगाणी।

स्यीं निंद से उट्ठ, अब ह्वैजा एकजुट,
हैंकि गंगा थैं लाणु, बोटा त मुट्ट,
वेन पुरखा तारिन, हैंकी पुश्त तिन बचाणी,
दयवतों कि धरती फेर भगीरथ खुज्याणी।।

विजय गौड़ 
20/03/2013

Wednesday, 13 March 2013

पहाड़ी सुभौ !!!

मिथै कांडो मा हिटणु हि भलु लगदु,
बिरणो कि पिड़ा सुचणु हि भलु लगदु। 

अब क्वी यीं गौलि काट दया त क्या कन,
मिथें जै कै थैं औंगाल घल्णु हि भलु लगदु,
बिरणो कि पिड़ा सुचणु ..........

जौन्थें सब्यों न धक्ये, दुन्या न पिच्गै,
वुंथै भुयां फुंडै बटवालुण हि भलु लगदु।  
बिरणो कि पिड़ा सुचणु ..........

मिन छ्वटा-बड़ा, सब्यों कि बथ सुणिन,
मिथै अपणा मन कि सुणन हि भलु लगदु,
बिरणो कि पिड़ा सुचणु ..........

ज्वी क्वी अब बडू बणन मा लग्युं,
मिथै छ्वटु बणणु हि भलु लगदु,
बिरणो कि पिड़ा सुचणु ..........  

अब ज़मानु मम्मी-डैडी कु ऐ ग्ये,
मिथै अज्युं बि ब्वै-बुबा बुल्णु हि भलु लगदु,
बिरणो कि पिड़ा सुचणु ..........  

भै-बंद अब रॉक, पॉप, गंग्नम कन्नान,
भारे! मिथै ढोल-दमों मा नचणु हि भलु लगदु,
बिरणो कि पिड़ा सुचणु .......... 

क्वि बर्गर, क्वि चौमिन त क्वी पिज़्ज़ा बुन्नु,
मिथै गथ्वणि, फकरवणी, चुनै रूटलि फुकणु हि भलु लगदु,
बिरणो कि पिड़ा सुचणु ..........      

लोग अज्क्याल झणी कख-कख जाणे छ्वीं करणान,
मिथै अपणु 'पहाड़' घुमणु हि भलु लगदु,
बिरणो कि पिड़ा सुचणु ..........  

विजय गौड़ 
'मि पहाड़ी, पहाड़ म्येरि पछ्याँण'
सर्वाधिकार सुरक्षित ... 

Saturday, 9 March 2013

आख़िर वजह क्या थी??

दोस्तों! आज बड़े दिन बाद खुद से फिर मिला।चंद सालों से कुछ सो सा गया था, कल शाम जनाब राहत इन्दौरी और जनाब मुन्नवर राणा को बहुत वक़्त बाद सुना। क्या खूब लिखा है दोनों ने, क्या खूब महसूस किया है। कहते हैं न कि बुझी मशाल को फिर से जलने के लिए इक अदद चिंगारी की जरुरत होती है, ये दोनों उजाले से बेइन्तहा रोशन मशालें मुझे फिर कुछ लिखने को कह गयी, जो लिखा वो नज़र कर रहा हूँ, उम्मीद, कि गज़ल आपके दिल पे दस्तक देगी। गुश्ताखी माफ़।

तेरे 'ना' कहने की आख़िर वजह क्या थी?
हमसे यूं दूर रहने कि आख़िर वजह क्या थी?

तुम तो ख़ुद ही वाकिफ़ थीं मेरे हाल-ए-दिल से
इस ज़ज्बात के ढहने की आख़िर वजह क्या थी?
तेरे 'ना' कहने की आखिर..........

मेरी ख्वाइश की गर तेरे दिल में जगह नहीं,
हर रोज खिड़की पे रहने की आखिर वजह क्या थी?
तेरे 'ना' कहने की आखिर..........

दरिया को समंदर से नहीं मिलना था गर,
फिर उसके बहने की आखिर वजह क्या थी?
तेरे 'ना' कहने की आखिर..........

मेरे हालात का यूँ तो तुझपे कोई असर नहीं,
मैं याद करूं तो तुझे हिचकी आने की आख़िर वजह क्या थी?

तेरे 'ना' कहने की आखिर..........

ऐ परवरदिगार! मैं अब भी तेरी साजिश पे सोचता हूँ,
मुझसे 'हाँ' अर उससे 'ना' कहने की आखिर वजह क्या थी?
तेरे 'ना' कहने की आखिर..........

विजय गौड़
10/03/2013

# पसंद आये तो आपसे कुछ लिखने की उम्मीद करूँगा, आप अपने खयालात से जरुर रूबरू करवाएं!!!






Wednesday, 6 March 2013

धिरज धैर!!!!

धिरज धैर,
त्येरि अर्जी मंजूर होलि,
आज न त भोल,
तु बि मसहूर होलि।।

कोसिस त्येरा हथ मा च,
वेमा कसर नि छोड़,
दिन हो या रात,
तु कनु रै उठा-पोड़।
मेहनत सब्यों कन पुडद लाटा, 
हिटल्यां बल्द हों,
या अणहिटल्यां बोड़,
तू बीज बुतदु रै,
एक दिन फसल भरपूर होलि,
आज न त भोल तु बि मसहूर  होलि!!!

बगतै मार से,
घबरै आस न छोड़,
लग्युं रै बाटू,
सीं सांस नि तोड़,
भला दिन जरुर बौडदन लोला,
मनै बैमन तू बाटू नि मोड़,
तू जोर लगाणु रै,
सुणे उख जरुर होलि,
आज न त भोल तु बि मसहूर होलि!!!

अंधेरु नि रैणों सदनि ये जहाँन मा,
त्येरु बि झंडा उडलु असमान मा,  
आस-सांस तु बिसरि नि जै,
तेरु बि नौ होलु कबि महानो मा,
अधीर नि होण,
मनसा जल्द हि पूरि होलि,
आज न त भोल तु बि मसहूर होलि!!!

विजय गौड़ 
6/03/2013
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Friday, 1 March 2013

आज फिर कुच लिखणु बैठ्युं छौं!!!


आज फिर कुच लिखणु बैठ्युं छौं,
अपणा भितरो इंसान दिखणु बैठ्युं छौं।

सुच्णु छौं कि क्वि भलु सि गीत लिखुँ,
पर लिखुँ त क्याँ पर गीत लिखुँ,
बाबा कि ब्यटुली सणी लाड़ पर लिखुँ,
कि ब्वै का नौना सणी प्रीत पर लिखुँ,
मन्न मा ये घंगतोल लेकि सुच्णु बैठ्युं छौं ,
आज फिर कुच लिखणु बैठ्युं छौं......

भ्रष्टाचार क भोग पर लिखुँ,
कि बेरोजगारी कु रोग पर लिखुँ ,
गरीब क जोग पर लिखुँ,
कि अमीरों क संजोग पर लिखुँ,
समाज कि आज कि स्तिथि से कुच सिख्णु बैठ्युं छौं,
आज फिर कुच लिखणु बैठ्युं छौं........

मनखि कि मोह माया पर लिखुँ,
कि कालि-गोरि काया पर लिखुँ,
बालों क ग्वाया पर लिखुँ 
कि बस्ग्यलि छवाया पर लिखुँ,
लिख्वार मन कख-कख गिर्ज्वडा लगान्द, दिख्णु बैठ्युं छौं 
आज फिर कुच लिखणु बैठ्युं छौं........

श्रीमान जी कु ऑफिस टैम पर लिखुँ,
कि श्रीमति जी क बैम पर लिखुँ,
नेता जी कु कुर्सि प्रेम पर लिखुँ,
या अपणा देस मा हूणा स्कैम पर लिखुँ,
विषय इथगा मिलणांन कि अन्गुल्यों मा गिंणणु  बैठ्युं छौं,
आज फिर कुच लिखणु बैठ्युं छौं........

विजय गौड़ 
हनोई, विएतनाम बीटिंन
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Saturday, 23 February 2013

हम इथगा मजबूर किलै छाँ!!!


हम इथगा मजबूर किलै छाँ?
पहाड़ी ह्वैकी बि पहाड़ से दूर किलै छाँ??

जख कबि टुट्या खटलोँ का सारा ग्वाया लगैन,
जख कबि माटु अर गारा इना-उना छमडैन,
जख कबि कमेडू - कलमन आखर लिख्येन,
जख कबि बड़ी घाम बाँचि गिनती- पाड़ा सिख्येन,
वीं जलमभूमि से बगणा बदस्तूर किलै छाँ??
हम इथगा मजबूर किलै छाँ??

जख कबि बार-त्योहार रंग-पटखा उड़येन,
जख कबि दगिड्यों दगड़ी खौला-म्येला घुमैन,
जख कबि ब्यों-बरत्यों मा बिस्तर-लखडा सरैन,
जख कबि गोँ बिटी दिदी-भुली सैसुर लख्वैन,
वूँ रीत-रिवाजों थैं बिसरणा हुजूर किलै छाँ??
पहाड़ी ह्वैकी बि पहाड़ से दूर किलै छाँ??

जख कबि अपणी भासा का क ख ग सिख्येन,
जख बाटु हिटदा झणी कथगा पट मिसयेंन,
जख कबि जागर, थड्या, चौफंलों कि भौंण सुणयेंन,
जख कबि ग्वैर बणी पाखों रसिला गीत गुनगुणेंन,
वीं पछ्याण फुंड खैति हूणा मसहूर किलै छाँ??
हम इथगा मजबूर किलै छाँ??

लोग अपणु अस्तित्व सणी झणी क्य-क्य करदन,
भांडु नि रा त औंज्वल्योंन पाणि भरदन,
अपणी बोलि बुल्दरों कि संख्या ब्यखुनि-फजल उन्द जाणी,
अर हम छाँ कि कुच हथ-खुटा हि नि मरदन,
दुन्या दयेखा साब बणनी अर हम मजदूर किलै छाँ??
पहाड़ी ह्वैकी बि पहाड़ से दूर किलै छाँ??

विजय गौड़ 
मि पहाड़ी, पहाड़ म्येरि पछ्याँण
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Wednesday, 13 February 2013

TRIBUTE TO JAGJIT SINGH: NAYE PARINDON KO UDANE MEIN....


पैलि-पैलि प्रीत का द्वी आखर मै स्ये लिख्ये नि ग्ये,
नया चखुलों थैं उड़ण मा बगत त लगदु हि च भै।
गात कि बात नि छै, कैका मन्न तक पौन्चणु छौ,
इथगा दूर चलण मा बगत त लगदु हि च भै।
नया चखुलों थैं उड़ण मा.......
ग्येड़ ज्व प्वैड़ ज़ा कै मनखी क मन मा,
कथगा बि कारा जतन, खुलण मा बगत त लगदु हि च भै।
नया चखुलों थैं उड़ण मा........
जिकुड्यो नासूर खुणि दवै त ढूँढी यालि हमन पर,
बड़ा दुखदों थैं भ्वरैण मा बगत त लगदु हि च भै।
 नया चखुलों थैं उड़ण मा........
इथगा दिन दगड़ा-दगड़ी चल्नै आदत सि ह्वै ग्ये छै,
नयु बाटु खुज्यण मा बगत त लगदु हि च भै।
 नया चखुलों थैं उड़ण मा........

विजय गौड़ 
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Thursday, 31 January 2013

मिन उथगा हि त्वै खुदयाँण......

त्येरि मै बिसरणों बातन, बात हि रै जाण,
तू जथगा बिसरण चैली, मिन उथगा हि त्वै खुदयाँण।

क्वी सवाल कारलु कि चुप किलै छै,
तिन चुप हि राण,
शब्द खुज्यांदी रैलि,
पर गिचा बीटिंन क्वी जवाब नि आण,
तू जथगा बिसरण चैली, मिन उथगा हि त्वै खुदयाँण......

क्वी त्वै उक्सालु कि म्येरा बारा बता,
तिन टुल-टुल रव़े जाण,
यनि स्वाणी माया अपणी, 
आखिर जै कै मा कनक्वै बर्ताण,
तू जथगा बिसरण चैली, मिन उथगा हि त्वै खुदयाँण......

मिन सुणि जोडि त वु विधाता बणांद,
त मनखिन क्य कैर पाण,
तु जैखुणि बणे वेन, वुख चलि जैली,
म्येरि आश न मैम हि रै जाण,
तू जथगा बिसरण चैली, मिन उथगा हि त्वै खुदयाँण......
त्येरि मै बिसरणों बातन, बात हि रै जाण....

विजय गौड़ 
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सैंदाण

कै बिरणे सैंदाण मिन समालि धरीं च,
मिन कै नि दिखाण, कि मिन क्य पालि धरीं च।


माया ज़िन्दगी मा पंछी बणि आंदी,
त्वै मायादार कैकि, कखि हौर उड़ी जांदी,
मैमा एक तोला नि, वून नालि धरीं च,
कै बिरणे सैंदाण मिन समालि धरीं च....

म्येरु बाटू हिटणो, वा झणी कख्वै ए जांदी,
काण्डों वला बाटों बि सजीला फूल खिलै जांदी,
कबि ज्वा रै छै खुचिला, वा अब तिरालि धरीं च,
कै बिरणे सैंदाण मिन समालि धरीं च......


होन्दि म्येरि अपणी त मैमा हि त रांदी,
म्येरू बणयु घोल, सिन त नि रितांदी,
मिन अपणी नवलि, कै हैंको खालि करीं च,
कै बिरणे सैंदाण मिन समालि धरीं च....

विजय गौड़
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या सिन्नी गवाणे, रात नी च!!!

सुद्दी-सुद्दी मनाणे की बात नी च,
या सिन्नी गवाणे, रात नी च।

तू हि म्यरु ज्यू,
तु हि म्येरि ज्यान,
मिथें ज़मना कि जरुरत नी च,
त्वै दिखणु, त्वै सुचणु,
लठ्याली! म्येरि ज़िन्दगी यी च,
सुद्दी-सुद्दी मनाणे की बात नी च........

मैसणि त्येरि औंगाल हि भौत,
याँ स्ये अग्नै क्वी चाहत नि च,
एक नज़र त्येरि मुखुड़ी कि,
याँ स्ये बक्कि मै राहत नी च,
सुद्दी-सुद्दी मनाणे की बात नी च........

त्येरी मुल-मुल हैंसी भौत च मैकु,
अब दवै खाणे कि बात नी च।
त्येरा बाना हि इथगा बिमार छौं,
हौरि रोग आणे कि बात नी च
सुद्दी-सुद्दी मनाणे की बात नी च........

जब दिल स्ये दिल पैली मिल्यान,
फिर दुन्या दिखाणे बात नी च।
तु म्येरि, मि त्यरु ह्वै ग्यों आज,
या क्वी बताणे बात नी च।
सुद्दी-सुद्दी मनाणे की बात नी च........

विजय गौड़
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त्येरि मुखुड़ी से स्वाणु मै कुच बि नि लगदु!!!

त्येरि मुखुड़ी से स्वाणु मै कुच बि नि लगदु,
त्येरा अग्नै स्यु ज्यून बि पाणि मंगदु।

करलि आंख्युं न घैल कैर जांदी,

अर मरीजो हाल बि नि पुछणों आंदी,
आखिर मै स्ये चांदी छै त क्या चांदी,
लोलि त्येरा ख्याल से हि मै बडुली ऐ जांदी,
ब्यखुनि -फज़ल बस त्वै याद करदु,
त्येरि मुखुड़ी से स्वाणु मै कुच बि नि लगदु।।।।

यीं आग कु क्या, ज्वा बेर-बेर लग जांदी,

पर बुझदा-बुझदा कुज्यणि कथगा खंड खिलांदी,
जल्याँ कु दुःख जलदरा कि जिकुड़ी हि चितांदी,
जै मौलदा-मौलदा सर्या ज़िन्दगी लग जांदी,
मै त्वै हि यीं आग कु मलहम मनदु,
त्येरि मुखुड़ी से स्वाणु मै कुच बि नि लगदु।।।।  

ज्यू ब्वनु कि कबि तु भि मैथें चांदी,

म्येरा दगड़ी मायादार छवीं लगान्दी, 
त म्येरि ज़िन्दगी बि सब्यों बतै पांदी,
कि रोज-रोज ज्यून मै मिलणु आंदी,
यां से पोर मि कुच हौर नि सुचदु,
त्येरि मुखुड़ी से स्वाणु मै कुच बि नि लगदु।।।।       
त्येरा अग्नै स्यु ज्यून बि पाणि मंगदु।।।।

विजय गौड़ 

सर्वाधिकार सुरक्षित
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Wednesday, 30 January 2013

मै पसंद ऐ ग्ये!!!

त्वै स्ये मिलणु, छ्वीं लगाणु, मैं पसंद ऐ ग्ये,
क्या च यु, क्योकु च यु,मै नि पता,
सच त यु हि च कि तु मै पसंद ऐ ग्ये!!!

तेरु मुल-मुल हैसणु
छित्ती -छित्ती खंसणु,
त्येरि खुद, तेरु हि ख्याल,
म्येरा मन्न बसणु,
क्या च यु, क्योकु च यु,मै नि पता,
सच त यु हि च कि तु मै पसंद ऐ ग्ये!!!

अफ़ी -अफ़ी बच्याणु, 
त्येरी छ्वीं लगाणु,
लोला मन्न मा अब,
हौरि कुछ भि त नि आणू,
क्या च यु, क्योकु च यु,मै नि पता,
सच त यु हि च कि तु मै पसंद ऐ ग्ये!!!

त्येरी सूरत आंख्यु मा रिंगणी,
ज़िन्दगी हौरि कुच बि नि बिंगणी,
खुट्टी बिन बुल्याँ, त्वै जना हिटणी,
स्वीणों-वीणों मा बस तू हि तु रिटणी,
क्या च यु, क्योकु च यु,मै नि पता,
सच त यु हि च कि तु मै पसंद ऐ ग्ये!!!    

त्वै स्ये मिलणु, छ्वीं लगाणु, मैं पसंद ऐ ग्ये,
क्या च यु, क्योकु च यु,मै नि पता,
सच त यु हि च कि तु, म्येरि ह्वै ग्ये!!!

विजय गौड़ 
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भयात

कभि जु दगड़ी खेल्दु छौ,
कभि जु अपणु सि मिल्दु छौ।
कभि जु म्येरी हैंसी बानो,
अपणु सुख-दुःख भुल्दु छौ। 
आज यु कन बगत ऐ ग्ये, 
एक हि कोख से जन्म्यु भै,
म्येरू सोरु ह्वै ग्ये !!

कभि जु घुग्गा बिठांदु छौ,
कभि मि लम्डू, उठांदु छौ,
कभि गट्टा -कुंजा खिलांदु छौ,
कभि फुटयाँ घुन्डों सिलांदु छौ,
आज यु कन बगत ऐ ग्ये,
एक हि कोख से जन्म्यु भै,
म्येरू सोरु ह्वै ग्ये !!

कभि जु स्कूल लि जान्दु छौ,
कभि जु कंचौ खिलांदु छौ,
कभि दगड़ मा कुकर छुल्यांदु छौ,
कभि सारयों मा बांदर हकांदु छौ।
आज यु कन बगत ऐ ग्ये,
एक हि कोख से जन्म्यु भै,
म्येरू सोरु ह्वै ग्ये !!

हे विधाता! मि त्वै स्ये बुन्नु छौं,
अपणी हि न, सभि मन्ख्यों कि बात कनु छौं,
अगर तिन भयात कु अंत यन हि लिख्युं,
त मि त्येरि बात नि मनणु छौं,
तु यु कनु इंसाफ कै ग्ये,
जु बालापन कु अटूट ज़ोड़,
या लोलि ज्वनि, आन्द-आन्द हि खै ग्ये. 

विजय गौड़ 
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Monday, 21 January 2013

"नैनीडांड विकास संघ"

दयेखा नैनी डांड मा एक नयि सुबेर हूणी च,
नना -तिना, दाना-सयाणों कि एक नई पौध औणी च।

सब्यों का मन्न मा कुछ कर-गुजरणा कि बात च,
जग-जगों छेत्र विकास खुणी लगणी लंगात च। 
अहा! नैणी, बुंगी, दीवा, भौना, धुमा सब्बि दैणि हुयान,
अर अपणा नौन्यालु थैं औंगाल बोट्टी बुनान, 
कि म्येरा नौन्यालु कु यु कदम, म्येरा छेत्र का विकास खुणी च।   
दयेखा नैनीडांड मा एक नयि सुबेर हूणी च,

आज क्वी न रौत, न नेगी न बलूणी च,
हरेक कि बस एक हि मनसा एकि मनौणि च,
लगावा रै मर्दों जोर, और पौंचा दयेल्यूं-दयेल्यूं,
तुम थैं आज जलमभूमि भटयोणि च,  
दयेखा नैनीडांड मा एक नयि सुबेर हूणी च,

बालापन, ज्वनि अर बुडापू कु यु मिलाप क्वी राजनीति नि च,
यान्कू आदि अर अंत केवल अर केवल, विकासनीति च।
छेत्र जागरूक कना खुणी, हमन रांका उठयाँन,
अपणा व्यक्तिगत फैदा, पैलि कूणों चुटयाँन,
मुल्कै कि प्रगति हि सब्यो कु घ्यू, दूध अर नौणी च,
दयेखा नैनीडांड मा एक नयि सुबेर हूणी च....

जग-जगों मन्ख्यों का मेला लगणांन,
दीदी-भुली, काकी-बोड़ी सब छेत्र विकास मंगणान। 
अर बुलंदी कु नौ धर्युं नैनीडांड विकास संघ,
या त्यरि हि ना, म्यरि हि न, हम सब्यों कि जंग।
आवा अर जुड़ा यीं विकास यात्रा से,
जु बस हमुसणी हि ना, हमरी नई पुश्तों खुणी च।
दयेखा नैनीडांड मा एक नयि सुबेर हूणी च...

विजय गौड़